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एकांत का संगीत


वीरेंद्र बहादुर सिंह

मैं सोचता हूँ 
कभी शब्दों में, कभी शून्य में, 
कभी भीड़ की गूँज में, 
तो कभी अपने ही मन के कोने में
कहा गया था
मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ, 
पर अब समय ने नया आईना दिखाया है
मैं दिखता हूँ, इसलिए मैं हूँ। 
 
पर क्या सचमुच? 
क्या अस्तित्व स्क्रीन की चमक में बसता है, 
या उस धड़कन में
जो अँधेरी रात में
ख़ामोशी से अपना गीत गाती है? 
 
समय भी दो रूपों में आता है
एक जो घड़ी की सुइयों में बँधा है, 
टिक-टिक करता हुआ, 
हमें दौड़ाता हुआ, 
डेडलाइन की ज़ंजीरों में जकड़ता हुआ
और दूसरा
जो किसी क्षण में खिलता है, 
जैसे बारिश की पहली बूँद, 
जैसे माँ की हँसी, 
जैसे अकेले में ख़ुद से मिलना
हमने पहले को पकड़ लिया, 
दूसरे को खो दिया। 
 
हमारे पास समय मापने के यंत्र हैं, 
पर समय जीने की फ़ुर्सत नहीं। 
 
भीड़ है
हज़ारों चेहरों की, 
लाखों शब्दों की, 
अनगिनत लाइक्स और कमेंट्स की
फिर भी, 
जब रात गहराती है, 
और सिर तकिए पर झुकता है, 
तो भीतर एक सन्नाटा उतर आता है
एक ख़ालीपन, 
जो पूछता है
तुम सच में किसके साथ हो? 
 
यही अकेलापन है
जहाँ दुनिया पास होकर भी दूर लगती है, 
जहाँ हँसी भी बोझ लगती है, 
और हर रिश्ता
एक अधूरी कहानी जैसा लगता है। 
 
पर उसी अँधेरे में, 
एक और दरवाज़ा है
जिसे बहुत कम लोग खोलते हैं। 
 
वह है
एकांत
जहाँ कोई और नहीं होता, 
पर तुम होते हो
पूरा, स्पष्ट, सजीव। 
 
जहाँ ख़ामोशी
दुश्मन नहीं, 
एक मित्र बन जाती है। 
 
जहाँ सवाल डराते नहीं, 
बल्कि रास्ते दिखाते हैं। 
 
अकेलापन कहता है
तुम अधूरे हो। 
 
एकांत कहता है
तुम पूर्ण हो। 
अकेलापन छीनता है, 
एकांत रचता है। 
 
अकेलापन अँधेरा है, 
एकांत दीपक है। 
 
हम भागते हैं
भीड़ की ओर, 
शोर की ओर, 
किसी के साथ होने के भ्रम की ओर
क्योंकि
ख़ुद के साथ बैठना
सबसे कठिन काम है। 
 
जब बाहर की आवाज़ें थमती हैं, 
तब भीतर की सच्चाई बोलती है
हमारे डर, 
हमारी अधूरी इच्छाएँ, 
हमारे पछतावे
और हम डर जाते हैं, 
इसलिए फिर
मोबाइल उठा लेते हैं। 
 
पर इतिहास कहता है
सत्य भीड़ में नहीं मिला, 
सृजन शोर में नहीं हुआ। 
 
विचार जन्म लेते हैं
जब मन अकेला होता है, 
जब आत्मा ख़ुद से बात करती है। 
 
हर महान खोज
पहले एकांत में पनपी, 
फिर दुनिया तक पहुँची। 
 
एकांत एक साधना है
यह यूँ ही नहीं मिलता, 
इसे अर्जित करना पड़ता है। 
 
जैसे कोई संगीत सीखता है, 
जैसे कोई चित्र बनाना सीखता है, 
वैसे ही
ख़ुद के साथ रहना भी सीखना पड़ता है। 
 
थोड़ा मौन, 
थोड़ी प्रकृति, 
थोड़ी डायरी में बिखरी भावनाएँ 
यहीं से शुरू होती है
एकांत की यात्रा। 
 
भीड़ हमें छुपा लेती है, 
पर विकसित नहीं करती। 
 
भीड़ हमें नाम देती है, 
पर पहचान नहीं। 
 
पहचान तब बनती है
जब हम अकेले खड़े होते हैं, 
अपने निर्णयों के साथ, 
अपने सत्य के साथ। 
 
जीवन कोई समस्या नहीं
जिसे हल करना है। 
 
यह एक अनुभव है
जिसे महसूस करना है। 
 
हर धड़कन में, 
हर साँस में, 
हर उस क्षण में
जो चुपचाप गुज़र जाता है। 
 
और अंत में
जब रात गहरी हो जाए, 
और दुनिया सो जाए
तो बस पाँच मिनट
अपने आप के साथ बैठो। 
 
मोबाइल को दूर रखो, 
आँखें बंद करो, 
और सुनो
तुम्हारा दिल क्या कह रहा है। 
 
वहीं कहीं, 
उस धड़कन के बीच, 
उस मौन के भीतर, 
छुपा है
तुम्हारा असली अस्तित्व। 
 
अकेलेपन में घुटना मत, 
एकांत में खिलना सीखो
क्योंकि
भीड़ में तुम बस दिखते हो, 
पर एकांत में
तुम सच में होते हो। 

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