साल 3032 में शायद
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह15 Aug 2025 (अंक: 282, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
साल 3032 के उस दिन विश्व स्नेह नियंत्रण केंद्र ने तात्कालिक घोषणा की कि “नागरिकों ध्यान दो। सालों पहले कोई मानवता नाम का वायरस था, जो फिर से जाग्रत हो गया है। यह मानवता एक भयानक ‘बग’ है, जो आपके शरीर के सिस्टम में अचानक प्रकट होता है और फिर मनुष्य अजीब हरकतें करने लगता है। अगर अचानक कोई व्यक्ति किसी के दुख में उसकी मदद के लिए भागता दिखाई दे तो समझ लीजिए कि वह इस वायरस का शिकार हो गया है।”
इस वायरस के लक्षण अनदेखा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लक्षण हैं किसी को रोते देख कर आपकी आँखों का नम होना, ज़रूरतमंद व्यक्ति को देख कर अपनेआप हाथ का जेब की ओर बढ़ जाना, किसी की तकलीफ़ सुन कर उसकी मदद के लिए तलब लगना, किसी की ग़लती के लिए उससे बदला लेने के बजाय उसे माफ़ कर देने की इच्छा होना और अगल-बगल से गुज़र रही गाय और कुत्ते को डंडा या लात मारने का मन न होना।
इसमें किसी भी तरह का बदलाव आप ख़ुद में या घर के किसी भी सदस्य में अनुभव करें तो तत्काल नज़दीक के मानवता नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें। हमारे वैज्ञानिक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से इस मानवता का एंटीडोट बनाने में लग गए हैं। प्रधानमंत्री की ओर से घोषणा की गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति में मानवता के गुण दिखाई दें, तुरंत उससे दूर हट जाएँ, उसे अकेला छोड़ दें। हमारी ख़ुफ़िया एजेंसी का मानना है कि यह वायरस भारत नाम के देश से फैला है। सामान्य जनता से निवेदन है कि वह चिंता न करे। सोशल डिस्टेंस रखे। किसी की ओर देख कर भूल से भी न मुसकराएँ, प्यार और सरलता का अनुभव होते ही तत्काल उसे नष्ट कर दें। दिन में तीन बार बिना वजह झगड़ा करते रहें या किसी निर्दोष को बिना वजह नुक़्सान पहुँचाते रहें।
जब तक एंटीडोट की खोज नहीं हो जाती, तब तक ‘लुच्चईसीटामोल’ और ‘स्वार्थोमाइसीन’ की ख़ुराक बार-बार लेते रहें। याद रखिए मानवता से जीवन सुधर सकता है। इसलिए इससे सतर्क रहें।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | वीरेन्द्र बहादुर सिंहनवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस…
60 साल का नौजवान
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | समीक्षा तैलंगरामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…
(ब)जट : यमला पगला दीवाना
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | अमित शर्माप्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- साल 3032 में शायद
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
कविता
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मनुष्य
- माँ
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- शब्द
- शीशों का नगर
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
सामाजिक आलेख
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
चिन्तन
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
पुस्तक चर्चा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं