फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानियाँ: इश्क़ के आगे जहां कुछ और भी है
आलेख | साहित्यिक आलेख प्रो. हरीशकुमार शर्मा1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ने पहली कहानी ‘बट बाबा’ लिखी, जो सन् 1944 में ‘विश्वमित्र’ में प्रकाशित हुई। यहीं से उनके साहित्यिक जीवन की सही अर्थों में शुरूआत मानी जा सकती है। यद्यपि कविताएँ वे विद्यार्थी जीवन से ही लिख रहे थे, परन्तु कोई ख़ास पहचान तब तक उनको साहित्य जगत् में नहीं मिली थी। ख़ास पहचान तो उन्हें यद्यपि कहानियाँ, रिपोर्ताज लिखने से भी तब तक नहीं मिली; जब तक ‘मैला आंचल’ प्रकाशित होकर प्रसिद्ध नहीं हो गया। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तारी के बाद भागलपुर के कारा जीवन में अपने आदर्श सतीनाथ भादुड़ी के सान्निध्य में रहने का उन्हें बहुत लाभ हुआ। भादुड़ी जी ने ही उनसे कहा था, “तुम गद्य माने गल्प, कथा, कहानी आदि क्यों नहीं लिखते? कहानी तो देखता हूँ अच्छा जमा सकते हो।” (रेणु रचनावली-5, पृष्ठ 111) हुआ वस्तुतः यह था कि एक बार जेल में जमे कवि सम्मेलन में रेणु जी ने भी कविता पढ़ी। ‘आगा खाँ के राजभवन में’ पंक्ति से शुरू हुई मुक्त छंद की इस लंबी कविता को गाँधीवादी वृद्ध श्रोताओं ने आपत्ति उठाकर पूरा पढ़ने नहीं दिया। उदास रेणु से वह प्रसंग और वह लंबी कविता सुनकर भादुड़ी जी ने उनके भीतर के कथाकार को पहचाना था और कथा-लेखन की ओर प्रेरित किया था।
जेल से छूटने और बीमारी से उबरने के बाद रेणु ने कई कहानियाँ और रिपोर्ताज लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे। परन्तु, उनकी कहानियों की ओर भी विशेष ध्यान साहित्यरसिकों का ‘मैला आँचल’ की प्रसिद्धि के पश्चात् ही गया, यह कहा जा सकता है। ध्यान देने की बात यहाँ यह भी है कि 1944 से ही कहानियाँ लिखने वाले रेणु का प्रथम उपन्यास ‘मैला आँचल’ सन् 1954 में आया और दूसरा ‘परती परिकथा’1957 में। लेकिन, प्रथम कहानी-संग्रह ‘ठुमरी’ इन दोनों उपन्यासों के प्रकाशन के पश्चात् ही सन् 1959 में आ सका। ऐसे, उनके उपन्यासों की तरह कहानियाँ भी कम लोकप्रिय नहीं रही हैं। ‘तीसरी कसम’ जैसी कालजयी कहानी को कौन भूल सकता है भला, जिसकी लोकप्रियता का एक प्रमाण उस पर बनी फ़िल्म भी है। ‘लाल पान की बेगम, ‘पंचलाइट, ‘तीर्थोदक, ‘ठेस, ‘रसप्रिया’ जैसी अनेकानेक कहानियों की लोकप्रियता से कौन अवगत नहीं है?
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने कुल मिलाकर 60 से भी अधिक कहानियाँ लिखीं, जिनमें से बहुत सी उनके जीवनकाल में ही ‘ठुमरी’ (1959), ‘आदिम रात्रि की महक’ (1967), ‘अगिनखोर’ (1973) संग्रहों में प्रकाशित हुईं। रेणु द्वारा लिखी गई समस्त उपलब्ध कहानियों को भारत यायावर जी ने ‘रेणु रचनावली’ के खंड एक में संकलित कर दिया है। इस प्रथम खंड में रेणु जी की 63 कहानियाँ संगृहीत हैं।
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ लगभग नई कहानी के दौर के रचनाकार हैं। लगभग इसलिए कि नई कहानी आंदोलन का आरंभ नई कविता की ही भाँति सन् 1950 के बाद से माना जाता है; परन्तु रेणु 1944 से ही कहानियाँ लिख रहे थे। नयी कविता का दौर 1953 से शुरू माना जाता है। नयी कहानी आन्दोलन हिन्दी में 1955-56 से विशेष ज़ोर पकड़ता है और रेणु का पहला कथा-संग्रह ‘ठुमरी’ 1959 में प्रकाशित हुआ। अतएव एक कथाकार के रूप में रेणु का उत्कर्ष-काल नई कहानी के समय का ही माना जा सकता है, जब मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा जैसे कहानीकार अपनी कहानियों से धूम मचाए हुए थे। साथ ही अज्ञेय, यशपाल, जैनेंद्र, अमरकांत, भीष्म साहनी जैसे स्थापित साहित्यकार भी कथा-साहित्य रच रहे थे। प्रायः इसी समय मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोवती तथा उषा प्रियंवदा जैसी महिला कथाकार भी अपनी पहचान कथा-जगत् में बनाने को प्रयासरत थीं। इन सबके बीच बिना किसी आंदोलन से जुड़े हुए भी रेणु अपने अभिनव कथ्य तथा विशिष्ट संरचना-शिल्प के बूते हिंदी साहित्य में अपनी एक बड़ी जगह बना रहे थे और मोह तथा मोहभंग दोनों से दूर वे दूर-देहात के शोषण-चक्र में पिसते सामान्यजन के संघर्षों-संकल्पों-स्वप्नों को शब्द देकर उसके जीवट तथा अपराजेय आस्था की कथाएँ अपनेपन के साथ प्रस्तुत कर रहे थे। डॉ. मैनेजर पांडेय ने ठीक ही लिखा है, “उनकी कहानियों में न तो नई कहानी वाली मोह की रंगीनी है और न बाद के मोहभंग के काल का निषेधवाद। लोक जीवन से गहरी आत्मीयता और लोक संस्कृति में अटूट आस्था ने उनको अस्तित्ववादी प्रभावों से बचाया।” (मृदंगिए का मर्म, पृ. 143)
दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे भी आलोचक हैं जिन्हें नई कहानी आन्दोलन से रेणु को जोड़ा है। डॉ. रामदरश मिश्र अपने एक लेख में लिखते हैं, “. . . इन संग्रहों को एक साथ पढ़ लेने के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि नई कहानी की अधिकांश कहानियों की तरह रेणु की कहानियों की भी धुरी प्रेम या सेक्स ही है . . .। रेणु ने ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’ और ‘जुलूस’ में ग्राम-जीवन की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चेतना की परस्पर लिपटी पर्तों का उद्घाटन कर एक संश्लिष्ट चित्र दिया था, किन्तु कहानियों में वे प्रमुखतः सेक्स के ही इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहे हैं और वहीं से वे हल्के-हल्के ढंग से सामाजिक बदलाव की ओर भी किंचित संकेत देते रहे हैं।” (रेणु का रचना संसार, संपादक-विजय, पृष्ठ 123)
असल में रेणु ने ‘मैला आँचल’में रामकिरपाल सिंह को बँसबड़िया में मच्छरों से क्या कटवा दिया कि कुछ लोगों ने उनकी वही पहचान बना ली। उनकी कथा-रचनाओं में से उतने ही हिस्से को ढूँढ़कर या वैसी ही कहानियों का नोटिस लेकर उन्हें प्रेम या सेक्स के कथाकार तक सीमित कर देना चाहा। वास्तविकता यह है कि रेणु की कहानियों में भी उपन्यासों की ही भाँति लोकजीवन की वैविध्यमय छवियाँ अंकित हैं। रेणु का यह लोक गाँव से लेकर शहर तक फैला हुआ है और कहीं भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं होने पाया है। इसी लोक के मन के अद्भुत-अपूर्व से चितेरे हैं फणीश्वरनाथ रेणु। गाँव से लेकर नगर और महानगर तक विभिन्न परिस्थितियों में इसी लोकमन की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का रूपांकन उनके कथा-साहित्य में हुआ है। क्योंकि, उनका कथा-संसार विविधरूपात्मक है और लोक को समग्रता में चित्रांकित करने का प्रयास वहाँ है; अतः प्रेम या फिर सेक्स भी उसका एक अभिन्न अंग होने के कारण थोड़ा या अधिक वहाँ बार-बार आता दिखाई देता है। अब यह पढ़ने वाले की दृष्टि पर निर्भर है कि वह वहाँ पर कौन सी चीज़ पर अटकता-ठिठकता है और क्या उसे महत्त्वपूर्ण दिखाई देता है!
इसमें कोई संदेह नहीं कि रेणु की कुछ कहानियाँ ऐसी हैं अवश्य, जिनमें प्रेम या सेक्स प्रमुख केंद्रबिंदु के रूप में दिखाई देता है और सामाजिक बदलाव के यत्किंचित संकेत वहाँ प्राप्त होते हैं; तथापि यही रेणु के कहानीकार का परिचय नहीं है और न ऐसी कहानियों की संख्या बहुत अधिक है। रेणु की सामर्थ्य तो एक सामान्य ग्रामीणजन को नई दृष्टि से यथार्थ रूप में दिखाने तथा सुने-सुनाए यथार्थ के बर-अक्स स्वतः देखे-भाले अनुभवजन्य यथार्थ को सामने रख, उसके प्रति दृष्टि बदलने में है। जिनका वह ग्राम्य-यथार्थ देखा हुआ नहीं है, भोगा हुआ नहीं है, दूर की कौड़ी मात्र है; वे उसे देखकर चैंकते हैं, किन्तु-परन्तु करते हैं तथा आधे-अधूरे निष्कर्ष निकालते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ‘तीसरी कसम’ कहानी। इस कहानी के माध्यम से रेणु क्या दिखाना या सिद्ध करना चाहते हैं, उसके मात्र एक पक्ष तक ही बड़े आलोचकों से लेकर सामान्य शोधार्थी तक पहुँच सके हैं और वह वही है—प्रेम और सेक्स; जिसकी कल्पना हीरामन और हीराबाई के बीच की गई है। इसके आगे ‘जहां कुछ और भी है’—वहाँ तक पहुँचने का प्रयास नहीं किया गया।
‘तीसरी कसम’ में तन से सामान्य, पर मन के विशेष एक 40 वर्षीय प्रायः अधेड़ गाड़ीवान हिरामन और नौटंकी की नर्तकी अनिंद्यसुंदरी हीराबाई के बीच पनपे एक अव्यक्त, अमूर्त से प्रेम-सम्बन्ध को लेकर इस कहानी का महिमामंडन किया गया है और पन्ने-के-पन्ने रँगे गए हैं। वह उसका एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है, इससे कोई इन्कार नहीं है। पर एकमात्र यही कहानी का ध्येय नहीं है और न यह इतना आसान ही था। इसको अमीर–ग़रीब के बीच पनपे विषम प्रेम या ‘सूरत के बजाय सीरत पर क़ुर्बान’ जैसे फ़िल्मी फ़ार्मूले का प्रेम समझ लिये जाने के कारण ही फ़िल्म के नायक राज कपूर अंत में नायक-नायिका का मिलन करवा देना चाहते थे, पर न तो रेणु इसके लिए तैयार हुए और न फ़िल्म के निर्माता शैलेंद्र। यदि यह प्रेम ऐसा ही फ़ॉर्मूलाबद्ध और सहज होता तो भला दोनों को क्या आपत्ति हो सकती थी? फ़िल्म भी ख़ूब धूम-धड़ाके से चलती। लेकिन शैलेंद्र मात्र फ़िल्मकार नहीं थे, साहित्यकार थे। इसलिए उन्होंने इस कहानी की कथा-संवेदना को समझा, रेणु की भावना को समझा और तमाम दबावों के बावजूद उसका अंत यथावत रहने दिया।
वस्तुतः इस पूरी कहानी को यदि ध्यान से पढ़ा-समझा जाए तो हिरामन और हीराबाई के बीच के अनमेल और असम्भव से प्रेम-सम्बन्ध से भी आगे ध्यान जाएगा रेणु की स्त्री-दृष्टि पर। स्त्री को दी जाने वाली गरिमा और सम्मान पर। तब इस प्रेम का और भी उज्ज्वल स्वरूप निखरकर सामने आएगा। अन्यथा, कहानी के पाठक और फ़िल्म के दर्शक इस प्रेम . . . काम-सम्बन्धी प्रेम की असफलता पर हाथ मलते रह जाएँगे कि काश हिरामन और हीराबाई अंत में मिल गए होते! दोनों ने समाज की परवाह न कर साथ रहना स्वीकार कर लिया होता . . . आपस में विवाह कर लिया होता और ‘मैला आँचल’ के बालदेव तथा मठ की दासिन लक्ष्मी की भाँति एक सद्गृहस्थ के रूप में मज़े से जीवन बिता रहे होते। हीराबाई नाचती और हिरामन महुआ घटवारिन का गीत गाता! यहाँ यह सम्भव ही नहीं था, न हुआ; क्योंकि रेणु का उद्देश्य दूसरा था। अन्यथा जहाँ सम्भव था और उद्देश्य अलग था, वहाँ ताजमनी और जित्तन का ‘परती परिकथा’ का उदाहरण सामने है ही!
जिन लोगों का गाँव से सम्बन्ध रहा है नौटंकी मंडलिया देखने में जिनकी रुचि रही है वे लोग उनमें भूमिका निभाने वाले पात्रों की महत्ता और उनके प्रति लोगों के आकर्षण को समझते हैं। उन लोगों को तब नाटक कंपनियों में नाचने वाली लड़कियों-स्त्रियों के प्रति समाज-दृष्टि का भी ज्ञान होगा। यह दृष्टि बार-बार इस कहानी में सामने भी आती है। ऐसी स्त्री की, बावजूद एक बहुत बदनाम समाज-दृष्टि के, रेणु हीरामन और उसके जैसे कुछ साधारण गाड़ीवान पात्रों के माध्यम से पूरी छवि बदलकर रख देते हैं। याद रखें, यह कहानी अब से कम-से-कम 60-65 साल पुरानी है। हीराबाई कोई सामान्य नर्तकी नहीं है कि यहाँ-वहाँ नाचती फिरती हो और सर्वसुलभ हो। वह बड़ी-बड़ी कंपनियों में नाचती है। तो, स्पष्टतया उसमें रूप के साथ कुछ विशेष गुण या कला होगी। हीरामन जैसे मज़दूर वर्ग की पहुँच से वह बाहर की चीज़ है। जब वह पहली बार अप्रत्याशित ढंग से उसकी गाड़ी की सवारी बन जाती है और इतने क़रीब अपने को वह उसके पाता है तो उसके भीतर का अभिभूत भाव जाग्रत होता है। वह हर वह प्रयत्न करता है जिससे हीराबाई को गोपनीयता के साथ यथासम्भव पूर्ण सुविधाजनक स्थिति में उसके गंतव्य तक पहुँचा सके और उसे किसी तरह का कोई कष्ट न हो। अप्रतिम सौंदर्य, गुण तथा सहृदय मन की स्वामिनी का ऐसा सान्निध्य पाना उसके लिए ऐसे ही है, जैसे रुपहले परदे की किसी बहुत लोकप्रिय नायिका का सामीप्य किसी सामान्य जन को अनायास मिल जाए। आज की बात अलग है। पर, अब से बीस-तीस वर्ष पहले तक भी, जबकि सिने तारक-तारिका मात्र पर्दे पर ही दिखते थे, आज की तरह टीवी पर और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर बार-बार नहीं दिखते थे; तब का उनके प्रति आकर्षण जैसा ही आकर्षण हीरामन का हीराबाई के प्रति समझा जा सकता है। इसलिए दोनों में छिछले प्रेम-सम्बन्ध या विवाह जैसी तो कल्पना ही हास्यास्पद है। हाँ, यह प्रेम है अवश्य, पर वह एक बहुत बड़ी गरिमा और औदात्य लिए हुए है।
हीरामन इसलिए उसे नहीं सहेजकर रख रहा है कि वह उसने अपनी पत्नी या प्रेमिका का रूप देख रहा है। इसलिए इतने गोपन ढंग से ले जा रहा है कि उसे सुरक्षित तथा अधिकाधिक सुविधापूर्वक उसके गंतव्य तक पहुँचा सके, जो कि उसकी ज़िम्मेदारी है। कल्पना की जाए कि ‘तीसरी क़सम’ के ही दौर में या बीसवीं शताब्दी के अंत तक किसी सामान्य व्यक्ति की गाड़ी में कोई नामचीन फ़िल्मी हीरोइन लिफ़्ट लेती और उसे लंबी यात्रा का उससे साहचर्य प्राप्त होता तो क्या होता? रास्ते में बहुत सारी बातों के दरमियान हीराबाई हीरामन के बारे में बहुत कुछ जान लेती है। उसे यह भी पता चल जाता है कि हिरामन ने कभी नौटंकी नहीं देखी। अतः वह अति उदारतापूर्वक उसे इस अनुभव से दो-चार होने के लिए पास भेज देती है। एक नहीं, चार-चार पास। हीरामन के स्वभाव के बारे में वह यह भी जान गई है कि हीरामन अकेला नहीं आने वाला है। इसलिये चार-चार हीरामनों को एक साथ यह अवसर सुलभ कराती है।
अपनी सीमाओं का अहसास हीराबाई को बख़ूबी है तो हिरामन भी अपनी स्थिति से अनजान नहीं है। अगर हिरामन ने हीराबाई को उसके गंतव्य तक चुपचाप पहुँचा दिया होता और भाड़ा लेकर अपने काम में लग गया होता, तब एक बात थी। पर यहाँ परिस्थितियाँ ऐसी घटित होती चली जाती हैं कि जब तक हीराबाई मेले में रहती है, हीरामन का दूर-दूर का ही सही; उससे सम्बन्ध बना रहता है। यह एक लगाव उत्पन्न कर देता है दोनों के बीच। हिरामन हीराबाई के अपने प्रति सहज व्यवहार पर मुग्ध है तो हीराबाई उसके हीरे जैसे निश्छल मन पर रीझी हुई है। हीराबाई ने समझ लिया है कि हीरामन सचमुच हीरा है। इसलिए वह उसे तवज्जोह दे रही है। उसके साथियों के मन के विकार को वह भाँप लेती है, इसलिये उनको वैसा तवज्जोह नहीं देती। और, हीरामन की दृष्टि में इतनी बड़ी आभामंडल की स्वामिनी का उसको कुछ महत्त्व देना उसे अभिभूत किए हुए है। हीरामन भी उसके हीरे जैसे दमदमाते मन पर ही फ़िदा है। जिस गाड़ीवान को कोई सम्मान से नहीं देखता, एक सामान्य मज़दूर की तरह से ही बर्ताव उसके प्रति लोगों का, मालिकों का होता है; हीराबाई से मिले सहानुभूति और स्नेहसिक्त कोमल व्यवहार से उसका मन पिघल जाता है और उस स्थिति में पैसा (भाड़ा) गौण हो जाता है। आज तक उसे कोई ऐसा मिला ही नहीं था, जो थोड़ी-बहुत भी उसकी क़द्र करे, उसकी प्रतिभा को सराहे! मिला क्या, बल्कि स्त्री और वह भी अकेली तो उसे अपनी गाड़ी में बिठाने को ही पहली बार मिली है। वह भी ऐसी रूपसी, ऐसे स्नेह-तरल मन की स्वामिनी! वह उसके लिए क्या नहीं कर डाले! यही कारण है कि बिछोह के समय एक पल को उसका मन गहरी उदासी से भर जाता है, लेकिन बैलों को डाँटकर जैसे वह अपने मन को भी डाँट लेता है और उस राह पर फिर न चलने की तीसरी क़सम खा लेता है।
हीराबाई हिरामन को पहले मीता कहती है, फिर गुरुजी। वह उसे भाईसाहब या भैया भी कह सकती थी, लेकिन नहीं। वह एक नर्तकी है। उसे यह अधिकार नहीं। एक बार आरम्भ में उसे भैया कहकर सम्बोधित करती भी है। पर, अपनी सीमाओं को वह बख़ूबी जानती है। यदि ऐसा होता तो कहानी का पूरा प्रभाव भी खंडित हो जाता। मगर मीता कहने का मतलब प्रिय या प्रीतम कहना नहीं है, यह भी समझा जाना चाहिए। हीराबाई को देखकर और उसके व्यवहार से मन में कब की दबी पड़ी हसरत हीरामन के भीतर मचल उठी है, जिससे हीराबाई अनजान नहीं। पर, यह हसरत हीरा को ही पाने की है, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ, अपनी स्त्री में वैसे ही रूप-गुण और उसे समझने वाली की कल्पना वह अवश्य जगा गई है।
रेणु अपने में विशिष्ट प्रकार के कथाकार हैं। उनके कहानी-उपन्यासों का ही क्या, लगभग समूचे साहित्य का एक अलग ही अंदाज़ दिखाई देता है। रेणु के कथा साहित्य को समझने के लिए गाँव की जीवन-स्थितियों तथा गँवई-गाँव के व्यक्ति की मानसिकता को समझना होगा। रेणु के कथा-साहित्य में ध्यान देने की बात रेणु के अन्य पक्के देहाती पात्र भी हैं, जिनके मन में विशेष स्त्रियों के प्रति आदर देखते ही बनता है। उदाहरण के लिये ‘पलटू बाबू रोड’ उपन्यास की नायिका कुंतला कुमारी द्वारा राह चलते किसी देहाती को भाई साहब संबोधित करने मात्र से वह निहाल हो जाता है और धन्न धन्न कर उठता है। ‘तीसरी क़सम’ कहानी के हिरामन के उल्लास और अवसाद को भी इसी तरह देखना होगा। एक ऐसा प्रायः अधेड़ व्यक्ति जिसका न परिवार में सम्मान है, न गाँव में। जो सिर्फ़ परिवार के लिए रुपए कमाने की मशीन भर है। गाँववालों के लिए जाति, शिक्षा, धन, पद प्रभाव, रूप किसी भी दृष्टि से उसका बहुत महत्त्व नहीं है। वह अपनी गाड़ी से भाड़ा कमाने वाला एक सामान्य मज़दूर भर है। अपने काम से काम रखने वाले ऐसे व्यक्ति के भीतर की प्रतिभा को, उसके सुरूप मन को सराहकर कोई दो बोल बोल दे, वह भी कौन? चंपा के खिले फूल सी मह-मह करने वाली हीराबाई जैसी अप्रतिम रूप-गुण संपन्न स्त्री! जिसकी झलक सिर्फ़ रात में नाच के समय ही जनसामान्य को देखने को मिलती है, अन्यथा वह उनकी पहुँच से बहुत दूर है। तो ऐसे में उसके मन की क्या दशा होगी! यह भूलने की बात नहीं कि स्त्रियों में हीरामन का सर्वाधिक पाला अब तक उसकी भाभी से पड़ा है, जिसके सामने वह तो क्या उसका भाई भी चूँं नहीं कर सकता, जिसकी वह पत्नी है। इसके अतिरिक्त जिन स्त्रियों की छवि उसके भीतर बसी हुई है उनमें सर्कस कंपनी की मालिकिन, महुआ घटवारिन की माँ और अपने गाँव की लड़ते-झगड़ते समय सारा पानी उतारकर रख देने वाली स्त्रियों की है, जिनका ज़िक्र इस कहानी में ज़रूर नहीं है, पर रेणु की अन्य कई कहानियों एवं उपन्यासों में उनके दीदार हो जाते हैं।
हीराबाई ने तो एक तरह से देखा जाए तो हीरे जैसे मन वाले हीरामन का फ़ायदा ही उठाया है। पर, हीरामन उसकी अपने प्रति उदारता, सदयता के चलते उसके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार है। एक अप्राप्य सी वस्तु को अनायास इतनी निकटता से पा जाना और अकल्पनीय कल्पना का जीवन में साकार हो जाना हीरामन के भीतर की सुषुप्त कल्पनाओं को जगा जाता है और वह तरह-तरह की रम्य कल्पनाओं का अनुभव करने लगता है। रास्ते में एक तो ग्रामीण का बातूनी स्वभाव, दूसरे गाड़ी में बैठी विशेष सवारी की बोरियत काटने की ग़रज़, फिर उस सवारी का उसकी गीतकथा में रुचि लेना और सबसे ऊपर उसकी उस कला के प्रति प्रशंसा-भाव हीरामन को रास्ते में चुप नहीं रहने देते और वह गुण-ग्राहक के सम्मुख महुआ घटवारिन की गीतकथा के माध्यम से अपने ज्ञान, अपनी कला और उसके माध्यम से कहीं अपने मन को भी खोलकर रख देता है। पहली बार एक स्त्री को और वह भी इतनी सुंदर, गुणवान और ऊपर से उसकी कला की प्रशंसक स्त्री को अपनी गाड़ी में बैठाकर ले जाते समय उसकी पीठ में गुदगुदी भी लगती है, पत्नी को इसी तरह से गाड़ी में विदा कराकर ले जाने वाली न जाने कब की चिरसंचित साध भी उसके मन में कुलबुलाती है। परन्तु, इसका मतलब यह नहीं है कि वह हीराबाई को ही अपनी पत्नी के रूप में कल्पित कर लेता है या उससे विवाह की इच्छा उसके मन में जागृत हो जाती है। इस नायाब हीरे को वह सात पर्दों में बंद कर उसके गंतव्य तक इस प्रकार सुरक्षित पहुँचा देना चाहता है कि उसका सान्निध्य बस उसी की उपलब्धि रहे और अन्य कोई उसे न देख सके। परन्तु, मेले में पहुँचकर अपने साथियों को उसे बताना ही पड़ता है और इस बताने में भी कुछ ऐसा है कि उसके साथी उससे भी अधिक पवित्र भाव के साथ उसे देखते हैं तथा उसमें सिया सुकुमारी तक की झलक पा जाते हैं। ऐसी सवारी को लाकर हीरामन अपने साथियों के बीच विशिष्ट हो गया है, धन्य हो गया है। हीराबाई द्वारा नौटंकी देखने के लिए भिजवाए गए पास उसके वैशिष्ट्य तथा महत्ता को साथियों की निगाह में और भी बढ़ा देते हैं।
इस पूरी कहानी में देखने वाली विशेष बात है हिरामन तथा उसके साथियों का हीराबाई के प्रति पवित्र भाव। हिरामन के कारण उसके साथियों में भी हीराबाई के प्रति ग़लत विचार नहीं आते हैं और न ही पाठकों के। जिन कुछ छिछोरे लोगों के मन में ऐसे विचार आते हैं, तो चलती नौटंकी में उन्हें हीरामन और उसके साथी ठीक कर देते हैं। हीराबाई नर्तकी है, वे यह जानते हैं। समाज की दृष्टि में नर्तकी की क्या छवि होती है, इससे भी अनजान नहीं है। तथापि न तो हीराबाई के प्रति कोई ग़लत भाव वे अपने मन में ला सकते हैं और न किसी और के द्वारा प्रकट किए गए ग़लत विचार को सहन कर सकते हैं। इसके लिए वे ज़रूरत पड़ने पर भारी मारपीट तक कर डालते हैं। वे लोगों को दण्डित कर देते हैं, पर अपने मन में बसी हीराबाई की गरिमामय छवि को खण्डित नहीं होने देते। संपूर्ण कहानी का संयोजन इस प्रकार से लेखक ने किया है कि हिरामन और उसके साथियों में ही नहीं, पाठकों में भी हीराबाई के प्रति कुविचार नहीं आ पाते। उसका स्वरूप ‘सुरूप’ बनकर प्रस्तुत होता है, जिसमें तन का ही नहीं, मन का सौंदर्य भी सम्मिलित है।
समाज की दृष्टि में एक बदनाम औरत के प्रति ऐसे सम्मान का भाव, उसकी सुरक्षा के लिए चिंता, उसके कर्म से परे जाकर उसके मानवीय रूप में आस्था प्रकट करवाना यह बड़ी बात है। हीरामन को हीराबाई का न अतीत पता है, न भविष्य के बारे में वह जानता है; पर जितना संग-साथ उसका वर्तमान में हुआ है उससे उसने उसके मन के सौंदर्य को पहचान लिया है। रेणु शरीर से ऊपर मन के आकर्षण, कर्म से ऊपर चरित्र, देह की अपरूपता से आगे स्वभाव की सुरूपता को महत्त्व देते हुए नारी को उसके नारीत्व की गरिमा के साथ ही देखने की दृष्टि देते हैं और निस्संदेह यह कथा उस दृष्टि को उत्पन्न करती दिखाई पड़ती है। हीरामन और उसके साथियों की हीराबाई के चरित्र के प्रति निर्मल आस्था कहानी के पाठकों के मन की भी आस्था बन जाती है और अविकारी मन से वे हीराबाई के सौंदर्य के सच्चे स्वरूप को निरख-निहार पाते हैं।
नृत्य हीराबाई का पेशा है। अच्छा नृत्य-गान और उसके लिए उसकी प्रसिद्धि उसका विशेष कला-गुण है। लेकिन, उसके नर्तकी होने भर से उसकी मानवीय गरिमा से उसे वंचित कर देने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता। उसके प्रति बुरा भाव रखने का अधिकार किसी को क्यों हो? एक सिने तारिका के प्रति तो समाज का ऐसा भाव नहीं होता। रेणु हीराबाई को प्रसिद्ध सिने तारिकाओं के समकक्ष रखकर उसे वैसी ही गरिमा का अधिकारी बनाना चाहते हैं।
रेणु जितना कहते हैं उतना ही संभावनाओं के लिए भी अवसर छोड़ते हैं। हालाँकि उनके संकेत इससे पूर्व बहुत स्पष्ट होते हैं। हिरामन द्वारा तीसरी क़सम खाना भी अनेक संभावनाएँ उत्पन्न करता है। हीराबाई को विदा कर वह फिर कभी कंपनी की सवारी न लादने की तीसरी क़सम मात्र इसलिए नहीं खाता कि उसके मन में खिले प्रेम के फूल को एक झटके में तोड़कर हीराबाई चली गई। यहाँ ‘बिसरि गए हरिनाम’ वाला भाव भी कुछ हद तक सार्थक होता है। एक ऐसी सवारी उसकी गाड़ी में आयी कि जिसके कारण उसका कई दिनों का काम ठप हो गया। नौटंकी देखने की ख़राब लत लग रही थी सो अलग। ऊपर से भाभी का भय! तो, क्यों आगे वह ऐसा काम करे? रिक्त स्थान यानी डॉट डॉट जितना अर्थपूर्ण उनकी कहानियों के भीतर होता है, उतना ही बाहर भी; जिसको भरने के लिए कहानी के अंत में वे पाठक को पर्याप्त संकेत करने के बावजूद स्वतन्त्र छोड़ देते हैं।
ऐसे भी इस कहानी में अच्छी हैं या बुरी, पर स्त्रियाँ पुरुषों पर भारी हैं। चाहे हीरामन की भाभी हो, चाहे सर्कस कंपनी की मालिकिन, चाहे महुआ घटवारिन की सौतेली माँ—इन सबके सामने पुरुष पानी भरते नज़र आते हैं। वास्तव में तो यदि देखा जाए तो रेणु के समूचे कथा साहित्य में अनेक उत्कृष्ट स्त्री पात्र देखने को मिल जाते हैं। उनकी कहानियों में भी एक-से-एक श्रेष्ठ स्त्री पात्र मिल जाएँगे। असद् स्त्री पात्र भी हैं। पर, यह सत्पात्र ही हैं जो धरती को थामे हुए हैं और यही रेणु की कथाओं की धरती को भी थामे हुए हैं। उनकी कथाभूमि का सौंदर्य एवं शक्ति हैं ये पात्र। इन पात्रों के मन में कभी परिस्थितिवश विकार भले आ जाए, पर वह कलुष की सीमा तक नहीं पहुँच पाता। कलुषित होने से पहले ही यह अपने को थाम लेते हैं। यही इनका गौरव है और यही अंततः पुरुष की दृष्टि में इन्हें सम्मान का हक़दार बनाता है। जीवन सतत गतिशील है, घटनासंयुक्त है। पर, घटनाक्रमों से भरे यथार्थ जीवन में से रचनाकार देकर क्या जाता है, कौन-सी राह का अंगुलि-निर्देश करता है, यह महत्त्वपूर्ण है। इसी से उसके रचना कर्म की महत्ता का आकलन होता है। कहानी जीवन की होती है तो उसमें जीवन का यथार्थ तो आएगा ही, पर उस यथार्थ का आदर्श क्या हो; इसका दिशा-संकेत भी रचना में होना आवश्यक होता है और यही उसकी महत्ता बढ़ाता है। सुवास कुमार से बातचीत में लेखक कहते भी हैं, “मान लीजिए सामाजिक नैतिकता का हृास हुआ तो इसका मतलब क्या यह है कि अब ‘सदा सत्य बोलो’-जैसी चीज़ लिखी जाये? आदर्श यथार्थ से और यथार्थ आदर्श से निरपेक्ष कैसे हो सकता है?” (रेणु रचनावली-4, पृ. 403)
चार बरतन यदि एक साथ होंगे तो आपस में वे कभी टकराएँगे भी और आवाज़ भी करेंगे। रेणु के यहाँ परिवार और समाज में झगड़े भी होते हैं, कहासुनी भी होती है, शिकवा-शिकायत भी ख़ूब चलता है और ताने भी मन भरकर दिए जाते हैं। यहाँ तक कि मारपीट की नौबत भी आ जाती है। फिर भी एक राग-सूत्र है जो टूटने की नौबत तक नहीं आता। यही अंतरतम का राग या गहरा आपसी लगाव लोगों को अंततः मिला देता है, जोड़ देता है। हँसी-ख़ुशी बहाल कर देता है-परिवार की भी, समाज की भी। ग्रामीणों और विशेषकर महिलाओं के बीच के मनमुटाव और झगड़े तो रेणु इतने जीवन्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि कभी-कभी तो लगता है जैसे वहाँ वे रस ले रहे हों। पर, वे रस इसलिए ले पाते हैं कि उन्हें मालूम है इन झगड़ों की चरम परिणति क्या है? उनके यहाँ झगड़े मेल होने की प्रक्रिया हैं, शत्रु-भाव का प्रकर्ष नहीं। ‘लाल पान की बेगम’ को इसके एक उत्तम उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
रेणु जी लोक और लोक-संस्कृति के प्रति यूँ ही गहरे अभिभूत नहीं हैं और गाँव ऐसे ही उनके भीतर गहरे लगाव के साथ नहीं जमा बैठा हुआ है। वहाँ कुछ है ऐसा, जो विशिष्ट है। जिसे वे बार-बार दिखाना चाहते हैं। जो नहीं है, उसे लाना चाहते हैं और यों अपनी एक बेहतर समाज की कल्पना को मूर्त रूप देना चाहते हैं। लोग हैं या होंगे तो उनके बीच ईर्ष्या, द्वेष, कलह, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, कहा-सुनी सब कुछ होगा ही; पर वह किस सीमा तक हो, ‘लाल पान की बेगम’ जैसी कहानियाँ राह दिखाती हैं। बिरजू की माँ जो थोड़ी देर पहले तक अपनी कुंठा के कारण . . . और यह कारण था उसके पति द्वारा मेला जाने के लिये बैलगाड़ी का इंतज़ाम न कर पाना, जिसका ढिंढोरा वह पहले ही महल्ले में पीट चुकी थी। तो जिस कारण से वह बड़े-छोटे किसी का लिहाज़ न कर सबसे उलझ-उलझ जा रही थी; कुंठा का वह कारण ख़त्म होते ही, मतलब यह तय होते ही कि अब कल उसकी गाड़ी मेले के लिए जाएगी; उसमें एक ऐसा औदात्य और बड़प्पन आ जाता है कि जिन-जिनसे वह टकराई थी, उन सबके प्रति उसके मन में प्रेम, सहानुभूति, करुणा और ममत्व उमड़ने लगता है। फिर, ‘लाल पान की बेगम’ ही क्यों? ‘पंचलाइट’ हो, ‘ठेस’ हो, ‘तीर्थोंदक’ हो, ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’
हो-ऐसी सभी-की-सभी कहानियाँ मानवीय भूल-ग़लती या तात्कालिक आवेश के ऊपर जो हृदय का एक बड़प्पन है, उदात्त मानवीय वैशिष्ट्य है—मानो उसी का आख्यान रचती हैं। उसी का आश्वासन देती हैं। उनकी कहानियों में जाति, धर्म, गाँव, टोला, महल्ला, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर तमाम तरह के भेदों के बावजूद समाज में एक रागात्मकता देखने को मिलती है। आपसी लगाव दिखता है। और समाज इसी से चलता है। ऐसे ही आगे बढ़ता है।
कुछ अन्य कहानियों की बात करें तो रेणु की पहली ही कहानी है—‘बट बाबा’। आज जब प्रकृति-संरक्षण की बात की जा रही है, तब यह कहानी और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। प्रकृति रेणु के लिए सौंदर्य से आँखें चार कर लेने वाली मोहक वस्तु भर नहीं, वह जीवन की चिरसंगिनी है; जिसके साथ उनकी और उनके देखे-भाले लोगों की बहुत सी अपेक्षाएँ, अभिलाषाएँ तथा आवश्यकताएँ जुड़ी हुई हैं। वह उनकी रक्षक है, फलदात्री है, गाढ़े विपद की साक्षी और साथी है। उससे वे दिल खोलकर अपनी बात कह सकते हैं, मन्नत माँग सकते हैं, उसके लिए रो सकते हैं, शोक मना सकते हैं। इसके उदाहरण के रूप में रेणु की इस पहली ही कहानी ‘बट बाबा’ को लिया जा सकता है। गाँव के बाहर खड़े विशाल ‘बट बाबा’ की संपूर्ण उपयोगिता को बताने के पश्चात् जब सूखे हुए उस बटवृक्ष को काटने के लिए गाँव के ज़मींदार का अमला आकर मज़दूरों से उस पर कुल्हाड़ी चलवाता है, तब गाँव की स्थिति देखिए, “एक ही साथ पेड़ के सूखे तने पर साठ-साठ कुल्हाड़ों का बार हुआ-धड़धड़ खड़खड़ खड़क . . . गाय, बैल, घोड़े, बकरे चैककर गाँव से भागे। कुत्ते भौंकने लगे। भयभीत पक्षियों ने कलरव आरंभ कर दिया। छोटे-छोटे बच्चे डरकर माँ की छाती से चिपट गए। गाँव के अर्धनग्न नर-नारियों तथा शिशुओं के कंकालों की क़तार . . . एक टक से देख रही थी। कोई-कोई मर्द भी फूट-फूट कर रो रहा था, मानो सबों के कलेजे पर ही कुल्हाड़े चलाए जा रहे हैं।”
‘पार्टी का भूत’ कहानी में राजनीतिक दलों की बखिया उधेड़ी गई है और राजनीति से मोहभंग की स्थिति को दिखाया गया है। पार्टीबाज़ी कैसे एक अच्छे-ख़ासे नौजवान को बर्बाद करके रख देती है इसका व्यंग्य-विनोदमय चित्र उकेरा गया है। देखें इसमें व्यंग्य शैली का एक प्रयोग, “एक ज़माना था जब कि माता-पिता के आदेश को विशेष महत्त्व दिया जाता था, माता-पिता के आदेश पर लोग जंगल की ख़ाक तक छानते थे। पर इस वैज्ञानिक युग में पार्टी के आदेश को ही विशेष महत्त्व दिया गया है। माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना तो क्रांतिकारियों का धर्म ही है।” (पृ. 167) व्यंग्य रेणु की रचनाओं की अन्यतम ताक़त है। उनके हर तरह के लेखन में इसका सार्थक और सशक्त प्रयोग देखने को मिलता है। मधुरेश जी के शब्दों में, “परसाई के बाद कदाचित इस दौर में रेणु अकेले लेखक हैं जो व्यंग्य की सर्जनात्मक संभावनाओं का उपयोग करते हैं।” (हिन्दी कहानी का विकास, पृ. 92)
‘रसूल मिस्त्री’ अच्छी कहानियों में से एक है। इसमें अपने फन में माहिर, किन्तु लापरवाह रसूल मिस्त्री की अभावमयी पारिवारिक दशा का यथार्थ चित्रण करने के साथ ही रसूल मिस्त्री के परदुखकातर स्वभाव, मानवीय चरित्र और उदार पक्ष को सामने लाया गया है। ‘खंडहर, इतिहास, मज़हब और आदमी’, ‘बीमारों की दुनिया में’ जैसी कहानियाँ जो या तो फ़ॉर्मूलाबद्ध हैं या रिपोर्ताज जैसी हैं या जिनमें नए-नए प्रयोग किए गए हैं; वे वैसी प्रभावी नहीं बन पड़ी हैं। रेणु की वही कहानियाँ अच्छी बन पड़ी हैं जहाँ उनकी विचारधारा ‘लाउड’ नहीं है। सहज यथार्थ चित्रण है। रेणु की शक्ति पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ग्राम्यजन का सहज-सामान्य चित्र आँकने में है। इस निरपेक्ष दृष्टि से लिखी हुई उनकी कहानियाँ—चाहे वे निम्न वर्ग का चित्रण करती हों चाहे मध्यवर्ग का, प्रभावित करती हैं। उनकी अनेकानेक कहानियाँ भाँति-भाँति के देहाती पात्रों के वैशिष्ट्य के लिए अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। उनकी कहानियों के अधिकतर प्रमुख पात्र अतिशय सामान्य होते हुए भी अत्यंत विशिष्ट हैं। ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’ की नायिका पतन के गर्त की ओर जाती हुई देखते-देखते ही अपने चरित्र की उज्ज्वल ऊँचाई पर जाकर प्रतिष्ठित हो जाती है। आम को ख़ास बना देना ही लेखक की शक्ति है। ‘तीर्थोदक’ कहानी जहाँ पर ख़त्म होती है, उससे आगे की कहानी रेणु पहले ही काफ़ी कह चुके होते हैं; इसलिए काग़ज़ पर कहानी समाप्त भले होती है, पर मन में पाठक के और आगे बढ़ जाती है। क्योंकि रेणु जितना कह गए हैं उतना ही उससे आगे सोचने के लिए छोड़ गए हैं। उनकी कहानियों में पात्र ख़ूब होते हैं। कुछ कहानियों में तो यह बहुत ख़ूब भी हैं। उन्हीं ख़ूब से पात्रों में से बहुत ख़ूब पात्र भी निकलते हैं।
‘आदिम रात्रि की महक’ भले एक निरर्थक जीवन जीते व्यक्ति की निरुद्देश्य सी कहानी लगे, पर इसमें प्रमुख पात्र कर्मा के माध्यम से क़िस्म-क़िस्म के स्त्री-पुरुष पात्रों के स्वभाव और चरित्र का परिचय रेणु ने दिया है। एक परिवार में जाने पर गृहस्थ जीवन की लालसा कर्मा को अपने जीवन-कर्म की व्यर्थता का बोध कराती है और वह अपने जीवन की दिशा बदलने की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार यह कहानी कर्मा की नियत बदलने के मोड़ पर उसकी नियति बदल पाने की संभावनाओं के साथ पाठक को छोड़ जाती है।
‘संवदिया’कहानी में फिर एक खाँटी ग्रामीण मानस का समुज्ज्वल स्वरूप सामने आता है। अत्यंत निराशामयी परिस्थितियों में हवेली की बहू पूर्णतः निरुपाय होकर अंततः संवदिया हरगोबिन को अपने जीवन का करुण संदेश लेकर मायके भेजती है, लेकिन हरगोबिन मायके जाकर उसका संदेशा चाहकर भी कह नहीं पाता है और सब कुछ ठीक बताकर बड़ी कठिनाई से किसी तरह अपने गाँव तक वापस आता है। वह कैसे कहे अपने गाँव की बदनामी की बात कि उसके गाँव के लोग इतने निर्मम हैं कि एक अकेली स्त्री को भूखों मरने के लिए असहाय छोड़ कर बैठे हैं। गाँव की मर्यादा एक निठल्ले व्यक्ति को श्रम-संकल्प करने को प्रेरित करती है और इस बहू को अपनी माँ मानकर उसे कभी दुखी न होने देने का वह वचन देता है। संवदिया की जिन विशेषताओं के साथ संवाद पहुँचाने की कला का वर्णन रेणु ने किया है उससे ‘संदेशरासक’ से लेकर ‘बीसलदेवरासो’ तथा अन्य ग्रंथों के संदेशवाहकों का महत्त्व सामने आए बिना नहीं रह पाता और बिहारी के दोहे का मर्म भी समझ में आता है कि “कागज पर लिखत न बनत कहत संदेश लजात। कहिहै सब तेरो हियो मेरे हिय की बात।”
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी आरंभ से ही बड़ी रोचकता के साथ आगे बढ़ती है, परन्तु अंत तक जाते हुए करुण और मार्मिक हो जाती है। लोक नायकों का करुण हश्र रेणु के यहाँ अनेकानेक बार दिखाई देता है—चाहे ‘कलाकार’ कहानी का शरद हो, चाहे ‘रसप्रिया’ का पंचकौड़ी मिरदंगिया, चाहे ‘प्राणों में घुले हुए रंग’ का डॉक्टर हो। लेकिन बावजूद इसके रेणु छोटी चीज़ों की महत्ता को पहचानना ख़ूब जानते हैं। उनकी कहानियों के नायक प्रायः वे हैं जो समाज के लिए उपयोगी भर भले हैं, पर जिनमें समाज का आकर्षण कुछ नहीं है। रेणु उनके मानवीय पक्ष को उजागर कर उन्हें महत्ता प्रदान करते हैं और समाज के लिए आकर्षणविहीन ऐसे पात्रों का पाठकों की दृष्टि में आकर्षण बढ़ा देते हैं। गाँव का कुरूप पक्ष भी उनकी कहानियों में उजागर होने से बच नहीं पाता; पर यह कुरूप पक्ष अधिकतर ऊँचे लोगों से जुड़ा है। मूल्यविहीनता या मूल्यों से विचलन प्रायः बड़े और ऊँचे लोगों में दिखता है और मूल्यों को बचाने की क़वायद अधिकतर नीचे लोगों में दिखती है। अपनी कहानियों और उपन्यासों में रेणु ने साहित्य को भी ख़ूब ‘प्रमोट’ किया है। अनेक पुस्तकों, रचनाओं, रचनाकारों के संदर्भ और उद्धरण उनके यहाँ देखे जा सकते हैं।
गाँव में जाति-पाँत, ऊँच-नीच से भी बड़ी बात है साहूकारों, सेठों, सामंतों, दबंगों द्वारा निर्धनों को जीने न देना। या कहें तो अपनी शर्तों पर जीने देना। ‘प्राणों में घुले हुए रंग’ इस स्थिति की अच्छी व्याख्या करती है। गाँव के ज़मींदार के कहे अनुसार नहीं चलने पर वह डॉक्टर जैसे गाँव-समाज के लिए उपयोगी व्यक्ति का जीना मुहाल कर देता है, तो छोटे-मोटे लोगों की बात कौन कहे? शुरूआती कहानी-उपन्यासों पर समाजवाद और कहीं-कहीं उग्र साम्यवाद के प्रति रेणु की सहानुभूति सी दिखाई पड़ती है।
शहर और गाँव का अंतर बताने वाली एक महत्त्वपूर्ण कहानी ‘न मिटने वाली भूख’ है। शहरी कथाभूमि पर केंद्रित इस कहानी में पुरुषों की स्त्रियों के प्रति दृष्टि के समक्ष ‘तीसरी कसम’ जैसी कहानी को रखकर देख सकते हैं कि रेणु को शहर के बनिस्बत गाँव में क्या और क्यों अच्छा लगता है! पुरुषों की लोलुप दृष्टि एक प्रतिष्ठित विद्यालय की अति सम्मानित प्रधानाचार्या का सम्मान भी करना नहीं जानती है। उनके लिए वह भी मात्र एक देह ही है। इस हद तक उसका मानसिक ‘टॉर्चर’ कर दिया जाता है कि अंततः जान गँवाकर ही उसका पीछा छूटता है। इस कहानी के ही साथ ‘एक अकहानी का सुपात्र’ जैसी कहानियों को रखकर गाँव और शहर के जीवन-मूल्यों का स्पष्ट अंतर रेणु जी के यहाँ पता चलता है।
रेणु की कहानियों के, विशेषकर प्रारंभिक कहानियों के नायक पहलवान, कलाकार, मिस्त्री, संदेशवाहक इत्यादि बहुत साधारण जन हैं, जो सामान्यतः दिखने में समाज में कोई बड़ी हैसियत अपनी नहीं रखते। तथापि सही मायने में असल ज़िन्दगी के वे नायक हैं। उनके जीवन की अपनी दुर्बलताएँ हैं। पर, उन सबसे ऊपर कुछ ऐसा उनके भीतर है कि तमाम क़िस्म की नकारात्मक चीज़ों के होते हुए भी वे अपनी संपूर्णता में महान से नज़र आते हैं। नकारात्मक में सकारात्मक की खोज रेणु के कथा-लेखन की विशिष्ट उपलब्धि है, जिसके द्वारा वे लघुता को महत्ता देते प्रतीत होते हैं। ऐसे पात्रों का अपना सामाजिक-आर्थिक अस्तित्व कुछ विशेष नहीं है, पर जो छोटी-छोटी चीज़ें भी वे करते हैं, उनसे ही उनका क़द बहुत ऊँचा नज़र आता है। यह नज़र रेणु की है जो उस ऊँचाई को खोजकर हमारी नज़रों में चढ़ा देती है।
अपने कहानी-उपन्यासों में रेणु का पक्ष साफ़ नज़र आता है। एक तो यह कि उनकी सहानुभूति शोषितों, वंचितों एवं तथाकथित निम्न माने जाने वालों के साथ है। यही मूल्य-निर्माण करते और उनका ईमानदारी से पालन करते देखे जाते हैं। खाया-पीया-अघाया तबक़ा जो इनका शोषक है—मूल्यों से विचलन उसी में देखने को मिलता है। दूसरी बड़ी बात रेणु के यहाँ यह है कि उनकी दृष्टि में गाँव में जो चारित्रिक उज्ज्वलता है, मूल्यों के प्रति आस्था है, शहरों में उसका उतना ही स्खलन देखने को मिलता है। उन्होंने गाँव को जिया है और शहर में समय गुज़ारा है। अतः यह अंतर उनके अनुभवों की देन होने से विश्वसनीय माना जा सकता है। एक और बड़ी बात रेणु के यहाँ है स्त्री-शक्ति में अपार आस्था और उसका सम्मान। उनकी स्त्रियाँ सशक्त हैं, मुखर हैं। कई स्थानों पर वे पुरुषों से आगे हैं। उन्हें राह दिखाने वाली हैं। उनकी प्रेरक शक्ति हैं। रेणु के कथा-साहित्य में लटपटाए तो ख़ूब हैं पुरुष स्त्रियों से, पर बलात्कार जैसी घटनाएँ गाँव में नहीं होती दिखाई गई हैं। बलात्कार हुआ है तो शहरों में। गाँव में प्रायः नहीं।
वास्तव में तो आम आदमी की जिजीविषा, जीवट, आशा और विश्वास के विविध रंग दिखलाने वाले कथाकार हैं रेणु! कठिन परिस्थितियों में भी राह बना लेने वाले पात्रों के पैरोकार हैं वे। स्त्री-शक्ति को पहचान कर उसकी महिमा को आँकने वाले तूलीकार हैं वे। जहाँ पुरुष की सामर्थ्य चुक जाती है, वहाँ स्त्री कोई-न-कोई राह निकाल लेती है। जहाँ पुरुष का साहस छूटता है, वहाँ वह अपनी युक्ति, शक्ति और साहस से उसमें नवीन उत्साह और स्फूर्ति का संचार करती है। ‘नए हौसले’ कहानी को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। रेणु के बिम्ब भी लोकबिम्ब हैं, जो लोकमानस के अनुभव से उपजे हैं। ‘रसप्रिया’ रेणु की एक कहानी का नाम है। पर, वे सच में रसप्रिय लेखक हैं। अपनी कथा-रचनाओं से वे रस उत्पन्न करते हैं, रस लेते हैं और पाठकों में वही रस जगाते हैं। रेणु विखंडन के नहीं, मंडन के कथाकार हैं। विघटन के नहीं, संघटन के रचनाकार हैं। उनकी कहानियाँ पारिवारिक-सामाजिक संबंधों के ममत्व और महत्त्व की कहानियाँ है। मानवीय संबंधों के बिखरने बनने और फिर निखरने का उपक्रम उनके यहाँ दिखाई देता है।
रेणु जी ने गाँव और शहर दोनों को अपना कथा-क्षेत्र बनाया है, पर यह कहना ही होगा कि उनके कथाकार की असल सामर्थ्य तो उनकी ग्रामभित्तिक कथा-रचनाओं या ग्रामीण पृष्ठभूमि के पात्रों के चरित्रांकन में ही देखने को मिलती है। गाँव की हवा को वे ठीक से पहचानते हैं। वहाँ की लोकगंध की उन्हें सच्ची परख है। लोक साहित्य और संस्कृति से उनका गहरा परिचय है, लोकरंगों का अच्छा ज्ञान है। और सबसे ऊपर बात यह कि वे गाँव के आदमी को ठीक से जानते हैं, उसका मन पहचानते हैं और उसके मन की भावनाओं, स्वप्नों, संकल्पों को पकड़कर उन्हें मूर्त रूप देना उनको आता है। ग्रामीण जीवन की अच्छाई-बुराई कुछ भी उनसे छिपी नहीं है। वे सब कुछ दिखाते हैं, पर गाँव की अच्छाई दिखाने की जैसे उनमें एक बेचैनी है, व्यग्रता है, उत्साह है। कहीं कुछ अच्छा यदि नहीं भी है तो भी वह उसको अच्छा बनाकर प्रस्तुत करते हैं और संकेत करते हैं कि रास्ता इधर से होकर जाता है। डॉ. कुमार विमल भी कुछ इसी तरह की बात करते हैं। वे लिखते हैं, “केवल ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’ ही नहीं, रेणु की छोटी कहानियाँ भी आंचलिकता तथा ग्रामभित्तिक संस्पर्श के कारण ही मर्मस्पर्शी बन सकी हैं . . . इन कहानी संग्रहों में केवल वही कहानियाँ उत्कृष्ट बन सकी हैं जिनमें गाँव ने कैनवस का काम किया है और क़िस्सागोई यथार्थमुखी रही है। अन्य प्रकार की कहानियाँ जिनका ट्रेडमार्क सेक्स है या जिनका कथ्य है किसी ‘मदोन्माद में गढ़ी गई ललित कल्पना’, लगभग ‘ट्रैश ’हैं . . . मेरे कहने का आशय यह है कि रेणु कथा-साहित्य में पूर्वांचल के एक महागाथाकार के रूप में ही कालोत्तीर्ण हो सकेंगे, किसी अन्य रूप में नहीं।” (रेणु का रचना-संसार, पृ. 64)
रेणु की कहानियों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है और बहुत ही विशेषताएँ उनकी पहचानी गई हैं। डॉक्टर मैनेजर पांडेय उनको ‘टूटते, बिखरते और जीवित मानवीय संबंधों के कथाकार’ मानने के साथ-साथ ‘जनजीवन की ट्रेजडी और अभिजात वर्ग के जीवन की कॉमेडी के कथाकार’ मानते हैं (मृदंगिए का मर्म, 143-44) तो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उनकी कहानियों को ‘मनुष्य के भीतर छिपी मनुष्यता की कहानियाँ’ बताते हैं। उनके अनुसार वे सतह के नहीं, अतल के रचनाकार हैं। (मृदंगिए का मर्म, 156) ‘मृदंगिए का मर्म’ में ही डॉ. विजय मोहन सिंह लिखते हैं, “‘लाल पान की बेगम’ ने ‘मैला आँचल’ के बाद मुझे पहली बार अहसास कराया कि जहाँ कुछ भी मानवीय है वहाँ रेणु हैं। मानवीय गंध, परख उनकी अनोखी है। यद्यपि यह मानुषगंध स्वतःस्फूर्त, लगभग मूल प्रवृत्तिजन्य है, किन्तु उसे रचना में अनायास किसी विशेष बिंदु पर ढाल देना बड़ी कलावंतता के साथ होता है।” (पृ. 141)
इस तरह से देखें तो रेणु की कहानियों में प्रेम प्रमुख है, इसमें कोई संदेह नहीं। आँसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहलहाने की कल्पना और साधना ही तो उनका संपूर्ण लेखन है। लेकिन यह प्रेम सर्वत्र कामजन्य या सेक्स संबंधित नहीं है; बल्कि यह मानवताजन्य है, जो करुणा, दया, सहानुभूति, सहयोग जैसे भावों को उभारता है। इसका विस्तार बहुआयामी है, इसलिए यह रक्त-संबंधों से बाहर जाकर भी एक राग की डोरी निर्मित करता है और उससे लोगों को बाँधता है। ‘संवदिया’ का हरगोबिन हो, ‘तीर्थोदक’ की अन्नपूर्णा हो या ‘रसूल मिस्त्री’ कहानी का रसूल मिस्त्री हो-ऐसे अनेकानेक पात्र इसका प्रमाण हैं। ग्रामीण पात्रों की भोली चतुरता भी उनके यहाँ देखते ही बनती है।
प्रोफेसर-हिन्दी विभाग, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु,
सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश-272202
मो /: 7983809664, ई-मेल: hksgpn@gmail.com
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