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जंगल को सिद्धि के शिखरों तक पहुँचाने के लिए राजा शेर की अद्भुत बचत योजना

.राजा शेर ने वीडियो में अपील की, “मेरे प्यारे जंगलवासियों, आप सबको खाना कम करना पड़ेगा, जंगलभक्ति दिखाने का यही समय है।”

राजा शेर के सलाहकार भालूभाई जल्दबाज़ी में मिलने आए। चिंतित दिखाई दे रहे भालूभाई ने राजा से कहा, “महाराज, हमारे जंगल में कई चीज़ों की कमी पैदा हो गई है। पहले भी जंगल का प्रतिनिधिमंडल कमी की शिकायत लेकर आया था, तब हमने . . .”

भालूभाई को बीच में रोकते हुए राजा बोले, “मुझे याद है। उस समय मैंने हज़ारों क़दम उठाए थे, यह जंगलवासियों ने देखा था। फिर मैंने पाँच सूत्र भी दिए थे। शिकायत मत करो, संतोषी बनो, शान्ति बनाए रखो, धैर्य रखो, सहनशील बनो, ऐसे मुद्दों पर दिए गए मेरे भाषण की तो जंगल के साहित्यकारों में भी चर्चा हुई थी। उन्होंने उस भाषण को श्रेष्ठ चिंतनात्मक भाषण बताया था।”

राजा शेर फिर से भाषण शुरू कर देंगे ऐसा लगते ही भालूभाई ने बात को फिर मुद्दे पर लाते हुए कहा, “महाराज, जंगल की गंभीर स्थिति का अभी तक कोई समाधान नहीं आया है।”

“लेकिन चुनौतियों का सामना करने के लिए मैं जंगलवासियों को लगातार आत्मनिर्भर बना रहा हूँ। अब क्या समस्या है?” राजा शेर झुँझलाए।

“राजाजी, उस समय चुनौतियों की शुरूआत हुई थी, अब तो भारी कमी पैदा हो गई है। हमारा ख़ज़ाना ख़ाली होने लगा है। ऐसा चलता रहा तो जंगल की छोटी-बड़ी चुनावों में भी हमें बचत करनी पड़ेगी, भालू ने असली समस्या बताई।

“उसमें हमें क्या परेशानी होगी?” राजा शेर ने आँखें सिकोड़ते हुए कहा।

“हम सरकारी पैसों से हर जगह यात्राएँ करते हैं। हमारे मुख्यमंत्रियों को जब विधायकों की ज़रूरत पड़ती है, तब हम उन्हें ख़रीदने में मदद करते हैं और जब विपक्ष के नेताओं को . . .”

भालूभाई विस्तार से बता रहे थे, तभी ऊबकर शेर ने स्पष्ट किया, “तू भूल रहा है। नेताओं की ख़रीद-फ़रोख़्त और चुनाव का ख़र्च तो हमारे उद्योगपति मित्र गुलामदास गधा और पप्पू तोता उठाते हैं। हमने कभी सरकारी ख़जाने से ऐसा काम नहीं किया। मैंने नैतिकता बनाए रखी है।”

“माफ़ कीजिए महाराज, आप तो नैतिकता की जीवित मूर्ति हैं, लेकिन हम उद्योगपति मित्रों को सरकारी कॉन्ट्रैक्ट देते हैं। उससे उन्हें अच्छा-ख़ासा लाभ मिलता है, इसलिए वे हमारा बाक़ी ख़र्च सँभाल लेते हैं। अगर जंगलवासियों को सरकारी फ़ंड से सहायता करनी पड़ी तो हम नए कॉन्ट्रैक्ट नहीं दे पाएँगे। उसका असर उद्योगपति मित्रों के चंदे पर भी दिखाई देगा,” भालूभाई एक ही साँस में बोलकर हाँफ गए।

भालू की पूरी बात समझने के बाद राजा शेर के चेहरे पर चिंता दिखाई दी। थोड़ी देर सोचने के बाद शेर ने भालूभाई से पूछा, “तुझे क्या लगता है? मुझे क्या करना चाहिए?”

“जंगलवासियों को सलाह देनी चाहिए!” भालूभाई ने सलाह दी।

“अभी तो पाँच सूत्रों वाली सलाह दी थी। अब कुछ नया करना पड़े,” राजा शेर बोले और तभी उनके दिमाग़ में बिजली-सी कौंधी, “मैं नए तरीक़े से सलाह दूँगा!”

“जी महाराज, मैं भी यही कहने वाला था। आपकी सलाहों का असर समर्थकों में दिखाई देता है। फिर हम मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिए माहौल बना देंगे। उससे जंगलवासी ख़ुद ही चुनौतियों का समाधान खोज लेंगे,” भालूभाई थोड़ी देर रुके और फिर बोले, “राजाजी, सलाह देना, अपील करना, यही आपकी और हमारी सरकार की पहचान है। उससे अद्भुत काम होगा। इसमें हमारा रिकार्ड भी शानदार है।”

“तेरी बात सही है। मैंने पहले सब्सिडी छोड़ने की अपील की तो जंगलवासी मान गए। मैंने धैर्य रखने को कहा तो जंगलवासी मान गए। मैंने फ़िट रहने की अपील की तो जंगलवासियों में ट्रेंड बन गया। मैंने स्वच्छता की अपील की तो जंगलवासी ख़ुश हो गए। मैंने सीटी बजाने और दीये जलाने की अपील की तो जंगलवासी जुड़ गए। मैंने आत्मनिर्भर बनने की बात कही तो जंगलवासी मान गए। मैंने पकौड़े-भजिए बनाकर रोज़गार पाने की बात कही तो जंगलवासी मान गए। मैंने रील्स बनाओ, रोज़गार पाओ, ऐसा नारा दिया तो भी जंगलवासी मान गए,” राजा शेर को अपनी सारी अपीलें याद आने लगीं। मन ही मन बोले, ‘क्या असर है मेरे भाषणों का . . .’

राजा शेर आत्ममुग्ध होकर पूरी तरह खो जाएँ, उससे पहले भालूभाई ने ज़ोर से कहा, “तो महाराज, मैं वीडियो संदेश की व्यवस्था करवाता हूँ। आपका भाषण लिखने के लिए कविश्री कलकलिया कलमघसू को भेजता हूँ।”

सारी व्यवस्था हो गई। राजा शेर का वीडियो संदेश रिकार्ड हुआ और जंगल के सोशल मीडिया पर साझा कर दिया गया। वीडियो में राजा शेर ने अपील की, “हमें जंगल को महान बनाना है, इसलिए हम सबको खाना कम करना होगा। हवा की कमी न हो, इसके लिए जितना हो सके साँस रोकने की प्रैक्टिस करनी होगी। प्यास असह्य हो तभी पानी पीना। शॉपिंग बिलकुल मत करना। मैं बंदरों से अपील करूँगा कि वे एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कम कूदें। पत्तों को गिरने से बचाओ। पक्षी उड़ते समय पंख कम फड़फड़ाएँ। जानवर चलना कम करें। हो सके तो बिलों, गुफाओं और घोंसलों में ही भरे रहें। यात्राएँ न करें। यही सच्ची जंगलभक्ति है।”

अगले दिन ‘जंगल न्यूज़’ में जंगलवासियों ने देखा कि राजा शेर 5-10 दिनों की यात्रा पर निकल चुके थे . . . 

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