नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
आलेख | सामाजिक आलेख वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
भूल जाने योग्य अतीत को स्मृति के पिटारे में बंद कर दीजिए: विस्मृति भी एक गुण है
नया वर्ष समस्त पृथ्वीवासियों का सामूहिक जन्मदिन मानकर मनाया जाना चाहिए। जैसे चेकबुक से एक-एक चेक निकालते समय हम कितनी सावधानी रखते हैं, वैसे ही नया वर्ष 365 पन्नों की चेकबुक है। हर दिन को इस तरह जीना है कि वह वसूल हो जाए।
सुबह बग़ीचे में बेंच पर बैठने आने वाले समान आयु के मित्रों की यह बात है। उनमें एक वृद्ध हमेशा उदास रहते थे। चेहरा बुझा-बुझा और जीवन के प्रति केवल शिकायतें ही शिकायतें। जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो वह बोले, “मेरे दुख, मेरे साथ हुए अन्याय की क्या बात करूँ। यही बहुत है कि मैं इसे सह पाया। कोई और होता तो कब का अपने पिता से रिश्ता तोड़ चुका होता।”
इतना सुनकर उनकी ही उम्र के एक अन्य मित्र ने पूछा, “ऐसा क्या हुआ आपके जीवन में कि आप इतने आहत हैं?”
भीगी आँखों से वृद्ध बोले, “हम चार भाई-बहन थे। मैं तीसरे नंबर पर था। पता नहीं पिताजी क्यों हर बात पर मुझे ही डाँटते रहते थे। मेरे सुझावों को अपमानजनक शब्दों में नज़रअंदाज़ कर देते, जबकि बड़े भाई से उनका व्यवहार हमेशा स्नेहपूर्ण रहता। कोई राय लेनी होती तो बड़े भाई या बहन से, मेरी उपस्थिति और मेरे सम्मान की तो किसी को परवाह ही नहीं थी।”
यह कहते-कहते उन्होंने अपने साथ हुए कथित अन्याय की पूरी गठरी खोल दी और फिर गला भर आया,
“पिताजी का यह व्यवहार मैं आज भी सहन नहीं कर पाता।”
ऐसा लग रहा था कि यह वृद्ध अवसाद की गहराई में उतर चुके हैं और कभी भी कोई ग़लत क़दम उठा सकते हैं, क्योंकि पहले भी वह बार-बार पिता के इस व्यवहार की बात करते रहे थे।
पास बैठे मित्र के मन में उनके लिए गहरी सहानुभूति जागी। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा, “मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ। पिताजी किन कारणों से आपके साथ ऐसा करते थे, यह जानने की मेरी भी इच्छा है। मैं उनसे मिलना चाहूँगा और आपकी व्यथा उन्हें बताऊँगा। सम्भव है, उनकी सफ़ाई से आपके मन को शान्ति मिले। और कुछ नहीं तो कम से कम उन्हें यह तो पता चले कि उनकी परवरिश की पद्धति सही नहीं थी।”
यह सुनकर वृद्ध और अधिक हताश हो गए, “नहीं मित्र, अब यह भी सम्भव नहीं। मेरे पिताजी का तो स्वर्गवास हो चुका है।”
मित्र के चेहरे पर जैसे अचानक उम्मीद की चमक आ गई। बोले, “तो फिर? पिताजी के जाने के बाद भी आप वही पुरानी रिकार्ड अपने मन, चित्त और दिमाग़ में बजाते रहेंगे? कब तक इस मानसिक रोग की तरह इसे ढोते रहेंगे?”
उन्होंने फिर पूछा, “पिताजी को गुज़रे कितना समय हो गया?”
वृद्ध ने रोते हुए कहा, “तीस साल . . . तीस साल से मैं यह घाव ढो रहा हूँ। पिताजी के निधन को तीस वर्ष हो चुके हैं।”
अब मित्र का स्वर थोड़ा कठोर हो गया, “मुझे लगा था कि यह सब हाल की बात होगी, इसलिए मुझे आपके लिए सहानुभूति थी। लेकिन आज आप मुझे सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि आपने तीन दशकों तक कड़वी यादों का बोझ उठाकर अपना जीवन बर्बाद किया और अब आगे भी वैसा ही जीना चाहते हैं।”
फिर उन्होंने समझाया, “संभव है पिताजी ने आपको कम उम्र का समझकर कुछ मामलों में शामिल न किया हो, ताकि आप चिंता न करें। हो सकता है आपके सुझाव उस समय व्यावहारिक न रहे हों। पुराने ज़माने के लोग परिवार में अपना प्रभाव और अनुशासन बनाए रखने के लिए सख़्त व्यवहार करते थे। संतान को बड़े होकर यह याद करना चाहिए कि पिता ने उसके लिए क्या-क्या किया। क्या आपके पास ऐसी कोई सुखद स्मृतियाँ नहीं हैं, जिनसे पिताजी के लिए आँखें नम हो जाएँ?”
इसके बाद मित्र ने बिना माँगे उपदेश देते हुए कहा, “मान लो कि पिताजी आपके साथ पक्षपात करते थे या कठोर थे, तब भी उस बात को तीस साल हो चुके हैं। इतने वर्षों बाद भी किसी के व्यवहार या शब्दों को दिल पर लेकर जीना, यह अपने आप को सज़ा देना है। वर्तमान में जियो। भूलने योग्य अतीत को स्मृति के पिटारे में बंद कर दो। जिसने भी अनुचित व्यवहार किया हो, उसे क्षमा कर दो। उसे उसकी संस्कारहीनता समझो। जागो तो आज से जागो। जीवन के जो भी वर्ष शेष हैं, उन्हें ईश्वर का धन्यवाद करते हुए सार्थक बनाओ। कुछ उद्देश्यपूर्ण करो।”
यह सुनकर वृद्ध ने उनका हाथ पकड़ लिया और रोते हुए बोले, “तीस साल पुरानी बात को काँटे की तरह अपने पैर में चुभोए रखना मेरी सबसे बड़ी भूल थी। मुझे क्यों किसी के मत को इतना महत्त्व देना चाहिए था? आपने सही कहा, पिताजी ने हमारे लिए जो किया, वे स्मृतियाँ चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम गईं और आँसुओं के साथ मेरे घाव भी धुल गए। भाई . . . धन्यवाद।”
जैसे इस वृद्ध की कहानी है, वैसे ही आज समाज में अनेक चेहरे लटकाए हुए आत्माएँ भटक रही हैं। किसी ने वर्षों पहले कुछ कह दिया हो या कोई व्यवहार कर दिया हो, उसे वे दिल में शूल की तरह चुभोए रखते हैं। कई बार सामने वाला व्यक्ति मज़ाक़ में या स्वभाववश कुछ कह देता है, जिसे वह स्वयं भूल भी चुका होता है, लेकिन हम उसे हड्डियों तक ढोते रहते हैं। कभी-कभी तो जिस व्यक्ति से शिकायत होती है, उसका देहांत भी हो चुका होता है, फिर भी हम उसके पूरे परिवार को विषैली दृष्टि से देखते हैं।
किसी का व्यवहार उसका अपना होता है, उसके संस्कारों और प्रकृति का प्रतिबिंब। वह व्यक्ति तो निश्चिंत घूम रहा होता है, लेकिन हम अत्यधिक संवेदनशील बनकर स्वयं को ही सज़ा दे रहे होते हैं। यह आत्मघात के समान है। संत कहते हैं कि सही-ग़लत भूलकर, क्षमा करके, अपने स्वार्थ के लिए अच्छा जीवन जियो। यदि हमारे व्यवहार से किसी की भावना आहत हुई हो तो आत्ममंथन भी ज़रूरी है कि “हाँ, प्रतिक्रिया में मैं भी पूरी तरह सही नहीं था।”
अब ईसा मसीह के नए वर्ष का प्रारंभ होने जा रहा है। हर साल हम नए वर्ष के संकल्प लेते हैं, जिनमें से अधिकतर बचपन में ही मर जाते हैं। फिर भी संकल्पों की सूची बनानी चाहिए, क्योंकि उसी बहाने हमें अपने सुधार की ज़रूरत का अहसास होता है। आपके अवचेतन मन में वे सभी संकल्प दर्ज रहते हैं और समय-समय पर जीवन में लौटते भी हैं।
एक वैश्विक सर्वे के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत लोग नियमित व्यायाम या फ़िटनेस के संकल्प लेते हैं। उसके बाद भौतिक उन्नति के संकल्प आते हैं। लेकिन मानसिकता और सोच बदलने का संकल्प बहुत कम लोग लेते हैं। आप किसी व्यक्ति या परिस्थिति को जिस दृष्टि से देखते हैं, वही सुख-दुख का मूल है। वास्तव में वही संकल्प लेने चाहिए, जो सच्ची हृदय को ख़ुशी दें।
नया वर्ष 365 पन्नों की चेकबुक है। हर दिन एक चेक है, जिसे सोच-समझकर ख़र्च करना है। यदि आप सात्विक कर्म कर रहे हैं तो दूसरों की नज़र या उनकी राय की परवाह करने की ज़रूरत नहीं।
तो आइए, नए वर्ष के हर दिन को कर्म और परिश्रम के साथ, सक्रिय (proactive) बनकर जिएँ। अधिकांश लोग प्रतिक्रियात्मक (reactive) जीवन जीते हैं। नया वर्ष समस्त पृथ्वीवासियों का सामूहिक जन्मदिन मानकर उसका उत्सव और सम्मान करना चाहिए।
आइए, साथ मिलकर गाएँ:
“ज़िंदगी हँसने गाने के लिए है दो पल,
उसे खोना नहीं, खो के रोना नहीं,
प्यारे तू ग़म न कर।”
यदि पिछले वर्षों की तरह ही एक और वर्ष जीना है तो वह केवल एक आँकड़ा भर है, उससे अधिक कुछ नहीं।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
अंतरराष्ट्रीय जल दिवस पर—मेरा मंथन
सामाजिक आलेख | सरोजिनी पाण्डेय22 मार्च को प्रति वर्ष ‘अंतरराष्ट्रीय…
अगर जीतना स्वयं को, बन सौरभ तू बुद्ध!!
सामाजिक आलेख | डॉ. सत्यवान सौरभ(बुद्ध का अभ्यास कहता है चरम तरीक़ों से बचें…
अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
सामाजिक आलेख | डॉ. सुशील कुमार शर्मावैज्ञानिक दृष्टिकोण कल्पनाशीलता एवं अंतर्ज्ञान…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
चिन्तन
कहानी
सामाजिक आलेख
कविता
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मनुष्य
- माँ
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- शीशों का नगर
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- साल 3032 में शायद
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
किशोर साहित्य कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
पुस्तक चर्चा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं