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बिकने वाले

 

स्थानीय निकाय चुनाव में अग्रवाल जी दूसरी बार प्रधान बने तो वोटरों की ख़रीद-फरोख़्त के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। लोग आ कर बधाइयाँ दे रहे थे। इसी सिलसिले में एक सज्जन ने आ कर बधाई के साथ-साथ मज़ाकिया अन्दाज़ में कहा, “प्रधान जी आपको बहुत-बहुत बधाई, लेकिन हम आपको प्रधान नहीं मानते, क्योंकि हमने सुना है कि आप वोटरों को ख़रीद कर धन के बल पर प्रधान बने हैं।”

“बधाई के लिए हम आपका तहेदिल से आभार प्रकट करते हैं। रही बात वोटरों को ख़रीदने की तो आप स्वयं ही समझदार हैं, हम तो किसी को क्या ख़रीदेंगे और फिर बिकने वाले वोटर होते ही कितने हैं? ज़्यादा से ज़्यादा दस प्रतिशत! जनाब, यदि सारे ही बिकने वाले होते तो आज डॉ. मनमोहन सिंह के स्थान पर टाटा बिरला या अंबानी बंधुओं में से कोई एक प्रधानमन्त्री होता,” अग्रवाल जी ने जवाब दिया। 

अग्रवाल जी के इस जवाब से वे सज्जन तो सहमत हुए ही मगर सुनने वाले भी सोचने पर मजबूर हो गये।

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