अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अपने शहर को

एक डर चारों ओर से घेरता है उसे जब
आसपास के माहौल को देखती है वह
समय रुकता नहीं
नदी में आई बाढ़ की तरह
सब कुछ ठेलता चला जाता है।
वह फिर भी
प्रकृति से कुछ रंग चुराकर
अपने शहर के अस्तित्व को नये रंग देने की
असफल कोशिश करती है
लेकिन हर बार की तरह कोई न कोई
प्रदूषित रंग उसकी कोशिश को अँगूठा दिखा कर
उसकी नसों में घोल जाता है एक अजीब सा रंग
जिसकी पहचान किसी के पास नहीं होती है
तब सहम जाती है वह अपने शहर के साथ
वह फिर भी एक कोशिश करती है अपने शहर को
भूतहा होने से बचाने के लिए
अपनी हथेली में फैली लकीरों के मध्य
खड़ा करती है एक नई सोच का महल
ताकि मौत के भयावह होते स्वरूप को
ढकेल सके अनाम घाटियों की ओर
और छू सके शहर की
उन तमाम रूहों को जो
अपने समय की पहचान बनने से पहले ही
कहीं छिप गयी थीं
जिनकी खोज में वह
तमाम कोशिशों को उनके पीछे लगा दिया था
ताकि वह अपने शहर के
सुन्दर सपनों को
नये सिरे से पल्लवित कर
उसको नया विस्तार दे सके।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं