धरती तपन सह न पाए
काव्य साहित्य | कविता डॉ. आराधना श्रीवास्तवा1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
गगन अंगारे बहुत बरसाये।
धरती तपन सह न पाए।
ताल तलैया सूख रहे,
पवन उड़ा रही धूल।
कोई तो होगा ज़िम्मेदार,
जो कर रहा बड़ी भूल।
चढ़ा धरती का पारा
जेठ दुपहरी सबको जलाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाये।
धरती तपन सह न पाए॥
हाथ से बुने बेने से
गर्मी में काम चल जाता था।
कहीं कहीं बिजली से
कूलर पंखा चल जाता था।
फ़्रिज ऐसी की ठंडक ने
बाहर की तपन को बढ़ाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाए।
धरती तपन सह न पाए॥
प्लास्टिक के कचरों का,
रात दिन होता व्यापार।
शान्ति नहीं युद्ध ही
दुनिया का बन गया विचार।
धरती गगन की कौन सोचे,
जीडीपी सारी हथियार बनाने में लुटाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाए।
धरती तपन सह न पाए।
अपनी ताक़त दिखाने के लिए,
गोला बारूद तोप से खेल रहे।
जिसने कोई जुर्म नहीं किया,
वो बारूदों के धुएँ झेल रहे।
धुएँ से धुँध हो चली धरा,
अब इस धरा को कौन बचाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाये।
धरती तपन सह न पाए॥
धरती तो धरती रही
आसमान में भी छेद हो गये।
आकाश से पाताल तक
अब तक बहुत भेद हो गये।
नदियाँ सूख रही, पिघले ग्लेशियर से
सागर भी है उफनाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाये।
धरती तपन सह न पाए।
दो चार ऐसी की जगह
एक ही ऐसी चलाया करो।
जहाँ तक बात बन जाए
पंखे के नीचे ही सो जाया करो।
घर दफ़्तर कारख़ानों से निकलने वाले
सी एफ़ सी से ओज़ोन परत छटपटाए।
गगन अंगारे बहुत बरसाये।
धरती तपन सह न पाए॥
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