अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

ऐसी हो


निशाओं को मिलती है चाँदनी
सूर्य तृप्त पाकर किरणें
जैसे सुर, संगीत का हो आलिंगन
नृत्य को ख़ुद मिलते भोले
वर अर्जित वो कर मैं पूरी
तपस्या लगे अधूरी हो
अभिलाषा ये मन की मेरी, साथ संगनी ऐसी हो
स्पर्श मात्र से महका दे, मेरी जीवन कस्तूरी हो
काश कोई मेरी अपनी, कोई मेरी अपनी ऐसी हो।

 

                सीरत से वो सीता हो, 
                सूरत में भी कोई कम न वो
                सुनना चाहो वो लगती कैसी
                तो सुन वो मेरी कैसी हो
                यौवन का हो फूल खिला
                ख़ुशबू जिसमे माटी की हो
                हो अंग अंग वो अमृत प्याला
                बोल शब्द सुर कोकिल हो
                देख हँसी चपला भी फीकी
                केश घने कोई जंगल
                देख लगे कोई उन्मद हिरनी
                चाल ढाल कुछ ऐसी हो
                होठ भी जैसे मर्म पंखुड़ी
                बूंद शहद की शर्मा दे
                ख़ुश हो जब बाँहें फैलाये
                नाचे कोई मोरनी हो

 

                मात्र कल्पना है ये मेरी
                जानूँ न ये पूरी हो
                पर काश कोई मेरी अपनी 
                कोई मेरी अपनी ऐसी हो।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं