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ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी

 

‘अप्प दीपो भवः’

इस पाली-संस्कृत वाक्य का अर्थ है—स्वयं अपना प्रकाश बनो, ख़ुद को स्वयं प्रकाशित करो। यह वाक्य भगवान बुद्ध के सभी उपदेशों का सार है। जब व्यक्ति स्वयं अपने ज्ञान का प्रकाश बनता है, स्वयं अपना मार्गदर्शक होता है तो उसे किसी और की मदद की आवश्यकता नहीं रहती। इसका एक अर्थ यह भी है कि अपने ऊपर भरोसा रखकर ख़ुद को साबित करो। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सूत्र भी यहीं से प्रकट होता है। ओशो से लेकर आचार्य प्रशांत तक कई वक्ताओं ने इस वाक्य की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की है और विस्तार से समझाया है। 

इसी कारण इस वर्ष के राष्ट्रीय युवा दिवस की थीम में भी ‘अप्प दीपो भवः’ की गूँज सुनाई देती है। स्वामी विवेकानंद की जयंती-12 जनवरी को देश में युवा दिवस मनाया जाता है और इस वर्ष इसके 40 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1985 से मनाए जा रहे नेशनल यूथ डे की इस साल की थीम रही है—स्वयं को प्रकाशित करें, दुनिया को प्रभावित करें। यह थीम अपने आप में अर्थपूर्ण है। हवाई जहाज़ में आपात स्थिति की प्रस्तुति के दौरान जो सलाह दी जाती है, वह याद रखें—‘पहले अपना ऑक्सीजन मास्क लगाइए, फिर दूसरों की मदद कीजिए।’

जब तक हम अपनी मदद नहीं करेंगे, तब तक दूसरों की मदद नहीं कर पाएँगे। जब तक हम स्वयं प्रकाशित नहीं होंगे, तब तक दूसरों को प्रकाश नहीं दे पाएँगे। यही बात इस वर्ष के यूथ डे की थीम में समाहित रही है। युवाओं को दी गई यह सलाह केवल भारत की युवा पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर नई पीढ़ी पर भी लागू होती है—इग्नाइट द सेल्फ़, इम्पैक्ट द वर्ल्ड—अपनी क्षमताओं को विकसित करके दुनिया पर प्रभाव डालो। 

लेकिन स्वयं चमककर दुनिया को रोशन करने की इस बात से शायद जेन-ज़ी पूरी तरह सहमत नहीं है। ग्लोबल पॉलिटिक्स, समाज, सोशल मीडिया और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही जेन-ज़ी आज ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में कैसी भूमिका निभा रही है और भविष्य में कैसी भूमिका निभाएगी—यह जानने पर उनके रुझान अपने-आप स्पष्ट हो जाते हैं। 

आज जिनकी उम्र 13 से 28 वर्ष के बीच है, वे सभी जनरेशन ज़ेड यानी जेन-ज़ी कहलाते हैं। 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी को इस श्रेणी में रखा जाता है। इस आयु वर्ग की जनसंख्या दुनिया में लगभग 190 करोड़ है। वैश्विक जनसंख्या का 23 प्रतिशत हिस्सा जेन-ज़ी का है। हाईस्पीड इंटरनेट और स्मार्टफोन के बीच पली-बढ़ी यह पीढ़ी पिछले कुछ वर्षों से बड़ी संख्या में ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में प्रवेश कर रही है। 

लेकिन दुनिया को इस पीढ़ी से जो अपेक्षाएँ हैं, वे फ़िलहाल पूरी होती नहीं दिख रही हैं। जेन-ज़ी की तुलना उनकी पिछली पीढ़ी, मिलेनियल्स से की जाती है। 1981 से 1996 के बीच जन्मी मिलेनियल्स आज ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। 29 से 44 वर्ष के आयुवर्ग के लोग मिलेनियल्स कहलाते हैं और आज वे वैश्विक कार्यबल की रीढ़ हैं। लीडरशिप पोज़ीशन तक पहुँची इस पीढ़ी का डिजिटल क्रांति में बड़ा योगदान रहा है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रभाव में उनकी किशोरावस्था बीती और आईटी क्रांति के वे साक्षी बने। यही वह पीढ़ी थी, जिसने कोडिंग की कुशलता हासिल की, इसलिए मिलेनियल्स को ‘कोडिंग जनरेशन’ भी कहा जाता है। 

1965 से 1980 के बीच जन्मी जनरेशन एक्स की पहचान थी, एक ही नौकरी या एक ही फ़ील्ड में वर्षों बिताना, पूरा कैरियर वहीं पूरा कर देना। आज 45 से 60 वर्ष की उम्र में पहुँची यह पीढ़ी ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में टॉप मैनेजमेंट में है। कंपनियों में सीईओ, एमडी जैसे पदों पर कार्यरत इस पीढ़ी का बड़ा हिस्सा लगभग सेवानिवृत्ति के कगार पर है। मिलेनियल्स ने अपनी पिछली पीढ़ी के एक फ़ील्ड, एक नौकरी वाले दृष्टिकोण को काफ़ी हद तक बनाए रखा, साथ ही नए बदलावों को भी अपनाया। लेकिन स्थिर नौकरी-व्यवसाय का रुझान मिलेनियल्स तक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जेन-ज़ी के रुझानों में पिछली पीढ़ियों की तुलना में बड़ा बदलाव नज़र आता है। 

सेवानिवृत्त हो रही जनरेशन एक्स को रिप्लेस करने की ज़िम्मेदारी जेन-ज़ी पर है, लेकिन बदलते दौर में जेन-ज़ी के काम करने के तरीक़ों में आए मूलभूत बदलावों का सीधा असर ग्लोबल वर्कफ़ोर्स पर पड़ने लगा है। जेन-ज़ी कड़ी मेहनत के बजाय सुविधाजनक जीवन और वर्क लाइफ़ बैलेंस में विश्वास करती है। नतीजतन, वैश्विक कार्यबल में एक्सपर्ट्स का बड़ा गैप बनना शुरू हो गया है। एक-डेढ़ दशक बाद दुनिया की शीर्ष 20 इंडस्ट्रीज़ में लीडरशिप पोज़ीशन के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों की भारी कमी पैदा होने की आशंका है। 

ग्लोबल प्रोफ़ेशनल सर्विस नेटवर्क डेलॉयट के एक ताज़ा सर्वे में केवल 6 प्रतिशत जेन-ज़ी कर्मचारियों ने कहा कि वे लीडरशिप तक पहुँचना चाहते हैं। इस आयुवर्ग के अधिकांश कर्मचारियों का स्पष्ट मत है कि वे पैसे कमाने की दौड़ में पूरी ज़िन्दगी ख़र्च नहीं करना चाहते। ज़रूरत के मुताबिक़ कमाई करके वर्क लाइफ़ बैलेंस बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है। पैसा कमाना उनके लिए ज़रूरी है, लेकिन कमाई के लिए जीवन भर काम की चक्की में पिसना उन्हें मंज़ूर नहीं। 

10 में से 9 जेन-ज़ी कर्मचारी कहते हैं कि उनके लिए जॉब सैटिस्फ़ैक्शन, वेतन से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। मिलेनियल्स में 10 में से 7 लोग बेहतर वेतन मिलने पर समझौता करने को तैयार थे। 77 प्रतिशत जेन-ज़ी कर्मचारियों ने कहा कि वे पहले अपने बारे में सोचेंगे, फिर परिवार के बारे में। 69 प्रतिशत ने स्वीकार किया कि उनकी नौकरी पर परिवार पूरी तरह निर्भर नहीं है। 82 प्रतिशत जेन-ज़ी का कहना है कि अगर काम में मज़ा नहीं आता तो वे मन मारकर नौकरी नहीं करेंगे। 

इसी समूह के 58 प्रतिशत लोग वर्क फ़्रॉम होम या रिमोट वर्क को प्राथमिकता देते हैं। इसके बदले अगर 20 प्रतिशत तक कम वेतन भी मिले तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। ऑफ़िस में तय घंटों के ढाँचे में काम करने के बजाय अपने अनुकूल समय पर काम करना उन्हें ज़्यादा पसंद है। 

सबसे अहम बात यह है कि जेन-ज़ी कर्मचारियों को एक ही काम वर्षों तक फ़ुलटाइम करने के बजाय पार्टटाइम नौकरी, अलग-अलग फ़ील्ड में फ़्रीलांस काम करना ज़्यादा पसंद है। जेन-ज़ी की किसी एक कंपनी में औसत नौकरी अवधि केवल 13 महीने है। एक से डेढ़ साल के भीतर यह पीढ़ी कम वेतन, जॉब सैटिस्फ़ैक्शन की कमी, एक ही काम से ऊब, नए क्षेत्र में क़िस्मत आज़माने का साहस या सीनियर अधिकारियों से मतभेद जैसे कारणों से नौकरी बदल लेती है। 

पिछली पीढ़ी मिलेनियल्स में 29 से 36 वर्ष के आयुवर्ग की औसत नौकरी अवधि एक ही पद या कंपनी में 36 से 42 महीने रही है। 37 से 44 वर्ष के आयुवर्ग में यह अवधि 62 से 68 महीने तक रही है। यानी यह पीढ़ी औसतन चार से साढ़े पाँच साल एक जगह काम करती है। इन दोनों से पहले की जनरेशन एक्स की धैर्यशीलता तो और भी उल्लेखनीय थी, एक ही कंपनी में लगभग उसी वेतन और उसी पद पर उनकी औसत नौकरी अवधि बसाढ़े पाँच से साढ़े सात साल तक रही। 

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2034 तक मिलेनियल्स अपने करियर के अंतिम चरण में होंगे। उस समय मुख्य ज़िम्मेदारी जेन-ज़ी के कंधों पर होगी और उसके बाद जनरेशन अल्फा काण पहला हिस्सा सक्रिय वर्कफ़ोर्सण में आ चुका होगा। ऐसे में लीडरशिप में बड़ा ख़ालीपन पैदा होगा। फ़ोरम के सर्वे में 36 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे 40 साल से ज़्यादा नौकरी करने की योजना नहीं रखते। उसके बाद वे अपनी पसंदीदा गतिविधियों का बिज़नेस, स्टार्टअप या कंटेंट क्रिएशन के ज़रिए कमाई का मॉडल तैयार करना चाहते हैं। 

कुल मिलाकर उनके रुझानों से यही कहा जा सकता है कि जेन-ज़ी स्वयं को प्रकाशित तो करना चाहती है, लेकिन दुनिया को प्रभावित करने की दौड़ में पड़ना नहीं चाहती। नौकरी में ख़ुद को झोंक देने के बजाय बिना संघर्ष वाली ‘सॉफ़्ट लाइफ़’ जेन-ज़ी को ज़्यादा प्रिय है। 

एक से अधिक स्किल विकसित करती जेन-ज़ी एआई के कारण दुनिया में करोड़ों नौकरियाँ ख़त्म हो जाएँगी, ऐसा भय फैला हुआ है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी क्षमताओं को विकसित करें। नई-नई स्किल्स सीखेंगे तो एआई के इस तूफ़ान में टिक पाएँगे। ख़ासतौर पर एआई का उपयोग करने की समझ नौकरी के लिहाज़ से फ़ायदेमंद मानी जाती है। शायद यही कारण है या फिर नई पीढ़ी का स्वभाव, लेकिन सच्चाई यह है कि जेन-ज़ी को एक से अधिक काम आते हैं। 

ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में शामिल जेन-ज़ी में से 30 प्रतिशत ने किसी न किसी एआई कोर्स को पूरा किया है। इसके अलावा उनकी औपचारिक डिग्री तो है ही। साथ ही इस आयुवर्ग के क़रीब 60 करोड़ युवाओं के पास पार्टटाइम कोर्स की डिग्री भी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के अनुसार, यह डिजिटल पीढ़ी नए-नए डिवाइस चलाने में सहज है, इसलिए ऐप्स या वेब के माध्यम से पार्टटाइम नौकरी या रिमोट वर्क करना उनके लिए आसान हो जाता है। पिछली पीढ़ियों की तुलना में जेन-ज़ी इस मायने में ज़्यादा स्किल्ड, ज़्यादा सक्षम और ज़्यादा स्मार्ट है। 

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