पिता का श्राद्ध
कथा साहित्य | कहानी डॉ. आराधना श्रीवास्तवा1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मैं एक सेमिनार का हिस्सा बनने के लिए पुणे से दिल्ली की ट्रेन में अपनी आरक्षित सीट पर बैठने जा रही थी कि पीछे से आवाज़ आई, “मैडम यह मेरी सीट है आप अपनी सीट का नंबर एक बार चेक कर लीजिए।”
मैंने फिर एक बार मोबाइल उठाया तो देखा कि जल्दबाज़ी में उन्यासी को उनहत्तर पढ़ गयी थी और फिर मैं अपनी सीट पर जा बैठी फिर वह आवाज़ अभी तक कानों में गूँज रही थी मैडम यह मेरी सीट है। ऐसा लग रहा था मैं अपनी आवाज़ सुन रही हूँ; ख़ैर कोई बात नहीं। मैं अपने सेमिनार के पेपर निकाल कर देखनी लगी—मुद्दा बड़ा था पर्यावरण का। मैं अपने सेमिनार से चाहती थी लोग अपनी छोटी-छोटी आदतें बदलकर, बड़े बदलाव की ओर क़दम बढ़ायें क्योंकि धधकती धरती अब समूचे विश्व को निगल लेगी यदि समाधान नहीं हुआ तो।
मैं अपने पेपर देख ही रही थी कि दादी का फोन आया जिन्हें प्यार से मैं आजी कहती हूँ। इन्स्ट्रकशन पर इन्स्ट्रकशन—ट्रेन का खाना मत खाना जो मैंने सत्तू के पराँठे और कचौड़ियाँ दी हैं उसे ही खाना, जब मीठा खाने का मन करे तो बेसन वाले लड्डू।
आजी मुझे बहुत प्यार करती थी क्योंकि पिता को देखा नहीं, माँ थी लेकिन भगवान ने उसकी गोद को भी मुझसे दूर कर दिया। आजी और बाबा ने मुझे बड़ा किया बाबा तो ऊपर सख़्त और अन्दर से मुलायम जैसे नारियल गोला।
मैं आजी को तंग करती तो वह बाबा से शिकायती लहज़े में मुझपर प्यार ही बरसाती। कभी हाथ तक नहीं उठाया और मुझे भी न माँ की कभी कमी लगी न पापा की; बस जब कोई पूछता माता–पिता के बारे में तो चुप हो जाती। दादा–दादी को ही माता–पिता बताती। उन्होंने भी मेरे सभी दस्तावेज़ में स्वयं को संरक्षक न करके माता–पिता के नाम के स्थान पर अपना नाम दर्ज़ करवाया था। बस कुछ बच्चे चिढ़ाते थे बुड्ढे माँ–बाप वाली लड़की। मैं चुपचाप रोती लेकिन आँसुओं को किसीके सामने गिरने नहीं दिया। घर आती, आजी से सब कहती तो आजी मुझे अपनी गोद में बिठा लेती थी और आखों में देखकर कहती, “दुनियाँ की मत सुनो बस तुम्हें आजी के जीते जी कुछ करना है और गाँव का नाम रोशन करना है।”
मैं उनके गले लगकर रोने लगती कहती, “जी आजी।”
आजी के पास कुछ संदूक लोहे के थे और कुछ लकड़ी के। एक छोटे-से लोहे के संदूक में उनका ख़ज़ाना था—जो कहती—मेरे मरने के बाद तेरा। मैं हँसकर कहती, “आजी मेरी १०० साल जीयेगी।” इस पर बाबा ठहाके मारकर कहते—बुढ़िया ४०० साल जीयेगी, जवानी से मेरा ख़ून जो पी रही है।
आजी और बाबा की नोक-झोंक शुरू हो जाती फिर बाबा पान लगाकर आजी को मनाते। आजी पान खाते-खाते कहती, “जाओ बुढ़ऊ पाँच सौ साल जीओ।” लेकिन एक दिन बाबा खेतों में काम कर रहे थे, बारिश होने लगी और आसमान से कड़कती बिजली बाबा से जा टकरायी—बाबा का सारा शरीर जल गया। दीनू भैया ने अपनी पुरानी कार निकाली और पास के एक अस्पताल में बाबा को ले गए जहाँ बाबा का इलाज होने लगा। मैं डॉक्टर की आँखों में उम्मीद देखना चाह रही थी कि कह दे सब ठीक हो जाएगा—लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैं आजी के साथ बाहर बैठकर बाबा के होश में आने का इंतज़ार करने लगी। तब एक लड़का बाहर आकर बोला, “मरीज आप दोनों को बुला रहे हैं।”
मैं और आजी भागते-भागते अन्दर गये बाबा मेरा हाथ आजी को देते हुए कहा—जब-तक इसे लायक़ न बना देना इस दुनियाँ से जाना नहीं मेरी बुढ़िया—फिर बाबा की आवाज़ सदा के लिए बंद हो गयी।
आजी ने मुझे पढ़ाया-लिखाया और मुझे मौसम वैज्ञानिक बनाया। वह चाहती थी कि बिजली गिरने से किसी की मौत न हो इसकी चेतावनी पहले से दे दी जाए।
आज आजी बहुत ख़ुश है क्योंकि मैं मौसम वैज्ञानिक जो बन गयी। मैंने आजी को ट्रेन वाली ग़लती भी बताई फिर फोन रखकर वाशरूम जा रही थी तभी अचानक उसी युवक से टकरा गयी जिसकी सीट पर जाकर बैठ गयी थी। सहसा उससे बोला, “आप मेरे बाबा के जैसे लगते हो।”
वह भी हँसकर बोले उठा, “हाँ, मैं आपका बाबा ही हूँ।”
फिर मैं उसकी सीट पर बैठ गयी और मैं थोड़ा बातूनी थी सो बात करने लगी और उससे उसके बारे में पूछने लगी। उसने कहा, “पिता जी बहुत बीमार हैं इसलिए दिल्ली से इलाज चल रहा है, वहीं जा रहा हूँ। माँ उनकी देखभाल कर रही है, मैं भी छुट्टी लेकर जा रहा हूँ।”
मैंने वही दर्द उसकी आखों में देखा जिस दर्द को मैंने बरसों पहले झेला था। मैं वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गयी और अपने पिता के बारे में सोचने लगी जिसकी घर में कोई तस्वीर तक न थी। बाबा कहते थे—आजी को याद आती है इसलिए घर में तेरे पापा की कोई तस्वीर नहीं रखी। मैं अपने पिता की तस्वीर कल्पना में बनाने लगी तब तक दिल्ली स्टेशन आ गया।
मैं सीधे वहाँ से ऑटो लेकर अपने होटल और वहाँ नहा-धोकर अपने सेमिनार स्थल पहुँची। सेमिनार बहुत अच्छा गया और मैं आश्वस्त हुई कि सब मिलकर पृथ्वी का तापमान कम करने का कोई उपाय अवश्य निकालेंगे। उसी होटल में वह ट्रेन वाला लड़का भी अपनी माँ के साथ ठहरा था और उसके पिता जी पास के ही एक बड़े अस्पताल में ज़िन्दगी की जंग लड़ रहे थे। मैंने आते–जाते उसके पिता जी का हाल-चाल पूछा उसने कहा, “विधाता ही जाने,” और चुप . . .
फिर उसने पूछा, “तुम्हारे पिता जी हैं?”
मैंने न में सिर हिलाया और कहा, “तुम क़िस्मत वाले हो। मैंने तो कभी अपने पिता को देखा ही नहीं।”
उसने कहा कि तुम मेरा एक काम कर सकती हो।
मैंने पूछा, “क्या?”
उसने कहा, “मेरे पिता जी चाहते हैं, उनकी माँ अभी तक ज़िन्दा है और वह उन्हें देखना चाहते हैं और अपनी माता से माफ़ी माँगना चाहते हैं। क्योंकि पिता जी की माँ उनसे इतना नाराज़ है कि दादाजी की मृत्यु पर भी संदेशा नहीं भेजा। इसी डर से हम लोगों ने भी अपनी दादी माँ को नहीं देखा है। क्या तुम कानपुर के गाँव जानती हो?”
मैंने पूछा, “कौन सा गाँव?”
वह बोल उठा, “पनकी।”
मैं तपाक से बोली, “वही तो मेरा गाँव है। अब तो अब मेरा वहाँ कोई नहीं है बस कभी-कभार आजी को घूमाने ले जाती हूँ। आजी अपना घर देखती है और मैं अपना बचपन। अच्छा बताओ तुम्हारे दादाजी का क्या नाम था?”
उसने बताया, “रामचरण सिन्हा।”
मैं अवाक् रह गयी और उससे बिना कुछ बोले पुणे वापस आ गयी। और आजी को घूरते हुए पूछा, “बताओ तुम कभी पिता जी का श्राद्ध नहीं करती हो; माँ और बाबा का तो हर साल होता है। बताओ पिता जी की मृत्यु कैसे हुई थी?”
आज अचानक मैं इतना क्यों व्याकुल हूँ आजी परेशानी हो गयी और चुप रही। मैंने उन्हें झकझोरते हुए पूछा, “बताओ आजी पापा के बारे में।”
आजी वह छोटी-सी टूटी-फूटी बक्सी जो गाँव से लाई थी, मेरे आगे पटक कर बोली, “देख ले।”
मैंने उसमें पापा के ख़त देखे जिनमें उन्होंने लिखा था कि दिल्ली में नौकरी करते हुए उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी। मैं समझ चुकी थी आजी पापा को क्यों मरा हुआ मान चुकी थी। क्यों आजी माँ को अपनी बेटी ही समझती थी और जब तक ज़िन्दा थी—माँ को अपनी बेटी की तरह रखा।
मैं आजी से बोली, “चल आजी ज़रूरी काम से कानपुर चलना है खेत की कुछ बात है।”
आजी फटाफट अपनी सूती धोती पहन तैयार हो गयी और दिल्ली की तत्काल टिकट ली और संजीवनी अस्पताल पहुँच गयी। ट्रेन वाले युवक को फोन करके कहा, “लो ले जाओ अपनी दादी माँ को।”
आजी पूछने लगी, “कहाँ लाई है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।”
तब-तक वह अनजान ट्रेन वाला शख़्स जिसमें मुझे बाबा की झलक दिखी थी आ गया और बोला, “दादी माँ चलो।”
आजी हाथ छुड़ाते लेकिन आगे बढ़ गयी और एक ठंडे से कमरे में बिना चप्पल के गयी और उसे देखा जिसे वर्षों पहले भूल चुकी थी। माँ-बेटे फूट-फूटकर रोने लगे। माँ ने अपने हाथ से जब बेटे के माथे को छुआ वह जान गया कि माँ ने मुझे माफ़ कर दिया। जैसे लगा, वह अपने आपको थोड़ा स्वस्थ महसूस कर रहा है। धीरे से पूछा, “तेरी बेटी कैसी है?” आजी ने आवाज़ लगाई, “लाडो आ।”
मैं अन्दर दाख़िल हुई पहली बार मैं पापा शब्द बोलकर बहुत रोई। उससे पहले भी मैंने दुखों का पहाड़ देखा था लेकिन इतना दुखी कभी नहीं थी। मैं और आजी आज शाम ही पुणे के लिए निकलते कि होटल के कमरे में एक महिला दाख़िल हुई, रोती हुए बोली, “माफ़ कर दो बेटी।” और आजी के चरणों में गिरकर बोली, “हमें छोड़कर मत जाइए।”
आजी असमंजस में कुछ नहीं बोली मैं तपाक से बोली, “ठीक है।”
आजी के बूढ़े चेहरे को देखकर पिता के चेहरे पर जो चमक थी—उसे सबने देखा था। मैं आजी को छोड़ पुणे आ गयी और भाई से सबका हालचाल लेती रही।
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