बंगाल चुनाव में हिंसा टालिए: ट्रम्प की शान्ति अपील
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
बंगाल में चुनाव घोषित होते ही ट्रम्प घबरा गए। उन्होंने तुरंत नेतन्याहू को फोन किया, “डियर दोस्त, अब हमें ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध रोक देना पड़ेगा।”
नेतन्याहू नाराज़ हो गए, “अरे यार, ये तो अभी झाँकी है, आगे लड़ाई बाक़ी है।”
ट्रम्प उलझ गए, “हैं? ये क्या मतलब?”
नेतन्याहू हँसते हुए बोले, “दोस्त, अगर तुम मेरे भारत वाले भाइयों से थोड़ा ठीक से दोस्ती निभाओगे, तो तुम्हें ऐसे नारे सुनने और सीखने मिलेंगे। वे लोग ऐसे नारों पर ही चुनाव लड़ जाते हैं।”
ट्रम्प के माथे पर पसीना आ गया, “हाँ . . . चुनाव। मैंने तो चुनाव की ही बात करने के लिए फोन किया था।”
नेतन्याहू फिर हँसने लगे, “अरे बॉस, आपकी तो वैसे भी ये राष्ट्रपति के रूप में आख़िरी टर्म है। उसके बाद क्या आप मेलानिया को चुनाव लड़वाओगे या इवांका को? चलो, भारत वालों से आपने इतना तो सीख लिया कि लोकतंत्र में भी वंशपरंपरा आगे बढ़ानी चाहिए।”
ट्रम्प ने दाँत भींचे, “अरे यार, यहाँ अमेरिका में भी मेरी बात कोई शान्ति से नहीं सुनता और पूरी दुनिया में भी मुझे कोई गंभीरता से नहीं लेता। अब प्लीज़, आप तो मेरी बात ध्यान से सुनिए। मैंने सुना है कि बंगाल में चुनाव दुनिया के किसी भी युद्ध से ज़्यादा भयंकर होते हैं। वहाँ कार्यकर्ता आमने-सामने नारे नहीं लगाते, बल्कि बमबारी करते हैं। एक-दूसरे के हाथ काट देना या सिर फोड़ देना वहाँ चुनाव में बहुत आम बात है। मैं उन लोगों से शान्ति की अपील करना चाहता हूँ कि बिना ज़्यादा हिंसा के, प्यार से चुनाव लड़ें।”
नेतन्याहू ने हँसी रोकते हुए कहा, “देखो, मुझसे कहा तो कहा, लेकिन किसी और से मत कहना। दुनिया को लगेगा कि ट्रम्प जैसे ट्रम्प हिंसा और ख़ून-ख़राबे से डर गए।”
ट्रम्प चिढ़कर बोले, “भाई, मुझे हिंसा से डर नहीं लगता। डर सिर्फ़ इतना है कि अब बंगाल के चुनाव में जब धूम-धड़ाका शुरू होगा, तो हमारी लड़ाई लोग भूल जाएँगे। दुनिया भर के टीवी चैनलों पर मेरी टीआरपी गिर जाएगी। मैं दुनिया के किसी भी देश के बीच युद्धविराम की घोषणा कर सकता हूँ, लेकिन बंगाल में तो मेरे कहने से कोई युद्धविराम करेगा, ऐसा नहीं लगता।”
नेतन्याहू बोले, “अरे यार, हमारी लड़ाई तो अभी आधी ही हुई है और तुम ऐसी ढीली-ढाली बातें करने लगे। चलो, तुम्हें युद्ध का जोश चढ़े, इसके लिए ममता बनर्जी को कॉन्फ़्रेंस कॉल पर ले लेता हूँ।”
ट्रम्प घबरा गए और तुरंत फोन काट दिया। क्योंकि चुनाव और युद्ध, दोनों ख़त्म होने के बाद महँगाई बढ़ती ही है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | वीरेन्द्र बहादुर सिंहनवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस…
60 साल का नौजवान
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | समीक्षा तैलंगरामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…
(ब)जट : यमला पगला दीवाना
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | अमित शर्माप्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- अक्षय कुमार—बोतल का बादशाह, कंगना—सिलेंडर क्वीन
- आनंदो . . . आनंदो, एल नीनो आ रहा है
- आरक्षित मादाओं के नाम पर, प्रतिनिधित्व नर का: राजा सिंह के निजी सलाहकार रीछभाई की रणनीति
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- गैस कंट्रोल और गेस्ट कंट्रोल
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- नेताओं पर ब्रांडेड जूते फेंके जाएँ, तभी प्रगति कहलाएगी
- पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बंगाल चुनाव में हिंसा टालिए: ट्रम्प की शान्ति अपील
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह की काम करने की पद्धति: ‘सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।’
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो: विपक्ष के नेता खरगोशलाल का नया सूत्र
- शान्तिप्रिय साहित्यकारों का ठंडे दिल से युद्ध चिंतन
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर
- साल 3032 में शायद
- हमारी गारंटी, वर-कन्या समय पर स्टेज पर पधारेंगे . . .
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
कविता
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- एकांत का संगीत
- कंक्रीट के जंगल और उसमें जलता मनुष्य
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- ठंडे दिल के योद्धा
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- धरती का दोहन
- नारी हूँ
- पुरुष की ख़ामोशी
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा
- बेटी हूँ
- भीतर का युद्ध और अंतिम विजय
- भेड़
- मछली, जल और जाल
- मनुष्य
- माँ
- मृत्यु का इंतज़ार
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- वसंत-ग्रीष्म के मजियारे आँगन से
- वॉर पॉल्यूशन: युद्ध की राख में जलती पृथ्वी
- शब्द
- शीशों का नगर
- सावधानी के बीच चूक
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
सामाजिक आलेख
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
चिन्तन
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
पुस्तक चर्चा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं