नटनी उपन्यास का एक अंश
कथा साहित्य | उपन्यास रत्नकुमार सांभरिया1 Sep 2024 (अंक: 260, प्रथम, 2024 में प्रकाशित)
मुहिम
देश को आज़ाद कराने के लिए गाँधीजी के द्वारा छेड़ी गई मुहिम ने ऐसा रुख़ अख़्तियार किया कि देश-प्रेम की भावना वनखण्ड में लगी आग की तरह अहर्निश फैलती गई। समन्दर में आये ज्वार की भाँति बढ़ती रही। तूफ़ान की तरह तहस-नहस कर देने को आमादा हुई। वीरों का लहू ऐसा उबाल खाया, उनमें ऐसा जोश आया, अंग्रेज़ीराज सूल-सा चुभने लगा था।
आंदोलन की यह लपटें शनैः-शनैः ब्रिटिश प्रधानमंत्री रिजर्ड एटली तक पहुँची। उठती आग का अहसास हुआ और असलियत से वाक़िफ़ हो चले थे, “इण्डिया में ब्रिटिश शासन के दिन अब लद गये। हाथी को अपनी ताक़त का भान हो चुका है। गद्दारों, मुख़बिरों, चापलूसों, सामंतों, राजा-महाराजाओं से उन देशभक्तों की शक्ति कहीं अधिक हो गई है, जिन्होंने आज़ादी के लिए जान हथेली पर ले ली है। देश की माटी का तिलक माथे पर लगा लिया है और मरने-मारने को तत्पर हैं। साम्राज्य की दशा उस असहाय नरभक्षी जैसी हो चली है, क्षेत्र छोड़ना ही उसकी सुरक्षा है।”
सरदारसिंह के दमन, उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार, अनाचार, दरिंदगी के चलते लोगों का जो आक्रोश राख के नीचे दबी चिनगारी की तरह था, हवा के साथ राख उड़ गई और चिनगारी चटकने लगी थी। प्रतिशोध की भावना शोला बन कर धधकने लगी। गाँव के तीन लाल जेल गए थे। लौट कर आज तक नहीं आए। उनकी क़ुर्बानी का ज़िम्मेदार सरदारसिंह था। एक वक़्त सरदारसिंह देश-प्रेम के बाने आन्दोलन में कूद पड़ा था। आज आंदोलन को कुचलने के लिए राजपक्ष में क़हर बरपा रहा था।
जो जितना बड़ा होता जाता है, उसमें भय भी उतना ही घना होता जाता है। सरदारसिंह अँग्रेज़ों का वफ़ादार मुख़बिर था। बावजूद दिनोंदिन बढ़ती ख़िलाफ़त से वह इतना भयाक्रांत हो उठा था कि न दिन को चैन, न रात को नींद। पल-पल ख़ौफ़ के साये गुज़रता। मरता क्या नहीं करता। विद्रोह की ज्वाला हवेली की ओर आती देख वह गुहार लिए थाने जा उपस्थित हुआ। दरोगा ने उसकी चिंता और आसन्न संकट का समाधान यह निकाला कि पुलिस की एक टुकड़ी हवेली में तैनात करने के लिए ऊपर से मंज़ूरी ले ली। परकोटे की प्राचीर में बने मौखों से बंदूकों की नाल बाहर आ ई थीं, यानी सी एण्ड शूट।
पुलिस के बंदोबस्त का परिणाम यह हुआ कि सरदारसिंह को सुकून मिल गया। क्रान्तिकारियों को पकड़-पकड़ हवेली लाया जाने लगा। परकोटे के साथ जुडे़ दो कमरों में से एक कमरा बंदियों को रखने के लिए प्रयुक्त होने लगा। दूसरे कमरे में सरसराते कोड़े टूट-टूट नीचे गिरते थे। कोड़ों की सटकारें पड़तीं कि क्रांतिकारी की चमड़ी उधड़ जाती। चीखें बाहर नहीं निकलतीं। दिन-रात क़हर बरपता। राष्ट्रभक्ति का जज़्बा सौ अत्याचार, सौ अनाचार, सौ कष्ट-पीड़ा, सौ भूख-प्यास सब जज़्ब किये था।
बावजूद इसके न नारों की गूँजें कमज़ोर हुईं, न उग्रता कम हुई। ‘इंकलाब जिन्दाबाद’। ‘महात्मा गाँधी की जय’ के नारे हवेली के आस-पास गूँजने लग थेे।
कहावत है, पाप का घड़ा एक न एक दिन ज़रूर फूटता है। अँग्रेज़ों के अत्याचारों का घड़ा फूटा और आधी रात फूटा। चौदह अगस्त की अर्द्धरात्रि को भारत और पाकिस्तान दोनों देश पृथक-पृथक स्वतंत्र हुए। माँ भारती के पैरों में पड़ी परतंत्रता की बेड़ियाँ कट गईं और शहीदों का लहू रोशन हो उठा। देश का अंग-अंग स्वतंत्र था, कण-कण आज़ादी के जश्न में दीवाना हुआ जाता था। जीने की आज़ादी। रहने की आज़ादी। साँस लेने की आज़ादी।
हवेली में तैनात पुलिस टुकड़ी के कानों ख़बर पहुँची। बंदूकों की नाल मौखों से बाहर निकल आईं। असलाह सिमट बोरिया-बिस्तर गोल हो गये। बंदीगृह के ताले झड़ गये और ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘भारत माता की जय’, ‘महात्मा गाँधी की जय’ कहते हुए माँ के सपूत बाहर आ गये।
हवेली के बेइंतिहा ज़ुल्मों से बेतहाशा तंग आया अवाम पत्थरबाज़ी कर दें, आगजनी कर दें, नंगी तलवारें लेकर हवेली में घुस आये और मुख़बिर के साथ हमें भी मार-काट दें। पुलिस की बख़्तरबंद टुकड़ी हवेली को मुँह अँधेरे अलविदा कह रही थी। सरदारसिंह मानो बिना मांस-मज्जा और लहू के महज़ साँसों की ठठरी रह गया था। उसे जैसे मौत के भरोसे छोड़ दिया।
अँग्रेज़ों के प्यादों के लिए ग़ुलामी ही शिराएँ थीं, ग़ुलामी ही साँसें थीं। ग़ुलामी चले जाने के दुःख में वह आठ-आठ आँसू बहाता मुहाल हुआ जाता था। कई गाँवों को मुट्ठी में रखने वाली हवेली हाथ मलती रह गई थी।
वह चौक में आ खड़ा हुआ और बदहवास आँखों मंज़र देखे जाता था।
टुकड़ी का एक सिपाही जज़्बाती था। पेट की आग मजबूरीवश अंग्रेजीराज का इकाई हुआ। हवेली में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ होते ज़ुल्मों का दर्द उसके कंठ तक आया हुआ था। शुक्र देश आज़ाद हो गया। यदि अत्याचारों का यही सिलसिला जारी रहता। वह गोली मारकर ख़ुद को मिटा देता या फिर सरदारसिंह की साँसें छीन कर बागी हो जाता।
उसकी आँखों में आग थी। आग लक्ष्य की साध थी। उसने आव देखा, न ताव अपनी बंदूक का ट्रिगर दबाया और सामने खड़े सरदारसिंह के पैरों में गोली दाग दी। धाँय के साथ गोली धरती में धँसी कि रेत का ऐसा ग़ुबार उठा, ऐसा ग़ुबार उठा ज्वालामुखी फटा हो। सरदारसिंह का दिल तो फटा नहीं, कसर रही नहीं। एड़ी से चोटी ऐसा धूल-धूल हो गया, पहचान खो गई।
चहुँओर धूल-धुआँ। हवेली, दशहत से हिल उठी थी।
गोली की धांय और अम्बर तक उठी धूल का लक्षित संदेश यह था कि अँग्रेज़ों की पिट्ठू और देश की गद्दार हवेली जद में रहना, गद्दारी का अंत धूल होता है।
जाल कटने पर परिंदे फुर्र उड़ जाते हैं। आज़ादी मिलते ही नौकर-चाकर हवेली छोड़कर यह जा, वो जा। किसी ने मुट्ठियाँ भांज कर नारे लगाए तो किसी ने थूक दिया। नौकरानियाँ ‘नपूता’ तेरो सत्यानाश जावेगो कहती पल्लू सिर पर धरे इस ठसक मुट्ठी बाँधे बाहर निकलीं, हवेली ख़ुद आज़ादी की ताप महसूस कर ले।
सिपाही द्वारा गोली दागने से पड़े गड्ढे में उसका अहम दफ़न हो गया। ख़ौफ़ज़दा सरदारसिंह की मनोदशा, मात खाया नृप। पिंजरे का बाघ। भय भरा भूचाल। बिना साँस का शरीर। सदमे ने उसका लहू सुखा दिया। क़दम ऐसे हो गये पहाड़ बँधा हो।
उसका हवेली के अंदर जाना दूभर हो गया। धूलभरी आँखों क्लांत हुआ वहीं बैठ गया था। हवेली की ओर कातर दृष्टि डाली, वह ज़लज़ला काग़ज़ की कश्ती जैसा था, बस। समय के साथ नष्ट हो गया। आज़ादी के उगते सूरज का तेज कितना तीखा है।
पुलिस हवेली में मुस्तैद रही। यहीं पर अन्न-जल अरोगा और जाते वक़्त उसी के पैरों में गोली दाग दी। उसने बेबस साँस मारी, “मुझ जैसे देश के दुश्मन के लिये यह सज़ा रत्तीभर है। ऐसों को तो नमक के कुंड में पटक देना चाहिए।”
देश के प्रति गद्दारी। गाँवों के साथ ज़्यादती। अंतस में उपजे अपराधबोध ने ऐसा भयावह रूप अख़्तियार किया, कँपकँपी हटने का नाम नहीं लेती थी। साँस जोड़-जोड़ सहेजा। दिल को दोनों हाथों थामा और उठ खड़ा हुआ। कपड़े और काया धूल-धूसरित थे। रोम-रोम बिधा हुआ था। दीवार पकड़ ली। संभल-संभल क़दम रखता, साँस-साँस जोड़ता, हाँफता-काँपता हवेली के भीतर चला आया था। झंझावात में फँसे पंछी जैसी उसकी मनोस्थिति थी।
हवेली का वह कमरा क्या, बेशक़ीमती सामान से अटा पड़ा मालखाना था। उस दिन के हादसे के बाद पति-पत्नी में छत्तीस का आँकड़ा था। अपनी-अपनी सीमासंधि बँधे दो देश। पूँजी का जीव माया से अलग नहीं हुआ करता। वह इसी मालखाने में सोया करता। कमरे में लूट-खसोट का सोना-चाँदी और कलदारों भरी संदूकें रखी थीं। धन-दौलत देख कर उसमें नृप की तरह अहंकार फुँकारता। ख़ुशी की गुदगुदी बनी रहती। वही कमरा आज जैसे हिंस्र जीव में तब्दील था। मगरमच्छ सा खुलता जबड़ा, बाघ से नुकीले दाँत। बघनखा।
पत्नी शमादेवी आज़ादी की मुहिम पर बराबर नज़र रखे थी। हवेली परिसर में स्थापित हुई पुलिस टुकड़ी उसकी आँखों में कंकड़ी-सी रड़कती। आज़ादी के दीवानों पर ढाये जा रहे ज़ुल्मों से आँखें भीगी रहतीं। बावजूद पत्नी धर्म का निर्वाह कर उसने संदूक से कपड़े निकाले और सरदारसिंह की ओर झुलाते हुए खूँटी से टाँग कर अपने कक्ष में चली आई, “नहाओ या रेत सने पड़े रहो।”
उसने रह-रह हिम्मत बटोरी। खूँटी से कपड़े उतारे और मातमी मन लिये बाथरूम में चला गया था।
हवेली के बाहर पूरे दिन नारेबाज़ी होती रही। पत्थर-भाटे बरसते रहे। जिन लोगों पर हवेली ने जुल्म ढाये थे, आगजनी पर उतारू थे।
हवेली भीगी बिल्ली की भाँति थरथराती रही। हवेली ने गाँव में अब तक इतना भय नहीं भरा था, गाँव ने एक ही दिन में भर दिया था, उसमें। यह तो शमादेवी के व्यवहार ने लोगों के दिलों पर क़ाबू पा लिया, वरना हवेली धधकती।
हवेली में दो प्राणी रहते थे। दोनों के बीच विपरीत ध्रुवों जैसा तालमेल था। एक देशप्रेम, दूसरा राजप्रेम। शीतयुद्ध अनंत था।
कीलपुर गाँव के चार बाँकुरे आज़ादी का अलख जगाने सरकार की चौखट तक गये थे, उनमें से एक मुख़बिर हो गया, तीन की तरुणाई शहीद हो गई। शहीदों में कुम्हारों का एक लाल भूरालाल भी था। कुम्हारों के पाँच घर थे। पाँचों घरों ने गाँव के एक-एक देहरी दीए भिजवाए। आज़ादी का जश्न। ना किसी से आना लिया, ना किसी से दाना लिया। शहीद भूरालाल का अनुज सहराराम प्रजापत अंधकार और ग़म में आकंठ डूबी हवेली के बडे़ गेट की देहरी पर जलता दीवट रख आया था। ‘हवेली! तूने अपना ज़मीर खोया, मेरे भाई का लहू देश के काम आया। गाँव में रहना है तो दीए की लौ जीना होगा। अँग्रेज़ों के शोषण के तेल की मशालें गुल हो चुकीं।’
जलते दीपों की उठती लौ से समूचा गाँव ऐसा जगमगा उठा, ज्योत्स्ना आकाश छोड़ कर धरा पर आ उतरी हो। गाँव का कोना-कोना, अंतरा-अंतरा, गली-कूचा तक रोशन था।
हवेली मशालों, लालटेनों, झूलते दीवटों और झूमरों के प्रकाश से दुलहन के आभरणों जैसी चमका करती थी। अमावस्या जैसा तमस पसरा था। मानो अँधेरे की चादर ओढ़ कर लेटा कोई दीन अपने दिन गिनता हो।
दीपक की झिलमिल करती रोशनी में हवेली पत्ते की भाँति काँपती नज़र आती थी। गहन अंधकार हो, जुगनू की चमक भी अपना वुजूद ज़ाहिर कर देती है। हवेली की देहरी पर रखे प्रदीप का चाँदना किवाड़ों के रन्ध्रों, खिड़कियों की झिर्रियों और रोशनदान से होता भीतर गया।
जितनी बड़ी काया, उससे बड़ा भय। सरदारसिंह को हवेली की देहरी पर रखे छोटे से दीए के उजाले से इतना डर लगने लगा, बलवाई मशालें लिए आ गए।
शमादेवी ने खिड़की खोल ली। गेट पर जलता दीपक देख कर उसका अंतस हर्षित हो उठा। दीपक की वह रोशनी शमादेवी को जश्न लग रही थी, सरदारसिंह भयभीत था। वह उसी कमरे में लेटा था, जहाँ रोज़ सोता था, कक्ष बनाम मालखाना। आज सब अकल्पनीय और अविश्वसनीय था।
शमादेवी ने टार्च ली। अलमारी से चाँदी का दीया निकाला। उसमें घी डाला और रूई की बाती सहेज कर तीली लगा दी। वह जलते दीये को हाथ की ओट किए हवेली की मुँडेर पर रख आई थी।
जहाँ त्रास का साया हो, निद्रा नहीं आती। सरदारसिंह ने सब देख लिया था। तेज़ाब में घुलते-गलते लोहे की भाँति आत्मभर्त्सना और आत्मग्लानि में घुटता रहा। बग़ावत जैसा सुर, विद्रोह जैसा भाव, प्रतिरोध जैसा स्वरूप। स्त्री-मन की थाह का अंदाज़ा नामुमकिन है।
उसकी साँसें रात भर उखड़ी रहीं, नींद उड़ी रही। आतंक और अनिष्ठ से बुरी तरह घिघयाता रहा। हवेली के पिछवाडे़ की ओर से आई मुर्गे की बाँग उसके कानों पड़ी। हताशा, निराशा, भय और चिंता के चौकोर जाल में फँसा उसका मन बहाल हुआ। वह उठा। खिड़की खोल कर बाहर की ओर झाँका। झाँकता रहा। सब शांत। नीरव।
वह टार्च लेकर हवेली के एक कोने में बने पशुवाड़ा गया। वहाँ पाँच-छह भैंसें बँधी थीं, पाड़ी-पाड़े थे। छह-सात गायें थीं, बछड़े-बछिया थे। दस-बारह बैल थे। हवेली का निर्माण होने के बाद पहली बार पशुओं की नाद की ओर क़दम रखा था, उसने। वह एक-एक पशु का जेवड़ा खोलता गया और हवेली के पिछवाडे़ के गेट की ओर हटकारता गया। घोड़ा घुड़साल में खड़ा रह गया था, अकेला।
नैराश्य से घिरा हुआ सरदारसिंह फिर अपने पलंग पर आ बैठा। हताशा कलेजे पैठी थी। निराशा रोआं-रोआं जमती गई थी।
थानेदार के उस घिनौने के बाद पति सरदारसिंह शमादेवी की आँखों से गिर गया था। उसकी ओर देखते पलकें झुक जाती थीं। हवेली में उससे भेंट जाता। शमा आग के दरिया सी उसके सामने से गुज़र जाती या भीत के साथ खड़ी रह अहल्या की आँखों देखती। गर्भ में धधकते लावा के बावजूद धरती की ऊपरी सतह शीतल रहती है। उसका अन्तर्मन बाघिन सा बिफरा होने के बावजूद चेहरा हिरणी जैसा सौम्य नज़र आता।
अतीत और आज! सरदारसिंह के हृदय में ज्वारभाटा सा बन रहा था। सहसा उसे याद आया और कंठ पर हाथ फेर कर फिक्रज़दा खखर की। ‘घोड़ा भूखा खड़ा है, घुड़साल में।’ वह सहमा-सहमा हवेली के बाहर की ओर आया और घुड़साल की ओर बढ़ गया था। चौक, जहाँ कारिंदों, बेगारियों, चिरौरों, फ़रियादियों और ज़रूरतमंदों की अच्छी ख़ासी चहलक़दमी रहा करती थी। पुलिस टुकड़ी के आतंक पंछी भी उधर पर नहीं मार पाते थे। सन्नाटा पसरा हुआ था।
घुड़साल की ओर बढ़ते उसके पदचापों की आहट सुन कर बंदीगृह से उल्लू निकला। आँखों के सामने छाये अँधेरे में पंख फड़फड़ाता हुआ वह पहले तो परकोटे की बुर्ज पर बैठ कर घुयाया और फिर हवेली की मुँडेर पर बैठ कर हुअ-हुअ करने लगा। ‘एक ही दिन में उल्लू आ गये, हवेली में! किसी विद्रोही की कोड़ों लिपटी रूह है!’ सरदारसिंह के सर्वांग सनाका उतरा।
भूखे-प्यासे खडे़ घोडे़ की दोनों कोलों (बगलों में) में गड्ढे पड़ गये थे। भूख के मारे आँखों में क्षोभ था।
थानेदार उस दिन अपनी ख़ुशी घोड़ा छोड़ ज़रूर गया था, लेकिन घोड़ा, घोड़ा था। उसने सरदारसिंह को कभी अपनी पीठ पर आसीन नहीं होने दिया। उसकी पीठ पर जीनकाठी सजा दी जाती। मख़मली आसन डाल दिया जाता। सरदारसिंह पोशाक पहने, मयम्यान तलवार कंधे से लटकाए घोड़े की काठी से लटकती रकाब पर पैर रखने को होता, घोड़ा ऊपर की मुँह करके क्रोध से हिनहिनाता। बेतहाशा दुलत्तियाँ फटकारता। घोड़े को पुचकारा जाता, हटकारा जाता, संटियाँ फेरी जातीं, घोड़ा अपने उसूल अड़ा रहता। जिगरसिंह घुड़सवारी की लालसा अपना-सा मुँह लेकर रह जाता। कितनी ही बार वह घुड़सवारी के लिए तैयार हुआ, हर बार यही अंजाम हुआ। अश्व उसकी गद्दारी से वाक़िफ़ है। वह घोड़े की वफ़ादारी, शत्रुता और दुलत्ती के बारे में ख़ूब जानता था। इस अध्याय से नितांत अनभिज्ञ था, घोड़ा खाता क्या है!
उसने एक टोकरे में बैल का चारा लिया। बोरी से दाना उठाया। चारा-दाना मिला कर घोड़े की ल्हास में डाला और पानी छिड़क हाथ से फेंट दिया था।
अस्तबल में अकेला खड़ा घोड़ा भूखा भी था। प्यासा भी था। ग़ुस्से के मारे खुर मार-मार ज़मीन खुरचता था। बिन सेवक उदास भी था। उसने ल्हास में मुँह मारा कि घिनाया। ऊपर की ओर थूथन उठा कर हिनहिनाया। बिफरा और बिदक उठा। पीठ घुमाई और सरदारसिंह को दुलत्ती मार दी। छाती में लगी दुलत्ती से वह वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा और ‘मार दिया’, ‘मार दिया’ कराह उठा। उसकी आँखों के सामने तारे टूट-टूट गिरने लगे थे। घोडे़ की वफ़ादारी ख़ूब देखी, क्षोभ से रूबरू आज हुआ। आग बबूला हो उठे सारंग ने गर्दन को झटका मारा और रस्सी तुड़ा ली। लातें फटकारता प्रवेश द्वार की ओर भाग छूटा। वह थानेदार की नफरी के साथ इसी द्वार से आया था। भारी भरकम गेट बंद था। निकलना नामुमकिन था। उसने टापें टपटपाते गर्दन उठा कर हिनहिनाते हुए दो-तीन चक्कर काटे और उद्वेलित हो उठा। वह उस गेट की ओर भागा, जिस गेट से उसे हवाख़ोरी को ले जाया जाता था। दरवाज़ा छोटा था और कमज़ोर भी। उसने जैसे ही उसे बग़ल की टक्कर मारी साँकल झड़ गई और गेट दो-पल्ला खुल गया था।
धक्के के आवेग फड़ाक से गेट खुलना, कराहने की रुंधी-रुंधी आवाज़ें आना, शमादेवी अनहोनी की आशंका से काँप उठी थी। कलेजा पकड़े ऐसे बाहर निकली अनिष्ट साक्षात् हो। नौकर-नौकरानियों की भरमार रहा करती, अकेली रह गई थी। साँय-साँय, खाऊँ-खाऊँ करती हवेली। हवा के झोंके बिजूका-सी काँपती।
गोली की धाँय की धूल बैठी नहीं थी, अभी। घोडे़ की दुलत्ती की उड़ती धूल उसमें और मिल गई। एक भय के सौ भय। एक फ़िक्र की हज़ार फ़िक्र। एक शंका की लाख शंकाएँ। घोड़ा नदारद था और सरदारसिंह उसकी नाल के निकट बेहोश हुआ पड़ा था। पिछवाड़े के छोटे गेट की ओर उसकी निगाह गई कि माजरा बूझ गई। पशु तक भाग खडे़ हुए।
पति सरदारसिंह के प्रति आक्रोश और हेय का जो भाव उसकी हृदय-कलिका में घर किये था, पति की क्रूरता और कारगुज़ारियों का जो चिट्ठा उसके ज़ेहन में एकत्र था, उसे मरणासन्न देख कर सब भूल-बिसर गई। आँखें रोने को हो आईं और हृदय किरच-किरच हुआ। उसके सम्मुख एक ऐसा विदारक था, जिसका निवारण उसके बूते से बाहर था।
सूरज की उगती किरणों में शमा ने उसकी निढाल पड़ी काया की ओर देखा। साँस लेता लोथड़। ‘अगर ये चले गए। वह इतनी बड़ी हवेली में अकेली किसके बूते रह पाएगी। बेटे-बहू का क्या भरोसा आ भी जाएँ, नहीं भी आएँ।’ गाँव खार खाया है। संकट के समय आदमी में स्वतः ही साहस पैदा हो जाया करता है। हवेली के भीतर जा कर पानी लाने में देर होगी, पशुओं को पानी पिलाने वाले टांका से उसने बाल्टी भरी और अंजुली भर-भर उसके चेहरे पर छींटे मारे।
सरदारसिंह की अचेत पड़ी काया ने फड़फड़ी ली। आँखें टिमटिमाईं और मुँह पर हाथ फेरा। उसे जैसे ही होश आया, घोड़े की खुरों की चोटें टीस उठीं। दर्द के मारे ऐसा बेहाल हुआ, कंठ कराह उठा। आँखों से पानी बह निकला। शमादेवी ने हाथ का सहारा दिया कि वह कसमसाता हुआ उठ बैठा। उसने उसकी दोनों बग़लों हाथ डाले और उसे उठाने के लिए जान फूँक दी। ख़ुद की हिम्मत। पत्नी का सहारा। वह वेदनाभरी आह के साथ उठ खड़ा हुआ। शमा उसकी बाँह पकडे़ आगे-आगे चली। उसे उसी कमरे में ला कर लेटा दिया था, जो मालखाना था। उसकी क़मीज़ उघाड़ कर देखा। कलेजा मुँह को आया। सीने पर घोड़े के खुर पडे़ थे, जैसे गीली मिट्टी पर पदचाप। नील उठी थीं और उनमें लहू चुहाया था। बावजूद उसने इतना तक पूछना मुनासिब नहीं समझा, “घोड़े ने दुलत्ती कैसे मारी आपको?” उसने चूल्हा जलाया। दूध ओटाया, उसमें गुड़-हल्दी मिलाए और उसे पिला दिया था।
सीने पर पड़ी चोटों के दर्द पर कपड़ों की रगड़ जलन करने लगी तो उसने क़मीज़ और बनियान निकालने की चेष्टा की। ऊह-ऊह करके रह गया था। शमादेवी ने उसके कपडे़ उतरवा कर सिरहाने रख दिये।
वह चिंता की चादर ओढ़े अदब के साथ हवेली के मुख्य द्वार पर आकर खड़ी हो गई थी, तुषारपात की लता-सी। गाँव के उबाल का जो भय उसकी आँखों में व्यापा था, मृतप्रायः पति की दुर्दशा के समक्ष वह तुच्छ था।
एकाएक उसे गाँव का रूपाराम जाता दिखाई दिया। गर्दन उठाए लम्बे-लम्बे क़दम रखता अपने मक़सद से निकल रहा था। हवेली के सामने ठिठका। खखरा और फिर थूक दिया था, थक से। पिंजरे से मुक्त हुए पंछी में अलग तरह का आक्रोश और जोश होता है। ग़ुलामी से छुटकारा पाने पर कुछ वैसा ही जोश और ख़रोश उसमें विद्यमान था।
हवेली के बड़े दरवाज़े के छोटे गेट के एक पल्लू की ओट लेकर खड़ी शमा ने उसे थूकते हुए देख लिया था। उसने धीरे से आवाज़ दी, “रूपा जी।”
नारी कंठ की करुण आवाज़ सुनकर उसकी नज़रें उधर घूमीं। स्वर जाना पहचाना था और सालों बाद उसके कानों पड़ा था। ‘हवेली की मालिकिन!’
रूपाराम अलबत्ता तो हवेली के सामने से गुज़रता नहीं था। मजबूरीवश एक-दो बार निकला तो दिनभर की बेगार झेलनी पड़ी थी।
“मदद करें, रूपाजी।” शमादेवी के स्वर में अनुनय, आजिजी और शालीनता की त्रिवेणी थी।
“मदद करें!” वह आश्चर्य से सिमटने लगा, “अं?”
“हाँ रूपा जी।” उसका गला भर आया था।
रूपाराम के क़दम अनायास ही हवेली की ओर बढ़ गये थे।
वह दो-चार क़दम बढ़ कर खड़ा रह गया। बोला, “आगे बढूँगो मन बदल जावेगो, मेरो।”
शमा उसकी मंशा भाँप गई थी। प्रतिशोध का भाव भड़का हो। यह वही जगह है, जहाँ उसके दो छप्पर और चौक हुआ करते थे। हवेली रूपाराम का घर खा गई। दया-पात्र सी बोली, “उन्हें गहरी चोट लगी है . . . . . . मर जाएँगे, मदद करें, रूपाजी।” यक़ीन के साथ उसने उसकी ओर रुपये बढ़ाए, “रूपाजी यह रुपए रख लो और मेरे पीहर चले जाओ। आपकी ननिहाल भी वहीं है। आज़ादी मिली है न। ख़ून-ख़राबा हुआ है। गाँव की राज़ी ख़ुशी लेते आना। मेरे पिताजी के घर चले जाना। वहाँ से मेरे बेटा-बहू और उनके बच्चे को बग्गी में बैठा कर ले आना। यहाँ से बैलगाड़ी करके ले जाओ।” उसका कंठ रुँध गया और आँखों आँसू ढरक आये।
उसमें ग़ुस्सा भरा, “थारी लाज मेरी नाड़ ना हिली, उकां बौहार कती ना जातो। एक बात और कहूँ थारे कारण हवेली बच गई नहीं रात धुओं उठतो।”
“हें!”
“हाँ।” वह मन मारते हुए पैसे लेकर हवेली से लौट पड़ा था।
दूसरे दिन रूपाराम की बैलगाड़ी आई। पीछे नागौरी बैलों की जोड़ी से जुती सजी-धजी बग्गी थी। अग़ल-बग़ल और आगे-पीछे तीन-चार लठैतों की टुकड़ी थी। गाँव में पहले ही यह बात फैल गई थी कि सरदारसिंह की छाती में दुलत्ती मार कर घोड़ा हवेली से भाग छूटा है, न जाने उसमें कितनी साँसें शेष हैं।
हवेली के दरवाज़ा के पल्ले खुलने की धरड़-धरड़ सुनी कि शमादेवी का भरोसा पुख़्ता हुआ बेटे-बहू आ गये हैं। बग्गी भीतर आएगी। वह साड़ी का पल्लू सँभालती कमरे से बाहर आ गई। बैलों के गले में बँधी घंटियों की टन टन टन थम गई थी। बग्गी अंतपुर के गेट के सामने खड़ी थी। उसका लड़का नीचे खड़ा था। बहू अपना टाबर गोदी में लिये बग्गी में विराजी थी। शमा ने नयनों में विभोर लिए बहू की जुहार की और उसे स्नेहसिक्त हाथों बग्गी से नीचे उतारा। बच्चे को गोदी में ले लिया और उसका सिर माथा चूमती-पुचकारती रही, देर तक। पति के कष्ट के बावजूद बेटा-बहू और बच्चे को पाकर उसके अधरों पर पुलक उतरी थी।
हवेली का निर्माण होने के बाद कर्मदत्त और उसकी पत्नी पहली दफ़ा आये थे। हवेली की छटा देख विस्मय में डूबे जाते थे। कहाँ झूंपा जैसे वे दो छप्पर और कहाँ यह आलीशान हवेली! रात-दिन का अंतर। उसकी आँखों में सहसा एक विचार उदय हुआ, “अँग्रेज़ों की ग़ुलामी जहाँ देश के लिए अभिशाप थी, अँग्रेज़ों के सिपहसालारों के लिए वरदान रही।”
सरदारसिंह ने आँखें टिमटिमा कर देखा बेटा-बहू उसके पैरों की ओर झुके थे। उसके हाथ इतने तक नहीं उठे, दोनों के सिर की ओर बढ़ जाएँ। बहू दूसरे कमरे में चली गई और कर्मदत्त उनके पास ही बैठा रहा। सरदारसिंह ने कर्मदत्त से कहा, “बेटा, मैं देश का दुश्मन और गाँव का गद्दार रहा। ख़ूब दरिंदगी की। घणा लूटा।” उसने करवट बदल ली। आँखें भर आईं थी।
वक़्त! वक़्त सिंकदर भी होता है। वक़्त दलद्दर भी होता है। वक़्त फूल भी। वक़्त काँटा भी। वक़्त फ़र्श। वक़्त अर्श। वक़्त ने ऐसा गुल खिलाया, गुल रह गया। पाप का घड़ा भरने पर यही अंत होना था। उसे नींद की झपकी आई कि मसान जलता दिखाई दिया, “कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी, साथ ना जाये फूटी कौड़ी। चार फूटी कौड़ियों की क़ीमत एक पूरी कौड़ी की क़ीमत के बराबर होती है। आदमी की मृत काया तो मुट्ठी भर राख है।”
उसके सीने का दर्द दोहरा हुआ जाता था। खाँसते-खाँसते बेहाल हो उठा। देह धूजने लगी। खाट हिलने लगी। हवेली डोलने लगी। आत्मालाप में ऐसा खोया, खाँसी उठ खड़ी हुई। बलगम कम, ख़ून ज़्यादा। खाँसी-बलगम-ख़ून। घोड़े की दुलत्ती . . . . . .। आसमान नीचे आता दिखाई दिया और धरती ऊपर उठती।
खाँसी-खाँसी-खाँसी। खाँसी की सुरसा ने साँसों का सरगम छीन लिया था। क़ुदरत का यह न्याय गाँव को स्वाभाविक लगा, “जिसे इंसान सज़ा देने में असमर्थ होता है, क़ुदरत स्वयं उसे सज़ा देती है।”
. . . . . . . . .। हवेली रोई और आँसू पोंछ लिये थे।
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