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तुम केवल

तुम केवल
अक्षरों की पहचान को ही
पढ़ने का नाम देते हो
मगर मैं इसके परे भी
पढ़ पाता हूँ बहुत कुछ
पिताजी के गुस्साने पर
माँ की आँखों का दर्द
भाई के बहानों में छिपा झूठ
या पड़ोसी के बेटे की कुटिलता
और रिश्तों में पसरी तटस्थता,
हाँ, यह भी पढ़ पाता हूँ मैं
कि मुझे मूल्यों का पाठ पढ़ानेवाले
ख़ुद कितने मूल्य सहेजते हैं।
मगर तुम्हारे लिए इतना पर्याप्त नहीं
पढ़ने के कौशल के लिए,
तुम तो आज भी बस
अक्षरों की ही पहचान को
पढ़ने का नाम देते हो।

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