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मछली, जल और जाल

 

मछली का जीवन जल है, 
जल ही उसका संसार, 
लहरों की गोद में पलती, 
वहीं उसका हर विस्तार। 
 
नीले गहरे सागर में, 
या शांत नदी की धार, 
वह तैरती निर्भय होकर, 
जैसे कोई स्वप्न अपार। 
 
जल की बाँहों में झूले, 
उसकी हर साँस बसी, 
उसे लगता ये साथ मेरा
कभी न होगा ख़त्म अभी। 
 
धूप छने जब जल के भीतर, 
सोने-सी किरणें आएँ, 
मछली अपने छोटे मन में
सपनों के दीप जलाए। 
 
वह समझे यही सत्य है, 
यही सदा का साथी, 
जल से बढ़कर कौन यहाँ है, 
कौन है उससे मातृ-छाती? 
 
पर जीवन के इस मृगतृष्णा में
छुपा हुआ एक सत्य कठोर, 
जो दिखता है अपना-अपना, 
वही छोड़ता अंत में तोड़। 
 
एक दिन लहरें कुछ बदलीं, 
जल में हलचल छा गई, 
मछली ने सोचा खेल है ये, 
कोई नई लहर आ गई। 
 
पर वो तो जाल था फैला, 
किसी लोभी की चाह में, 
धीरे-धीरे घिरती मछली
आ फँसी उसकी बाँह में। 
 
जल वहीं था, पास ही बहता, 
पर अब कुछ कर न सका, 
जिसने जीवन भर सँभाला, 
वो भी साथ न दे सका। 
 
मछली छटपटाई बहुत, 
लहरों को पुकारा बारबार, 
हे मेरे जीवन के साथी, 
अब तो कर लो मेरा उद्धार। 
 
पर जल मौन था, शांत खड़ा, 
जैसे कोई सत्य कठोर, 
कह रहा हो मैं साधन हूँ, 
साथी नहीं सदा के लिए और। 
 
मछली ने तब जाना आख़िर, 
क्या है जीवन का सार, 
जिसे अपना समझा सदा, 
वो भी नहीं सच्चा आधार। 
 
जाल में फँसी वो देह
धीरे-धीरे शिथिल हुई, 
आँखों में एक प्रश्न लिए
वह अंतिम सीमा तक गई। 
 
क्यों भरोसा किया मैंने
उस पर जो न था मेरा? 
मन ही मन वह पूछ रही थी
जीवन का अंतिम फेरा। 
 
तब कहीं भीतर से आवाज़ आई, 
मौन में छिपा हुआ उपदेश
संसार का हर रिश्ता क्षणिक है, 
सिर्फ़ आत्मा ही है शेष। 
 
जल, जाल और मछली 
तीनों की यह कथा पुरानी, 
जीवन का गहरा दर्शन है, 
जिसमें छुपी सच्चाई ज्ञानी। 
 
जो दिखता है सदा अपना, 
वो भी एक दिन छूटेगा, 
और जिस पर तेरा अभिमान है, 
वो भी तुझसे रूठेगा। 
 
इसलिए हे मनुष्य समझ ले, 
मत कर इतना अभिमान, 
संस्कार, सत्य और करुणा ही
हैं तेरे सच्चे पहचान। 
 
मछली की यह मौन कहानी
हर दिल को ये कहती है 
जल में रहकर भी जान ले, 
सच्ची शरण भीतर रहती है। 

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