रोहन और ग़ुस्से वाला राक्षस
बाल साहित्य | किशोर साहित्य कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
एक व्यस्त से महल्ले में रोहन नाम का एक प्यारा-सा लड़का रहता था। रोहन की आँखें चमकीली थीं और मुस्कान बहुत मीठी, लेकिन उसके पास एक बड़ा-सा, गुप्त-सा मुद्दा था। उसके पेट के अंदर एक बहुत बड़ा, आग जैसा ग़ुस्से वाला राक्षस रहता था!
जब भी ग़ुस्से वाला राक्षस जागता, रोहन का चेहरा लाल हो जाता, उसकी आवाज़ तेज़ हो जाती और उसके शब्द काँच के टूटे टुकड़ों की तरह चुभने लगते। वह अपने दोस्तों को बुरे नामों से पुकारता, पड़ोस के बच्चों को डाँटता और यहाँ तक कि कुत्तों पर भी चिल्लाता।
रोहन के प्यारे पापा और मम्मी चिंता में रहते। रोहन के दोस्त उसे देखते ही डर से उड़ते पक्षियों की तरह भाग जाते, क्योंकि भले ही रोहन ग़ुस्सा जल्दी भूल जाता, लेकिन उसके शब्दों के घाव बाक़ी सबके दिल में रह जाते थे।
पापा ने बहुत कोशिश की, पर ग़ुस्से वाले राक्षस को शांत नहीं कर पाए। फिर एक दिन पापा के मन में एक समझदार विचार आया। सुबह पापा ने रोहन को एक भारी-सी कपड़े की पोटली दी, जिसमें लंबे, चमकीले लोहे की कीलें थीं।
“रोहन, ध्यान से सुनो,” पापा ने आम के पेड़ के पास वाली पुरानी लकड़ी की बाड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “जब भी तुम्हारा ग़ुस्से वाला राक्षस जागे और तुम किसी को बुरा बोलो, तुम्हें इस बाड़ में एक कील ठोकनी होगी।”
रोहन को यह थोड़ा अजीब लगा, पर उसने हामी भर दी। पहले ही दिन ग़ुस्से वाला राक्षस 30 बार जागा। रोहन को बाड़ में 30 कीलें ठोकनी पड़ीं। ठक। ठक। ठक। उसके हाथ दुखने लगे। उसकी समझ में आ गया कि कील ठोकना चिल्लाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है।
धीरे-धीरे रोहन ने ग़ुस्से से लड़ना शुरू किया। उसने सीखा कि गहरी साँस लेना, हथौड़ा उठाने से बहुत आसान है। कीलों की संख्या कम होने लगी, 15, फिर 5, फिर 2 . . .
और फिर एक जादुई दिन आया, जब रोहन ने एक भी कील नहीं ठोकी!
वह चमकती मुस्कान लिए पापा के पास भागा, “पापा, कई दिन हो गए। मेरा ग़ुस्से वाला राक्षस सो रहा है।”
पापा मुस्कुराए, “बहुत बढ़िया, बेटा। अब अगला क़दम। हर दिन जब तुम दयालु रहोगे, तुम्हें एक कील बाड़ से निकालनी होगी।”
रोहन ने कीलें निकालना शुरू किया।
‘क्लिंक।’ कुछ ही दिनों में लगभग सारी कीलें निकल गईं। लेकिन कुछ कीलें टेढ़ी थीं और लकड़ी में गहरी धँसी थीं। रोहन ने बाड़ पापा को दिखाई, “देखो पापा, ज़्यादातर कीलें निकल गईं, लेकिन ये कुछ निकल ही नहीं रहीं।”
पापा ने रोहन के कंधे पर हाथ रख कर कहा, “बेटा, ज़रा ध्यान से देखो। तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?”
रोहन उदास होकर बोला, “बड़े गहरे छेद। लकड़ी पर निशान।”
पापा ने धीरे से कहा, “बिल्कुल। ये कीलें तुम्हारे ग़ुस्से वाले शब्द थे। तुम कीलों को निकाल सकते हो यानी माफ़ी माँग सकते हो . . . लेकिन ये निशान, ये दिलों पर लगे घाव जैसे हैं, जो हमेशा रह जाते हैं।
“हमारे शब्द तोहफ़ा हैं। इन्हें मिठास और प्यार की तरह इस्तेमाल करो। ऐसा कुछ मत कहो, जिससे किसी के दिल में छेद पड़ जाए।”
रोहन ने बाड़ को देखा, अपने हाथों को देखा और उस दिन उसने ये सीख हमेशा के लिए समझ ली कि शब्द कीलों जैसे होते हैं। ग़ुस्से में कहा गया शब्द दिल पर हमेशा के लिए निशान छोड़ जाता है। इसलिए हमेशा मीठे, प्यार भरे, सोचे-समझे शब्द बोलें।
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