आलोचना में हिन्दी ग़ज़ल
समीक्षा | पुस्तक चर्चा डॉ. प्रभात कुमार प्रभाकर1 Feb 2020 (अंक: 149, प्रथम, 2020 में प्रकाशित)
पुस्तक : ग़ज़ल लेखन परम्परा और हिंदी ग़ज़ल का विकास
मूल्य : 150/-
प्रकाशन वर्ष : 2018
प्रकाशक : अनुकृति प्रकाशन,
165B, बुखारपुर, पुराना शहर, बरेली
हिन्दी भाषा जितनी लोकप्रिय हो रही है, ग़ज़ल आज उतनी ही लोकप्रिय है। आज के साहित्य में जिस तरह से छंद की वापसी हुई है, उसने ग़ज़ल को एक विधा के तौर पर मज़बूती प्रदान की है। ग़ज़ल आज मुशायरों की भी आबरू है और शायरों की शिनाख़्त भी।
हिन्दी में ग़ज़लें खूब लिखी जा रही हैं, लेकिन आज भी हिन्दी के परम्परावादी आलोचक ग़ज़ल को हिन्दी काव्य विधा के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
ग़ज़ल पर आलोचना भी कम लिखी जा रही है। इस लिहाज़ से हिन्दी के चर्चित शायर और ग़ज़ल के शोधार्थी डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री की इसी वर्ष प्रकाशित किताब 'ग़ज़ल लेखन परम्परा और हिन्दी ग़ज़ल का विकास' इस कमी को दूर करती है। इसमें जहाँ हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा को तथ्य के साथ रखा गया है, वहीं हिन्दी उर्दू ग़ज़ल से अन्य काव्य विधाओं का संबंध भी दर्शाया गया है।
किताब की छपाई, आवरण को बेहद ख़ूबसूरत ढंग से अनुकृति प्रकाशन बरेली ने प्रकाशित किया है। इस महँगाई के दौर में किताब की मूल्य भी सिर्फ़ एक सौ पचास रुपये रखी गई है।
कहना न होगा कि ये किताब हिन्दी ग़ज़ल की रवायत को और मज़बूती से रखेगी।
डॉ. प्रभात कुमार प्रभाकर
बारो, बेगूसराय, बिहार
मोबाइल 8709572350
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