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समीर अंकल

 

सावन महीने की रिमझिम बारिश के बाद मौसम बड़ा सुहाना हो गया था। चारों ओर हरियाली की चादर बिछी थी। रविवार का दिन था तो सुधा ने अपने पति समीर से कहा, “हर रविवार को आप अकेले ही निकल जाते हो। आज बच्चों को कहीं घुमाने लेकर चलते हैं।” बच्चों ने सुना तो वे बहुत ही ख़ुश हो गए। वो तो यही चाहते थे। इसलिए तुरंत ही त्योहारों पर मिले हुए नए कपड़े निकाले और तैयार हो गए। सुधा ने जल्दी-जल्दी कुछ नाश्ता तैयार किया। जूस बनाकर एक बोतल में पैक किया और अपनी गाड़ी से निकल पड़े। 

पूरा रास्ता अंताक्षरी करते, गीत गाते वे एक तालाब किनारे पहुॅंचे। वहाँ पहुॅंचने पर पहले से ही कुछ बच्चे रंग और पेंसिल लिए हुए तो कुछ बच्चे अपनी किताब लिए समीर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। समीर को देखते ही बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े और एक दूसरे से कहने लगे, “अंकल आ गए, अंकल आ गए।” साथ में सुधा और उसके बच्चों को देखकर थोड़ा संकोच करने लगे तब समीर ने उनसे कहा, “बच्चों संकोच मत करो। ये दोनों भी तुम्हारे मित्र है। आज का दिन तुम सब साथ में खेलोगे और पिकनिक मनाओगे।”

समीर ने अपने बेटे पवन और आकाश का परिचय सब बच्चों से करवाया। सुधा को कुछ भनक थी कि समीर हर रविवार को पुरानी बस्ती के बच्चों के लिए नयी-नयी चीज़ें लेकर जाता है। उन्हें मिलकर बच्चों को भी ख़ुशी होती है। खेल-खेल में वो बहुत कुछ सीखते रहते हैं। समीर ने अपने बच्चों को बताया कि दो-न महीने पहले छुट्टी के दिन जब वह सब्ज़ियाँ लेने आता था तो ये छोटे बच्चे भी सब्ज़ियाँ बेचते रहते थे। जो मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैंने इन बच्चों से बात की और पूछा कि “आप पढ़ने के लिए विद्यालय में क्यों नहीं जाते?” तब उन्होंने बताया कि “हमारे दो समय भोजन के लिए हमें मेहनत करनी पड़ती है। हमें भी पढ़ने का बहुत शौक़ है। हमारे माता-पिता हमारे लिए न किताबें ख़रीद पाते हैं न ही हमें विद्यालय में पढ़ने के लिए भेज सकते हैं। तब मैंने उन्हें कुछ किताबें दिलाईं। ये बच्चे रेत पर बैठकर अलग-अलग चित्र बनाया करते थे तो उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए ड्राइंग बुक, पेंसिल और रंग दिलाए। तब बच्चों के चेहरे पर जो रौनक़ देखी, उसने मुझे प्रेरित किया। अब मैं नियमित रूप से इधर आता हूँ। ये बच्चे चाहे स्कूल नहीं जा पाते लेकिन कुछ सीखते रहते हैं।”

यह सुनकर पवन और आकाश ने प्यार से अपने पिता को गले लगाया। उन दोनों ने मिलकर एक साथ कहा, “पापा आप कितने अच्छे हो। आप न सिर्फ़ हमारा ध्यान रखते हो लेकिन इन बच्चों को आपने जो ख़ुशी प्रदान की है वह पूरे समाज के लिए अनुकरणीय है। पापा आप महान हो। हमें आप पर गर्व है।”

सुधा ने भी बच्चों की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि “अब हर रविवार, त्योहार पर मैं इन बच्चों के लिए घर से ही खाना और मिठाई बनाकर भेजा करूँगी। स्वादिष्ट भोजन पर इन बच्चों का भी पूरा अधिकार है।”

पवन और आकाश ने अमीरी–ग़रीबी का भेद मिटाकर सभी बच्चों के साथ मिलकर बरगद के पेड़ तले ठंडी हवा में नाश्ता किया और जूस पिया। सभी बहुत ख़ुशी से नाचे गाये और धूम मचायी। 

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