मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
काव्य साहित्य | कविता वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता,
जिनकी कोई मंज़िल नहीं है,
जहाँ क़दम तो चलते हैं
पर अर्थ ठिठक जाता है,
जहाँ हर मोड़ पर
सिर्फ़ दिशाओं का भ्रम है
और भविष्य का कोई संकेत नहीं।
मैंने देखा है उन राहों को,
चमकती हैं शुरूआत में,
भीड़ का शोर उन्हें लोकप्रिय बनाता है,
तालियों की गूँज पर
वे अपने आपको सही ठहराती हैं।
पर थोड़ी दूर चलो तो
सन्नाटा मिलने लगता है,
और आत्मा से सवाल उठते हैं,
क्यों चल रहे हो?
कहाँ पहुँचना चाहते हो?
मैं उस यात्रा का यात्री नहीं
जिसमें चलना ही उपलब्धि हो,
जिसमें थक जाना ही
सबसे बड़ा सत्य बन जाए।
मुझे वह पथ चाहिए
जो कठिन हो तो हो,
पर ईमानदार हो,
जहाँ पाँव लहूलुहान हों
पर दृष्टि साफ़ हो।
मैं उन सड़कों से डरता नहीं
जो कँटीली हैं,
डरता हूँ उनसे
जो मुलायम होकर भी
मनुष्य को भटका देती हैं।
जहाँ समझौते की छाया में
आदर्श दम तोड़ देते हैं,
और सुविधा की धूप में
स्वाभिमान झुलस जाता है।
मेरे लिए मंज़िल
सिर्फ़ कोई जगह नहीं,
एक मूल्य है,
एक उत्तरदायित्व है,
एक ऐसा बिंदु
जहाँ पहुँचकर
मैं अपनी आँखों में
ख़ुद को देख सकूँ
बिना शर्म के।
मैं उन रास्तों पर नहीं चल सकता
जो मुझे मुझसे दूर ले जाएँ,
जो मेरी भाषा छीन लें,
मेरे प्रश्नों को अपराध बना दें,
और मेरी चुप्पी को
सहमति समझ लें।
अगर मंज़िल नहीं है
तो ठहर जाना बेहतर है,
अगर दिशा नहीं है
तो सवाल पूछना ज़रूरी है।
हर चलता हुआ क़दम
सही नहीं होता,
और हर रुका हुआ व्यक्ति
हार गया हो,
यह भी सच नहीं।
मैं इंतज़ार कर लूँगा,
नक़्शा ख़ुद बना लूँगा,
आकाश से तारे उधार लेकर
अपनी दिशा तय कर लूँगा।
पर मैं उन सड़कों पर नहीं चलूँगा
जिनकी कोई मंज़िल नहीं है,
क्योंकि जीवन
सिर्फ़ गति का नाम नहीं,
अर्थ तक पहुँचने की ज़िद का नाम है।
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