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पुष्पा मेहरा के हाइकु

 

प्रस्तुत है पुष्पा मेहरा जी के हाइकु। पुष्पा मेहरा दिल्ली की रहने वाली हैं। इनके ‘अपना राग’, ‘अनछुआ आकाश’ और ‘रेशा-रेशा’ तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनका हाइकु-संग्रह ‘सागर मन’ भी प्रकाशित हुआ है । इसी संग्रह के पंद्रह हाइकु मराठी अनुवाद के साथ आपके लिए लाया हूँ। पुष्पा मेहरा कहती हैं:

“छोटी बग़िया। फूलों को ले झूमती/ख़ुश्बू भरी”

उड़ती हुई आई इन आयातित फूलों की ख़ुश्बू ने मेरा मन हाइकु-काव्य विधा की ओर आकर्षित किया। ऐसे ही हम सब को आकर्षित करनेवाले और सृष्टिरूप का आनंद देनेवाले हैं यह हाइकु:

दिनभर की थकान, रात में सुख की नींद लेकर जाग जाते ही, नई स्फूर्ति, नई उमंग और उस में प्रभात की ठंडी बयार . . . पंछियों की चहचहाट . . . यह अनोखा नज़राना सृष्टि बहाल करती है। अपना छोटा सा . . . नन्हा सा . . . बालक, उसकी बाल लीला से स्नेह का निर्झर उद्गमित करता है, वैसे ही आकाश की काली चादर पर एक तारा मन मोह लेता है:

“भोर की गोद। बैठा है शुक्र तारा। राजदुलारा”
“उषा कुशीत। बसला शुक्रतारा। छकुलाराजा”

आँगन घर की शोभा बढ़ाता है। एक कोने में ज़रा-से पौधे उस पर उड़ती हुई तितलियाँ, फूल, भ्रमर आदि . . . मानो यह घर का ही अंग है। यह दृश्य अंगभूत सौंदर्य लिये हुए है, और उसमें इस हाइकु का कहना चार चाँद लगाता है:

“मेरे आँगन। ले के गुलाल आई। भोर छबीली”
“माझ्या अंगनी। गुलालासह आली। प्रभा सुंदर”

घोर निद्रा में डूबे हुए हम, जाने कितने सपने देखते रहते हैं! एक भी पूरा नहीं होता। सोते रहने से जो मनचाहा—वो थोड़े ही मिलता है। पाने के लिए आराम त्यागकर मेहनत की ज़रूरत होती है। और इसीलिए:

“सोन किरणें। हमें जगाने आईं। ले सात रंग”
“सोनकिरणें। उठवायला आली। सप्तरंगात”

निसर्ग रूप अनमोल है। इसके सहवास में मदहोशी छा जाती है। भटक-भटक कर भी पाँव कभी थकते नहीं। सुबह, दोपहर या संध्या समय दिन हो कि रात हर पल नया-नया मंज़र, नया-नया उत्साह . . . इस सृष्टि की देन अतुलनीय है।

“किसने टाँके। मख़मली घास पे। ओस के मोती”
“कुणी टाचले। मख्मली तृणावर। दंवाचे मोती”

हम कितना भी श्रम क्यों न करें, सृष्टि नया उत्साह भर देती है। अंगन/आँगन, अंगन/आँगन के फूल और उसकी सिंचाई करने वाली मालकिन और क्या चाहिए, जीने के लिए? ऊर्जा तो अपने आप ही मिल जाती है:

“सूरज झाँका। आत्म-प्रकाश फैला।गूँजे भ्रमर”
“सूर्य डोकावे। पसरे आत्मतेज। भ्रमर स्वर”

सृष्टि के लिए दिन हो या रात कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, किन्तु, हम जीवों के लिए इसका असर होता है। दिन में काम, रात में आराम, यह तो आम बात है। हमारे लिए रात को सुनसानी और डर की आहट भी महसूस होती है, इसलिए सारे दरवाज़े ठीक-ठाक बंद किये हैं कि नहीं, बारीक़ी से देख लेते हैं। लेकिन, कुछ जीवों को रात ही दिन-सा लगता है:

“जुगनू उड़ें। रात के अँधेरे में। पेड़ों पे झूलें”
“काजवा उड़े। रात्रीच्या अंधारात/ झुलतो वृक्षी”

मौसम के अनुसार दिन-रात बदलते है। हमें तो बस स्वीकारना होता है। बरसात, ठंड़ी या धूप आदि नैसर्गिक स्थितियाँ हम बदल नहीं सकते। लेकिन, हमने इस में भी कुछ नयापन खोजा है। विविध प्रकार के त्योहारों की, रीतियों की योजना करके हम हमेशा प्रफुल्लचित्त रहते हैं। इस हाइकु में बहुत ही अलग ढंग से यह बात कही गई है:

“होली के संग। छाई तो छाई रही। प्रेम तरंग”
“होळीसोबत। भिणली ती भिणली। प्रेम लहर”

हवा का झोंका मन को प्रसन्न करता है। फूलों की ख़ुश्बू और ठंडक का अहसास तरोताज़ा बना देता है। कला का रसिक हो या साधारण व्यक्तित्व, इस लुभावने मौसम में एकाएक होंठों पर गीत आ ही जाता है। ऐसे माहौल में प्रेमीजनों को तो सारी दुनिया ही मिल जाती है। हवा के साथ-साथ वह दोनों भी झूम उठते हैं:

“चली बयार। उड़े प्रेम गुलाल। गायें रसिया”
“येई लहर। उड़े प्रेम गुलाल। गातो सजण”

ज़माना समय के अनुसार बदलता रहता है। नये-नये आविष्कार आ जाते हैं। कामकाज का तरीक़ा बदल जाता है। इस वस्तु से जुड़ा पुराना काम और वो करने की जद्दोजेहद सहज ही प्रस्फुटित हो कर मन प्रफुल्लित होता है:

“गीजर युग। धूप में रखा पानी। यादों में दादी”
“गिझर युग। उन्हीं ठेवले पाणी। स्मरते आजी”

सांप्रत की स्थिति कभी अच्छी कभी बुरी भी हो सकती है। लेकिन इस में रुचि न रखकर, हाथ का छोड़, जो नहीं है या बीत गया है, उसी को पाने की इच्छा सताती रहती है: 

“धागे यादों के। बिछौना बना लेटी। मैं उम्र भर”
“आठव बँध। अंथरुण झोपले। जीवनभर”

कभी-कभी आदमी बिना वजह नाराज़ रहता है। जो है उसी में वो ख़ुशी नहीं पाता, हमेशा अपना ही रोना रोता रहता है। हालाँकि, उसके पास जो है, बहुत है, जो नहीं है, उसके पीछे दौड़कर अभी की ख़ुशियाँ वो ख़राब करता है। इस हाइकु में यही बताया गया है:

“रोक लो आँसू। आँख की अमानत। सूखेगी झील”
“थांबव अश्रू। नयनांची ती ठेव। आटेल डोह”

कष्ट करके कोई समृद्धि के मंज़िल तक पहुँचे ये तो ठीक है, लेकिन, किसीका घर उजाड़ कर अपना घर सजाना, यह इन्सानियत नहीं है। यही भाव इस हाइकु में दिखाई देते हैं:

“ऊँचे भवन। पाखी बसेरा खोजें। मिलें न शाखा”
“उंच मजले। धुंडे पक्षी ठिकाणा। मिळेना फांदी”

इच्छा कभी भी पूरी नहीं होती । एक के बाद दूसरी अनायास ही जन्म लेती है। इस हाइकु में, हाइकुकार ने कुछ कहा तो नहीं, पर संकेत दिया है। ऐसा संकेत कि आदमी की सोच के अनुसार अर्थ निकलता है और यही सच्चे हाइकु का गुण है:

“आग चूल्हे की। बुझाए जठराग्नि। जलाए दूजी”
“चुलीची आग। पोटआग थांबवी। पेटवी दुजी”

जन्म से कोई भी कुछ सीखकर नहीं आता, चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। हम शिशु पैदा होते ही उसको मनचाहे संस्कार देते हैं। लेकिन, जब उम्र बढ़ती है तब वह शिशु, शिशु नहीं रहता, ख़ुद ब ख़ुद सीखने लगता है, तब अपना संस्कार वह अपनायेगा या नहीं, यह उस पर निर्भर करता है।

“माटी है नम। ढाल लो मनचाहा। सूख न जाए”
“माती ही ओली। वळा मनासारखे। वाळण्याआधी”

तूफ़ान आया तो पहले कम-क़ुव्वत्त जीवों पर प्रभाव डालता है। और जो पहले ही कठिन अवस्था में हैं, या ऐसी अवस्था भुगत चुके हैं, उन पर आसानी से तूफ़ान का प्रभाव नहीं दिखेगा। यही बात इस हाइकु से उजागर होती है:

“आँधी रेतीली। ताज ले काँटों-भरा। खड़ा कैक्टस”
“तूफ़ानमाती। काटेरी मुकुटात। उभा कॅक्टस”

तो सज्जनो, यह थे पुष्पा मेहरा जी के हाइकु । उम्मीद है यह हाइकु विवरण आपको अच्छा लगा हो। आप इनका ‘सागर-मन’ हाइकु-संग्रह अवश्य पढ़ें।

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