अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

यात्री

मौन, मैं अनजान फिर बोलो कहाँ आवास मेरा !

जिन्दगी की राह रुकने को नहीं विश्राम-बेला,
आज है यदि साथ लेकिन कल कहीं रहना अकेला !
राह में इस भाँति कितने सुहृद् छूटे, बन्धु छूटे,
भार उर पर रह गया सम्बन्ध के सब तार टूटे !
स्मृतियाँ अनगिन बनी रह जायँगी उर भार मेरा !


कामना छलना जहाँ औ' शब्द भी हों जाल केवल,
भावना अभिनय बने, लेकर बढूँ मैं कौन संबल !
पर न मैं प्रतिबन्ध कोई भी लगाना चाहती हूँ,
इसी क्रम में, मित्रवत्, तुमको समाना चाहती हूँ !
इन्हीं दो परिचय क्षणों के छोर पर अभियान मेरा !


इस अकेली यात्रा में राग से वैराग्य तक की,
मैं बनी बेमेल, मेले में अनेकों बार भटकी,
उसी स्नेहिल दृष्टि का अभिषेक चलती बार पा लूँ,
कर्ण-कुहरों मे गहन, आश्वस्ति देते स्वर समा लूँ
क्या पता अनिकेत मन लेगा कहाँ जाकर बसेरा !


दूर हूँ पर पास हूँ मैं, पास हूँ पर दूर भी हूँ ,
एक परिचय हूँ सभी की, दो दिनों की मीत भी हूँ,
चल रही, पाथेय लेकर, जगत की जीवन व्यथा का,
फिर नया अध्याय रचने के लिये अपनी कथा का,
मुक्त पंछी मैं जहाँ रह लूँ वहीं पर नीड़ मेरा !


यह थकन पथ की, विसंगतियों भरी जीवन -कथा यह,
अनवरत यह यात्रा, अनुतप्त भटकाती व्यथा यह !
कर्म जो कर्तव्य, मैं चुपचाप करती जा रही हूँ,
जगत के अन्तर्विरोधों से गुज़रती जा रही हूँ !
यहाँ कुछ अपना न था, क्या नकद और उधार मेरा !


रखा जाता यहाँ पर पूरा हिसाब-किताब पल-छिन,
कर लिया तैयार कागज, बाद में दीं साँस गिन-गिन !
अब अगर लिखवार ने पूछा कहूँगी - 'खुद समझ लो !
प्रश्न मुझसे क्यों, अरे, लिक्खा तुम्हीं ने, तुम्हीं पढ लो ;
निभा दी वह भूमिका, जिस पर लिखा था नाम मेरा !'
कहाँ मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा


मौन, मैं अनजान, फिर बोलो कहाँ आवास मेरा !

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कहानी

ललित निबन्ध

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

साहित्यिक आलेख

किशोर साहित्य कविता

बाल साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं