अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मृत्यु का इंतज़ार 

 

मृत्यु का इंतज़ार 
क्या यह भय है या कोई गहरी शान्ति? 
क्या यह अंत का अंधकार है, 
या अनंत की पहली कांति? 
 
जीवन की भीड़ में चलते-चलते
एक दिन यह विचार आता है, 
कि जिस राह पर सब चल रहे हैं, 
वहाँ अंत में क्या रह जाता है? 
 
हम जन्म के उत्सव में खोकर
मृत्यु को भूल जाते हैं, 
पर हर साँस के पीछे छुपे
उस साए को नहीं पहचान पाते हैं। 
 
मृत्यु का इंतज़ार कोई
हर पल करता तो नहीं, 
पर कहीं भीतर एक सन्नाटा
इस सत्य को नकारता भी नहीं। 
 
कुछ लोग इसे डर से देखते, 
कुछ इसे विश्राम समझते हैं, 
कुछ के लिए यह मुक्ति का द्वार, 
कुछ इसे अंधकार समझते हैं। 
 
जो थक गए हैं जीवन से, 
उनके लिए यह एक ठहराव है, 
जो उलझे हैं अपने ही जाल में, 
उनके लिए यह एक बहाव है। 
 
मृत्यु का इंतज़ार कभी-कभी
जीवन से भागना भी होता है, 
पर कई बार यह एक गहरा
स्वीकार करना भी होता है। 
 
जब मन सारे उत्तर खोजकर
ख़ुद ही प्रश्न बन जाता है, 
तब मृत्यु का विचार कहीं
एक समाधान बन जाता है। 
 
पर क्या सच में मृत्यु
हर पीड़ा को हर लेती है? 
या यह सिर्फ़ एक नया प्रश्न
हमारे सामने रख देती है? 
 
जीवन एक अधूरी कहानी है, 
जिसे हम पूरा मान लेते हैं, 
और मृत्यु उस आख़िरी पंक्ति को
बिना पढ़े ही जान लेते हैं। 
 
इंतज़ार 
यह शब्द ही कितना भारी है, 
यह समय को भी थाम लेता है, 
और आत्मा को भी उतारता है। 
 
जो मृत्यु का इंतज़ार करते हैं, 
वो शायद जीवन को गहराई से देखते हैं, 
हर पल को आख़िरी समझकर
उसमें अनंत को खोजते हैं। 
 
मृत्यु एक दर्पण है, 
जो हमें हमारा सत्य दिखाती है, 
हमारी सारी इच्छाओं को
एक बिंदु में सिमटा देती है। 
 
वह कहती है
जो कुछ भी है, यहीं है, अभी है, 
जो बीत गया, वह सपना है, 
जो आने वाला है, वह अभी नहीं है। 
 
तो क्या मृत्यु का इंतज़ार करना
वास्तव में जीवन को समझना है? 
या यह बस एक भ्रम है
जो मन को बहलाना है? 
 
शायद उत्तर इन दोनों के बीच है
ना पूरी स्वीकृति, ना पूरी अस्वीकृति, 
बस एक शांत प्रतीक्षा
जो बिना शब्दों के होती है स्पष्ट। 
 
मृत्यु का इंतज़ार तब सुंदर है
जब वह डर से नहीं, समझ से आए, 
जब वह अंत नहीं, परिवर्तन लगे
और आत्मा को विस्तार दिलाए। 
 
तब जीवन एक यात्रा बन जाता है, 
जहाँ हर मोड़ पर एक सीख है, 
और मृत्यु उस यात्रा का
सबसे गहरा संगीत है। 
 
तो मत डरो उस क्षण से
जो एक दिन निश्चित आएगा, 
बल्कि जी लो हर उस पल को
जो अभी तुम्हें बुलाएगा। 
 
क्योंकि जो जीवन को पूरी तरह जीता है, 
वह मृत्यु का इंतज़ार नहीं करता, 
वह उसे एक पुराने मित्र की तरह
शांत हृदय से स्वीकार करता। 
 
और अंत में
मृत्यु का इंतज़ार नहीं, 
जीवन का अनुभव ही सत्य है, 
क्योंकि जो इस क्षण को जी ले, 
उसके लिए मृत्यु भी एक मधुर रहस्य है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

किशोर साहित्य कहानी

सामाजिक आलेख

चिन्तन

ऐतिहासिक

ललित कला

बाल साहित्य कहानी

सांस्कृतिक आलेख

लघुकथा

काम की बात

साहित्यिक आलेख

सिनेमा और साहित्य

स्वास्थ्य

सिनेमा चर्चा

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं