इतिहास में मिसाइलें लिखी जाएँगी, भूखी माँ नहीं
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’15 Apr 2026 (अंक: 295, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
[बड़े-बड़े देशों की लड़ाई में सबसे छोटी चीज़ हार गई—घर]
[मिसाइलें आसमान में थीं, पर चोट बच्चों की थाली पर थी]
सुबह अख़बार खोला तो पता चला, दुनिया फिर बचाई जा रही है। बचाने वाले वही लोग हैं, जिनसे दुनिया सबसे ज़्यादा डरती है। ईरान और इज़राइल ऐसे लड़ रहे हैं जैसे गली के दो दबंग। चोट उनकी कम, हिसाब दूधवाले, सब्ज़ीवाले और घर की औरत का ज़्यादा बिगड़ता है। अमेरिका वही पड़ोसी है जो झगड़ा छुड़ाने नहीं, डंडा बेचने आता है। ट्रंप उसका वह लड़का है जो पहले चिल्लाता है—मारो!, फिर कहता है—मैं तो शांति चाहता था। अख़बार लिखता है—रणनीतिक प्रहार। घर की औरत पूछती है—गैस भरवाऊँ या फीस दूँ? युद्ध हमेशा बड़े शब्दों में शुरू होता है और रसोई में उबलता है। वहाँ सभ्यता बचती है, यहाँ रोटी जलती है।
ईरान का नेता गरजता है—आख़िरी साँस तक लड़ेंगे। इज़राइल का नेता दहाड़ता है—उन्हें मिटा देंगे। ट्रंप उँगली नचाकर कहते हैं—होर्मुज़ नहीं खुला तो पुल, सड़क, बिजली—सब राख कर देंगे। तीनों की बोली अलग है, मगर अकड़ एक ही है—वही बूढ़ी मर्दानगी, जो हर बार अपनी ताक़त किसी और की बर्बादी पर नापती है। सरहद पर टैंक चलते हैं, घर में सन्नाटा। मर्द बंदूक उठाता है, औरत राशन का थैला। इतिहास लिखेगा—किसने कितनी मिसाइलें छोड़ीं। यह नहीं लिखेगा कि एक माँ ने तीसरे दिन बच्चों में आख़िरी रोटी बाँटी और पानी पीकर सो गई। ट्रंप तो अब युद्ध की बात भी ऐसे करते हैं, जैसे कोई ठेकेदार कह रहा हो—यह बस्ती गिरा दो, यहाँ मलबे पर नया सौदा खड़ा होगा।
युद्ध में औरत का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह जीवन बचाना चाहती है। इसलिए हर युद्ध सबसे पहले उसे सज़ा देता है। ईरान में स्कूल बंद हैं, इज़राइल में सायरन बजते ही बच्चे बंकरों में भेजे जाते हैं। एक माँ कहती है—डर मत, यह सिर्फ़ आवाज़ है। बच्चा पूछता है—अगर यह सिर्फ़ आवाज़ है, तो लोग मर क्यों रहे हैं? संसद, संयुक्त राष्ट्र, दूतावास—किसी के पास जवाब नहीं। उधर ट्रंप कहते हैं—वे समझौते के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। बच्चा सोचता है—अगर सब गिड़गिड़ा रहे हैं, तो बम कौन गिरा रहा है? दुनिया के सबसे कठिन सवाल बच्चे पूछते हैं, क्योंकि वे अभी नेता नहीं बने।
मज़े की बात देखिए। जिन देशों में औरत को बराबरी देने पर बहस होती है, वहीं युद्ध आते ही उसी से कहा जाता है—मज़बूत बनो। अधिकार के समय—परंपरा, दुख के समय—तुम ही शक्ति हो। इज़राइल की औरतें बच्चों को लेकर शेल्टर में बैठी हैं, ईरान की औरतें पानी और दवा जुटा रही हैं। उधर ट्रंप कहते हैं—आज पावर प्लांट उड़ाएँगे, कल पुल। आदमी सोचता है, राष्ट्रपति बोल रहा है या मोहल्ले का वह लड़का, जो पतंग काटकर छत पर नाचता है। नेता टीवी पर नक्शा देखते हैं, औरतें घर में दूध, दवा, गैस और बैटरी का हिसाब। असली युद्ध वही लड़ती हैं, बस उन्हें मेडल नहीं मिलता।
अब युद्ध सरहद पर नहीं, रसोई में लड़ रहा है। होर्मुज़ बंद होने की धमकी क्या आई, तेल महँगा हो गया। पेट्रोल बढ़ा तो आदमी स्कूटर में सौ रुपये डलवाकर ऐसे लौटा, जैसे कारगिल जीत आया हो। घर आकर बोला—देश कठिन दौर से गुजर रहा है। पत्नी ने कहा—देश नहीं, रसोई गुजर रही है। क्योंकि युद्ध तेहरान में हो या तेल अवीव में, उसकी सबसे लंबी कतार आखिर गैस और राशन की दुकान पर लगती है। उधर ट्रंप गरजते हैं—होर्मुज़ खोलो, नहीं तो नरक देखोगे। उन्हें कौन बताए, नरक तो खुल चुका है। वह हर उस घर में खुला है जहाँ औरत दाल में पानी बढ़ाकर बच्चों से कह रही है—आज पतली ही अच्छी लगती है।
नेताओं की भाषा बड़ी चालाक होती है। वे कहते हैं—हम शांति चाहते हैं, लेकिन… असली बम यही “लेकिन” है। इसके बाद हमला भी जायज़, बदला भी, मौत भी। अमेरिका कहता है—स्थिरता चाहिए, फिर युद्धपोत भेज देता है। ट्रंप कहते हैं—मैं युद्ध नहीं चाहता, और अगले घंटे कहते हैं—मंगलवार को पुल उड़ेंगे। दुनिया के ताक़तवर देश ऐसे खड़े हैं जैसे पड़ोसी की छत पर आग लगी हो और नीचे बहस चल रही हो—बाल्टी लाल हो या नीली। ऊपर औरतें पानी डाल रही हैं, नीचे मर्द प्रेस कॉन्फ़्रेंस। ट्रंप की राजनीति में शांति भी इंटरवल की तरह आती है—थोड़ी देर के लिए, ताकि अगला धमाका और ज़ोर से हो।
कभी-कभी लगता है, दुनिया बचानी है तो सम्मेलन में जनरल और प्रधानमंत्री नहीं, घर चलाने वाली औरतें बुलाओ। वे आते ही कहें—पहले तुम तीनों चुप रहो—ईरान, इज़राइल, अमेरिका। अब बताओ, दूध कहाँ से आएगा? अस्पताल कौन चलाएगा? बच्चे कहाँ जाएँगे? बस, यहीं युद्ध की सारी बहादुरी बैठ जाएगी। क्योंकि युद्ध नक्शे पर नहीं, घर में होता है। मिसाइल सरहद पर गिरती है, असर रसोई में होता है। इतिहास की किताब बाद में बंद होती है, पहले औरत टूटी हुई दुनिया समेटती है। भाषण में उसके हिस्से बस इतना आता है—वह बहुत साहसी थी।
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