उम्मीदवार चुने जाने के बाद मतदाता पिटते हैं
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
“कहावत है न, ‘समझाने से न माने, हार खाने के बाद माने।’ कई लोग ऐसे हठीले होते हैं, जो किसी की अच्छी सलाह नहीं मानते, लेकिन जब झटका खाते हैं या हार जाते हैं, तो चुपचाप बैठ जाते हैं। पश्चिम बंगाल में बेलगाम हुईं ममता दीदी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ? बंगाल हाथ से गया और सत्ताधारी पार्टी को कोसने वाली गालियाँ भी मुँह में ही रह गईं। क्या कहते हो, पिरथी काका?”
रविवार की छुट्टी थी, इसलिए मैं और काका झूले पर बैठे गपशप कर रहे थे। मेरी बात सुनकर पिरथी काका ने सिर हिलाते हुए कहा, “यह कहने के बजाय कि ‘समझाने से नहीं मानी’, मुझे तो कहना पड़ता है कि ‘मेरी भारी-भरकम भार्या (पत्नी)’ नहीं मानती।”
मैंने पूछा, “क्या हुआ है काकी को?”
काका बोले, “डॉक्टर ने उनका वज़न कम करने को कहा है, क्योंकि शरीर का आकार-प्रकार बिगड़कर लगभग निराकार अवस्था में पहुँच गया है। मैंने बहुत मना किया, फिर भी वह एल्यूमिनियम की सीढ़ी पर चढ़कर ऊपर रखे बड़े-बड़े बरतन, स्टील के डिब्बे और कड़ाही नीचे उतारने लगीं। यदि उन्हें टोको तो एक ही बात दोहराती हैं कि डॉक्टर ने वज़न उतारने को कहा है। अब उन्हें कौन समझाए कि डॉक्टर ने शरीर का वज़न कम करने को कहा है, मचान पर रखा सामान उतारने को नहीं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मेरी जीवनसंगिनी समझाने से नहीं मानती।”
हमारी बातें सुन रही काकी तुरंत पसीना पोंछते हुए कमरे में आईं और काका से बोलीं, “जरा शादी का फोटो एल्बम तो दिखाओ अपने भतीजे को। उसे पता तो चले कि शादी के समय मैं कितनी पतली-दुबली थी। बाद में बच्चे हुए तो शरीर थोड़ा भर गया, इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”
पिरथी काका तुरंत बोले, “मैं सिर्फ़ तुम्हारी बात नहीं कर रहा। बहुत-सी लड़कियाँ शादी से पहले व्यायाम करती हैं, डाइटिंग करती हैं, वॉक पर जाती हैं और शरीर को एकदम संतुलित रखती हैं। लेकिन जैसे ही कोई दूल्हा उन्हें पसंद कर लेता है और शादी हो जाती है, वे निश्चिंत हो जाती हैं। फिर खाओ, पियो और मौज करो। दूल्हे का दिल जीतने का लक्ष्य तो पूरा हो गया, अब शरीर सँभालने की क्या ज़रूरत? फिर धीरे-धीरे शरीर फूलता जाता है। जब यह बढ़कर डबल फ़िगर तक पहुँच जाता है तो जॉनी वॉकर के गीत को थोड़ा बदलकर गाना पड़ता है:
“जाने कहाँ मेरा
फ़िगर गया जी,
अभी-अभी अच्छा था,
बिगड़ गया जी।”
काका की बात सुनकर मैंने कहा, “हमारे देश की चुनावी राजनीति में भी कुछ ऐसा ही होता है। चुनाव जीतने के लिए कितने-कितने नुस्ख़े अपनाए जाते हैं! महँगाई न बढ़े इसका ध्यान रखा जाता है, फ़ुज़ूल ख़र्चों पर नियंत्रण किया जाता है, मतदाताओं को हथेली पर रखा जाता है। लेकिन चुनाव जीतते ही महँगाई और ख़र्चे फिर बढ़ने लगते हैं। जिस राज्य में सत्ता मिलती है, वहाँ के लोगों समेत पूरे देश को महँगाई की मार झेलनी पड़ती है। तब लगता है कि सज़ा किसी और की ग़लती की जनता को मिल रही है। आख़िर बढ़ती क़ीमतें कब क़ाबू में आएँगी?”
मेरी बात सुनकर पिरथी काका बोले, “चुनावी राजनीति में यही होता है। चुनाव के बाद जनता की चटनी बन जाती है। नेता चुने जाते हैं और बेचारी जनता पिटती है। सही कहा न?”
महँगाई की चर्चा के बीच मैंने काका से पहेली पूछी, “गुजरात के ऐसे कौन-से दो गाँव हैं, जिनके नाम में महँगाई की गूँज सुनाई देती है?”
सिर खुजलाते हुए पिरथी काका बोले, “तू मेरी बुद्धि की परीक्षा लेना चाहता है? तो सुन, वे दो गाँव हैं भावनगर और दामनगर। सही कहा न?”
फिर बोले, “महँगाई की इस भूतावली से तो गली के डाधिया, लालिया और भूरिया नाम के कुत्ते भी सारी रात अंग्रेज़ी में सवाल पूछते रहते हैं कि आख़िर यह महँगाई बढ़ी कैसे?”
मैंने कहा, “काका, यह तो नई बात बताई। कुत्ते भला अंग्रेज़ी में कैसे सवाल पूछते हैं?”
पिरथी काका बोले, “तुझे पता है न कि रात में आवारा कुत्ते भूत-प्रेत देखकर भौंकते हैं? अब वे महँगाई के भूत से डरकर भौंकते हैं। ध्यान से सुनना अंग्रेज़ी में पूछते हैं, ‘हाउ . . . हाउ . . . हाउ . . . ’ और हिंदी में पूछते हैं, ‘भाव . . . भाव . . . भाव . . .’ यानी इतने भाव (दाम) कैसे बढ़ गए?”
मुझे याद आया तो मैंने कहा, “अब तो डॉग बिस्किट के दाम भी बढ़ गए हैं। अभी मैं अपने पाले-पोसे आलसी ‘आल्शेशियन’ के लिए आयातित डॉग बिस्किट लेने गया था, तब पता चला।”
पिरथी काका झुँझलाकर बोले, “मैं भी अपने डॉगी के लिए डॉग बिस्किट लेने गया था। दुकान वाले से कहा कि एक किलो डॉग बिस्किट दे दो। उसने पूछा कि यहीं खाएँगे या घर ले जाएँगे? उसके इस सवाल से मुझे इतनी जलन हुई कि बिना बिस्किट लिए ही लौट आया।”
मैंने हँसते हुए कहा, “काका, कुत्ता तो इंसान का सबसे वफ़ादार दोस्त माना जाता है। दोस्त जो खाए, उसे खाने में क्या हर्ज है?”
मेरी बात सुनकर काका बोले, “तू बड़ा समझदार बन रहा है! उन नेताओं को डॉग बिस्किट खिलाकर आ, जो मतदाताओं के प्रति वफ़ादार नहीं रहते। शायद उनमें भी वफ़ादारी के गुण आ जाएँ।”
मैंने कहा, “काका, हमारा मुश्किल पड़ोसी देश पाकिस्तान तो दुनिया भर से माँग-माँगकर लगभग ‘भिखिस्तान’ बन गया है। अब तो उसे बारबार मदद देकर थके हुए देश उसके नेताओं को सिर्फ़ गुदगुदाकर ही ख़ुश कर देते होंगे।”
पिरथी काका ने कहीं पढ़ा हुआ एक सुविचार सुनाया, “A man is not poor if he can still laugh.” (यदि कोई व्यक्ति अभी भी हँस सकता है, तो वह ग़रीब नहीं है)
मैंने पूछा, “सच-सच बताइए, यह सुविचार आपने कहाँ सुना?”
काका बोले, “चमत्कारी बाबा बेकारनाथ के मुख से।”
मैंने पूछा, “यह बाबा बेकारनाथ कौन-सा चमत्कार करते हैं?”
काका बोले, “जो लोग बेरोज़गार हैं, वे उनका दिया तावीज़ बाँध लें तो नौकरी मिल जाती है, ऐसी मान्यता है।”
मैंने फिर पूछा, “लेकिन बाबा ख़ुद संन्यासी बनकर बेकारनाथ क्यों बने?”
पिरथी काका बोले, “वे नौकरी पाने के लिए बहुत भटके, चप्पलें घिस डालीं, पर कहीं काम नहीं मिला। आख़िर भूखे मरने से अच्छा समझा कि बाबा बन जाएँ और तावीज़ बाँटने लगें। बस, तब से उनकी दुकान ख़ूब चल रही है।”
काका की बात सुनकर मुझे हाल ही में महाराष्ट्र में पकड़े गए कुछ ढोंगी बाबाओं की याद आ गई और मैंने चार पंक्तियाँ सुनाईं:
“बने बैठे बाबाओं का ही
आज बोलबाला है,
जिन्हें नेता, अभिनेत्रियाँ और
नालायक़ लोग भी नमन करते हैं,
वे कितने क़िस्मत वाले हैं।
(बारी-बारी सबकी बारी,
महँगाई पड़ती सबको भारी।
महँगी चीज़ें, सस्ते इंसान।
फिर दिखती है दुष्टों की धूर्ताई,
उम्मीदवार चुने जाएँ और बाद में
मतदाता पिटते जाएँ)
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