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रूखे तन की वेदना

 

रूखा तन
केवल त्वचा की कहानी नहीं होता, 
यह आत्मा की उस दरार का नाम है
जहाँ स्पर्श समय से पहले
मौन हो गया हो। 
 
यह वेदना
न तो घाव की तरह दिखती है
न ही रक्त की तरह बहती है, 
यह भीतर ही भीतर
रेत बनकर जमती जाती है, 
और हर श्वास को
थोड़ा और कठिन कर देती है। 
 
रूखे तन पर
हवाएँ भी प्रश्न बनकर उतरती हैं, 
सूरज की किरणें
ताप नहीं, 
तिरस्कार सी लगती हैं, 
मानो प्रकृति भी पूछ रही हो, 
‘किस अभाव ने तुम्हें
इतना अनाथ कर दिया?’
कभी यह तन
किसी के इंतज़ार में
सुगंध हुआ करता था, 
स्पर्श के एक क्षण से
पूरा ब्रह्मांड
धड़क उठता था। 
 
अब वही तन
अपने ही साए से
चौंक जाता है, 
क्योंकि स्मृतियाँ 
अब स्नेह नहीं, 
सूखती पत्तियों की तरह
चरमराने लगी हैं। 
 
रूखे तन की वेदना
दरअसल
रूखे मन का
प्रतिबिंब है, 
जहाँ भावनाएँ 
नमी ढूँढ़ती हैं
और शब्द
सूखे कुएँ में
पत्थर की तरह गिरते हैं। 
 
यह वेदना
रात को और लंबा कर देती है, 
तकिए पर
नींद नहीं, 
बीते स्पर्शों की राख
बिखरी मिलती है। 
 
तन पूछता है मन से, 
‘क्या मैंने कोई अपराध किया था
जो मुझे
स्नेह की वर्षा से
वंचित कर दिया गया?’
 
और मन
नज़रें चुरा लेता है, 
क्योंकि उसके पास
कोई उत्तर नहीं, 
सिवाय इस स्वीकार के
कि उपेक्षा भी
हिंसा का ही
एक सूक्ष्म रूप है। 
 
रूखा तन
चीखता नहीं, 
बस सहता है, 
हर उस दिन को
जब कोई पास होकर भी
दूर रहता है। 
 
हर उस रात को
जब बाँहों की जगह
दीवारें
साथ सोती हैं। 
 
पर इस वेदना में भी
एक बीज छिपा है, 
संवेदना का, 
जो यदि एक बूँद 
स्नेह की पा ले
तो फिर से
जीवन बन सकता है। 
 
क्योंकि तन
रूखा जन्म से नहीं होता, 
उसे
सूखा दिया जाता है, 
अनसुने शब्दों से, 
अनछुए स्पर्शों से, 
और अधूरी मोहब्बत से। 
 
और जब कभी
कोई
सचमुच का अपनापन
उस पर उतरता है, 
तो वही रूखा तन
सबसे पहले
रो पड़ता है, 
क्योंकि उसने
सबसे ज़्यादा 
प्यास सही होती है। 

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