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आरक्षित मादाओं के नाम पर, प्रतिनिधित्व नर का: राजा सिंह के निजी सलाहकार रीछभाई की रणनीति

 

जंगल में मादाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर राजा सिंह और विपक्ष के नेता ख़रगोश भाई के बीच बहस हुई। दोनों ने इतनी दलीलें दीं कि मादा आरक्षण की असली बात ही किनारे हो गई . . .

“मादाओं के वोट पाने के लिए क्या करना चाहिए?” राजा सिंह ने अपने निजी राजनीतिक सलाहकार रीछभाई, योजनाओं के नाम सुझाने वाले लेखक और भाषण लेखक कौआ क़लमघसू, राजा सिंह के शासन पर कविताएँ लिखने वाले कवि उल्लू ऊट-पटाँग, और समर्पित कार्यकर्ता सुअरभाई सूसाटिया आदि को बुलाकर पूछा।

“सर, मेरे दिए आइडिया पर हमने ‘लाडली मादा योजना’ शुरू की है। इस योजना के तहत मादाओं को ब्यूटी प्रोडक्ट ख़रीदने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।”

कौआ क़लमघसू ने योजना का श्रेय लेना चाहा, जो रीछभाई को पसंद नहीं आया।

“ठीक है, ठीक है . . . ऐसी कई योजनाएँ हम पहले भी सोच चुके हैं। बजट में मादा सशक्तिकरण और नर अशक्तिकरण के लिए सालों से फ़ंड दिया जा रहा है। कोई नया आइडिया है?” रीछभाई ने सख़्ती से पूछा, तो सब चुप हो गए। रीछभाई मानते थे कि सलाह देने का अधिकार केवल उन्हीं का है।

“राजाजी, आपने पहले कई कविताएँ लिखी हैं। अगर आप कहें तो मैं मादाओं पर एक नई कविता लिख दूँ। आप उसे ‘वन की बात’ कार्यक्रम में सुनाएँगे तो मादाएँ ख़ुश हो जाएँगी।”

उल्लू ऊट-पटाँग ने उत्साह से कहा, “सर, मुझे अभी एक कविता सूझी है . . . ”

“अरे भाई, हमें मादाओं के वोट चाहिए। उन्हें कविता सुनाकर बोर नहीं करना है, समझे?” रीछभाई ने कवि को डाँट दिया। इसके बाद कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया।

राजा सिंह ने सीधे रीछभाई से पूछा, “तुम्हारे पास कोई योजना है?”

“जी महाराज,” रीछभाई ने कहा, “अगर हम मादाओं को राजनीति में आरक्षण देंगे, तो वे हमेशा हमें ही वोट देंगी।”

राजा सिंह सोच में पड़ गए, “लेकिन इसके लिए क़ानून बनाना पड़ेगा। बड़ी संख्या में मादाओं को सांसद और विधायक बनाना होगा।”

“तो क्या हुआ? टिकट उन्हीं को देंगे, जो हमारे कहने में रहेंगी। कोई दिक़्क़त नहीं होगी।”

रीछभाई आगे बोलते, उससे पहले सिंह ने कहा, “मादा आरक्षण का क़ानून बनाने के लिए मुझे विपक्ष के नेता ख़रगोश भाई से बहस करनी पड़ेगी।”

“महाराज, ख़रगोश भाई आपकी बराबरी नहीं कर सकते,” रीछभाई ने तुरंत जवाब दिया और बाक़ी सबको विदा कर दिया।

सबके जाने के बाद रीछभाई ने राजनीतिक गणित समझाया, “महाराज, अगर ख़रगोश भाई आरक्षण के लिए हाँ कह दें, तो हमारा काम बन जाएगा। अगर वे विरोध करेंगे, तो हम प्रचार करेंगे कि वे मादाओं के ख़िलाफ़ हैं और मादाएँ हमारे पक्ष में आ जाएँगी।”

“और अगर वे मान गए तो? तब हमें सच में आरक्षण देना पड़ेगा!” राजा सिंह चिंतित हुए, “हमारे गुरु बगुला भाई तो मादाओं को आगे लाने के ख़िलाफ़ हैं।”

“महाराज, आरक्षण तो काग़ज़ पर देना है, असल में क्या करना है वो तो हम जानते हैं,” रीछभाई मुस्कराए।

“मतलब?”

“महाराज, ‘वन स्वराज’ चुनावों में हम मादाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देते हैं, लेकिन असल में चुनते नर उम्मीदवारों को ही हैं। जिन नर कार्यकर्ताओं को चुनते हैं, उनकी पत्नियों के नाम पर चुनाव लड़वाते हैं। कामकाज तो वही नर सँभालते हैं। मादा आरक्षित, पर प्रतिनिधि नर, यही हमारा तरीक़ा है!”

“अरे, मैं तो यह भूल ही गया था। बहुत बढ़िया।” राजा सिंह ख़ुश हो गए।

“तो अब ख़रगोश भाई को बहस के लिए बुलाता हूँ,” रीछभाई ने तुरंत व्यवस्था कर दी।

अगले ही दिन राजा सिंह और ख़रगोश भाई के बीच लाइव बहस हुई। दोनों के बीच इतना वाद-विवाद हुआ कि असली मुद्दा फिर से पीछे छूट गया। 

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