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आख़िरी किसान

खेत-मेठ झूठे,राज-काज परदेस का,
गोरू-गाड़ी छूटे, ओत-प्रोत अमीरी का।


बैठो,
मेढ़ पर भूख ख़त्म हुई
लिख-पढ़ कर क्या आयाम बनाएँ।
मेरी मिट्टी दबी है, 
सुनो!


सजे-मंझे हैं, बाज़ार- व्यापार से
फूट पड़े रोशनदानों में
अबकी हरियाली में खेत-प्रहर कहाँ
मिट्टी पर धान की टोकरियाँ कहाँ!
काठ-पहिये पर ज़ोर नहीं,
सूजे हुए स्पर्श हाथों का
क्रोध-मुक्त वाली परस्परता,
किसान-चरवाहों में अब कहाँ!


बैलों के हुडदंग में
चुंबन की मार
हाट-पाल सुस्त सब
दबे पाँवों की खोज कहाँ!


अनाज की बोरियों में
लिपटी तलब का भार
लय को खोती,
साख को सँवारती कहाँ!
 

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