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आख़िरी निवाला

 

रेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ़ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे भाग रहे थे। किसी के हाथ में कॉफ़ी थी, किसी के हाथ में खाना। प्लैटफ़ॉर्म के कोने में बैठा छोटू सूखी जीभ होंठों पर फेर रहा था। 

दो दिन से उसने खाना नहीं खाया था। 

तभी एक परिवार पास आकर बैठा। बच्चों ने पिज़्ज़ा खाया, हँसे, फोटो खींची और बचा खाना डस्टबिन में फेंककर चले गए। 

छोटू की आँखें उसी डस्टबिन पर टिक गईं। 

वह धीरे उठा, चारों ओर देखा और काँपते हाथों से कूड़ा छाना; उसे आधी रोटी मिली, जिसकी चमक उसकी आँखों में अमीरी से भी अधिक थी। 

जैसे ही वह रोटी मुँह तक ले गया, किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया। 

“नहीं बेटा, कूड़े की रोटी मत खा।” 

सामने एक बूढ़ा रिक्शावाला खड़ा था। उसने अपनी पोटली खोली। उसमें सिर्फ़ एक सूखी, ठंडी रोटी थी—शायद पूरी रात का सहारा। 

कुछ पल वह रोटी को देखता रहा, फिर छोटू के हाथ में रख दी। 

छोटू टूट पड़ा उस रोटी पर। भूख आँसू बनकर आँखों से बह रही थी। आधी रोटी खाने के बाद वह रुका और बचा टुकड़ा बूढ़े की ओर बढ़ा दिया। 

“आप खा लो दादा। माँ कहती थी, आख़िरी निवाला कभी अकेले नहीं खाना चाहिए।” 

बूढ़ा सन्न रह गया, काँपते होंठों से कुछ न बोला और छोटू को सीने से लगा लिया। 

उस रात प्लैटफ़ॉर्म पर दो भूखे इंसानों ने आधी-आधी रोटी खाई थी, लेकिन पेट से ज़्यादा, बरसों से भूखे पड़े दिल भर गए थे और कूड़ेदान में पड़ी महँगी रोटियाँ इंसानियत हार चुकी थीं। 

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