अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

नक़ली नगरपालिका . . . ख़याल अच्छा है

 

“सर, मुझे बहुत बढ़िया आइडिया मिला है। हमारे यहाँ शहरों के प्रशासन का बेड़ा पार हो जाए ऐसा उपाय है,” सचिव ने मंत्रीजी को ख़ुशख़बरी दी। 

“वाह, यह आइडिया कहाँ से मिला? किसी फ़िल्म से या सोशल मीडिया से? या फिर दुनिया के किसी दूसरे देश से?” मंत्रीजी ने उत्सुकता से पूछा। 

“सर, अब हम आइडिया के मामले में भी आत्मनिर्भर हैं। उल्टा दुनिया के देशों को हमसे आइडिया लेने आना पड़ेगा। यह बिलकुल स्वदेशी घटना से आया हुआ आइडिया है, सर।”

मंत्रीजी ख़ुश हो गए।

“ठीक है, हम ऐसे ही थोड़े न विश्वगुरु हैं।”

सचिव ने आगे कहा, “सर, अभी सूरत में ऐसा हुआ कि एक जगह पर ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) हुआ। बाद में पूछताछ हुई तो नगरपालिका ने कहा कि हमने तो कोई ध्वस्तीकरण किया ही नहीं। मतलब कोई नक़ली नगरपालिका वाले आकर ध्वस्तीकरण करके चले गए।”

“क्या?” मंत्रीजी की आँखें चौड़ी हो गईं। “हमारे यहाँ अब नक़ली नगरपालिका भी खड़ हो गए? नक़लीपन का इतना विकास ज़मीनी स्तर तक? इससे तुमने कौन-सा आइडिया निकाला?”

सचिव थोड़ा संकोच के साथ बोला, “सर, आप तो जानते ही हैं कि नगरपालिकाओं में पानी, कचरा, सड़कों के गड्ढे, अतिक्रमण जैसे बहुत सारे सवाल होते हैं।”

इस बार मंत्रीजी ने आँखें तरेर लीं, “व्हाट? लगता है तुम किसी विपक्षी नेता के साथ चाय पीकर आए हो।”

सचिव ने मंत्रीजी की ख़ुशामद करते हुए कहा, “सर, आपके राज में तो विपक्ष की पानी माँगने की भी हिम्मत नहीं बची है, वे किसी को क्या चाय पिलाते होंगे।”

“हाँ, ठीक है,” मंत्रीजी थोड़ा प्रसन्न हुए। फिर पूछा, “अब यह बताओ कि वह आइडिया क्या है?”

“जी सर, मैं यही कह रहा था कि अब से शहरों में कोई भी छोटी-बड़ी समस्या हो तो हम कह देंगे कि यह सब किसी नक़ली म्युनिसिपैलिटी का कारनामा है। नए-नकोर बने रास्तों में गड्ढे पड़ जाएँ तो कहेंगे कि कोई नक़ली नगरपालिका वाले गड्ढे खोद गए। अतिक्रमण हो तो कहेंगे कि यह नक़ली म्युनिसिपैलिटी वालों ने कराया है। कहीं पानी नहीं आता हो या दूषित पानी आता हो तो कहेंगे कि यह नक़ली म्युनिसिपैलिटी की हरकत है। संक्षेप में कुछ भी ग़लत या अधूरा हो तो उसका ठीकरा इस नक़ली म्युनिसिपैलिटी पर फोड़ देंगे।”

मंत्रीजी ख़ुशी के मारे अपनी जगह से उठने ही वाले थे कि अचानक कुछ सोचकर फिर बैठ गए, “तुम्हारा आइडिया तो अच्छा है, लेकिन फिर जनता हमसे यह नहीं पूछेगी कि अगर नक़ली म्युनिसिपैलिटी का इतना उत्पात है तो तुम उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं करते?”

सचिव मंत्रीजी के पास जाकर बोला, “आप चिंता मत कीजिए। आजकल जनता असली सवाल पूछना ही भूल गई है। पूरी जनता भी नक़ली मुद्दों में ही उलझी रहती है।”

मंत्रीजी और उनके साथ सचिव भी ज़ोर से बिलकुल असली हँसी हँस पड़े। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कहानी

कविता

काम की बात

कहानी

किशोर साहित्य कहानी

सामाजिक आलेख

चिन्तन

ऐतिहासिक

ललित कला

सांस्कृतिक आलेख

लघुकथा

तकनीकी

सिनेमा और साहित्य

स्वास्थ्य

सिनेमा चर्चा

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं