श्रीलंकाई बहू और सर्दियों की धूप
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी जुलियन तक्षिला मेन्डिस1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
यह एक श्रीलंकाई बहू की नज़र से भारतीय सर्दी और धूप के साथ हुए उसके प्यारे हल्के-फुल्के रिश्ते की कहानी है। जहाँ ठंड है, हँसी है और धूप में बैठकर ज़िंदगी को समझने की एक छोटी-सी कोशिश भी और आप सभी को मेरी ओर से ठंड से काँपता हुआ नमस्कार!
अब मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ पति ही नहीं बल्कि नए रिश्ते और कुछ ऐसे मौसम भी आए हैं जिनसे उसका पहले कभी औपचारिक परिचय ही नहीं हुआ था। मेरे लिए तो वह मौसम था—सर्दियों में सुहानी लगने वाली धूप।
शादी के बाद पहली बार भारत पहुँचते ही मुझे लगा कि सिर्फ़ पति के साथ नहीं पूरे “मौसम तंत्र” से विवाह करके आई हूँ। भारत आके मुझे समझ में आया की सर्दियों में धूप कोई साधारण चीज़ नहीं “अतिथि देवो भव:” वाली एक अत्यंत सम्मानित मेहमान होती है।
सर्दियों में जैसे ही धूप निकलती है, लोग ऐसे बाहर निकल आते हैं, मानो धूप नहीं मुफ़्त की पानी-पूरी बँट रही हो।
श्रीलंका में जन्म लेकर मैंने सोचा था कि सर्दी बस ए.सी. बंद करने का नाम होती है, लेकिन यहाँ आके पता चला की सर्दी हड्डियाँ बजवाती है, और आत्मविश्वास भी हिला देती है।
सुबह-सुबह सूरज भी बड़े संकोच से निकलता है, मानो पूछ रहा हो, “नई बहू? कहीं ज़्यादा ठंड तो नहीं?”
और हम रजाई के भीतर से पूरे अधिकार के साथ जवाब देते हैं, “आ जाइए महाराज! आज तो आपका ही इंतज़ार था।”
नहाने गयी तो बाल्टी ने साफ़ मना कर दिया। पानी बोला, “आज ठंड ज़्यादा है, इच्छा हो तो कल आना।” आईने में देखा तो एक अनजान औरत खड़ी थी, नींद से सूजी आँखें, उलझे बाल, और चेहरा ऐसा कुछ मुझसे पूछ रहा है, “बहू आज सच में बाहर जाना ज़रूरी है क्या?”
सर्दियों में धूप भी बड़ी ईमानदार होती है, मुझे हमेशा कहती है, “आज आधा दिन ही आऊँगी, बाक़ी छुट्टी ले रही हूँ।” सर्दियों में धूप न होती तो आधे भारत की रज़ाइयाँ कभी फोल्ड ही न होतीं। सर्दियों की धूप में और एक सुन्दर बात मैंने महसूस की—अमीर-ग़रीब, मोटा-पतला, सास-बहू और दादा-दादी सब कुर्सी घसीट-घसीट कर एक ही लाइन में बैठे मिलते हैं। मानो धूप नहीं लोकतंत्र चल रहा हो।
सर्दी में ये धूप एक बहू को अपने मायके की याद दिला देती है वही गर्माहट, वही अपनापन जो परदेश की ठंड में भी दिल को सुकून दे जाए।
सर्दियों की धूप कुछ ऐसी होती है, जैसे आपकी चाय में अचानक शक्कर डालना भूल गए हों और सूरज ख़ुद आकर कहे, “चलो मैं ख़ुद ही मीठा कर देता हूँ।” फिर सर्दी में धूप मानो चाय की पत्ती नहीं ख़ुशी उबाल दी गई हो।
माना है कि मैं नई बहू हूँ। लेकिन इतनी सर्दी में हँसना ज़रूरी है क्या? लेकिन हँसना बंद कर दिया तो ठंड और जीत जाएगी, हँसना फ़्री का हीटर है, बिजली का बिल भी नहीं आएगा।
कर्मभूमि की सर्दी संघर्ष भी है और सम्मान भी। उस सर्दी में धूप मिल जाती तो लगता है परदेश अब पराया नहीं रहा। अनजान बहू को धीरे-धीरे अपनापन सिखा देती है। यह धूप ससुराल का अपनापन बन गई। धूप में बैठकर पी गई एक कप चाय और आस-पास बिखरी हँसी—पराया देश भी धीरे-धीरे अपना हो जाता है।
इसलिए मेरे लिए सर्दियों की धूप रिश्तों की मिठास, मुस्कान की वजह और नई ज़िंदगी की सबसे प्यारी सौग़ात है।
अंत में, श्रीलंकाई बहू की ओर से, धूप में बैठी, चाय हाथ में लिए, नाक हल्की-सी लाल किए स्नेहभरा नमस्कार!
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | वीरेन्द्र बहादुर सिंहनवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस…
60 साल का नौजवान
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | समीक्षा तैलंगरामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…
(ब)जट : यमला पगला दीवाना
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | अमित शर्माप्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं