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बड़ा आदमी. . .?

आदित्य व मुकेश दोनों बहुत ही पक्के दोस्त थे। दोनों एक मोहल्ले के रहने वाले व एक ही स्कूल व एक ही क्लास में पढ़ते थे। आदित्य पढ़ने में बहुत परिश्रमी था पर मुकेश का मन पढ़ने में उतना नहीं लगता था। मुकेश अक्सर क्लास में झगड़ा भी कर लेता था। आदित्य बहुत सीधा-साधा था। उसकी माँ कहती थी कि पढ़ने से आदमी बड़ा आदमी बन जाता है। वह मुकेश व और दोस्तों से यह बात कहता भी रहता था। पर मुकेश कहता था, मैं बिना पढ़े-लिखे भी बड़ा आदमी बनूँगा। देख लेना. . . उसकी बात पर आदित्य हँस देता था। 

समय बीतता रहा। आदित्य पढ़-लिख कर डॉक्टर बन गया और ज़िला अस्पताल में मेडिकल ऑफ़िसर हो गया। मुकेश कुछ दिन पढ़-लिख कर मोहल्ले की नेतागिरी करने लगा। एक बड़े नेता के साथ रहने लगा, उसके सभी बड़े नेताओं से जान-पहचान हो गई। अचानक जिस नेता के साथ मुकेश रहता था उनकी दुर्घटना में मृत्यु हो गई। और इसी समय चुनाव आ गया। चूँकि जिस जाति का मुकेश था उसकी आबादी भी उस शहर में अधिक थी। मुकेश को पार्टी ने उसकी सक्रियता व ईमानदारी देखकर विधायकी का टिकट दे दिया और पार्टी की लहर से वह जीत गया। नई सरकार बनी भाग्य से वह मंत्री भी बन गया। वह भी स्वास्थ्य मंत्री। पहला दौरा मुकेश का उसी ज़िले में हुआ जहाँ आदित्य की तैनाती थी। उसी अस्पताल में मुकेश निरीक्षण करने पहुँचा तो सामने डॉक्टर आदित्य खड़े थे। मुकेश को देख कर आदित्य चौंक गया। मुकेश ने आदित्य को देखा और मुस्कराया। आदित्य ने मंत्री जी को नमस्ते की व खड़ा हो गया। मुकेश ने आगे बढ़ कर हाथ मिलाया व एक दूसरे से दोनों गले मिले। मुकेश ने आदित्य से कहा.. देखा तुमने बड़ा आज कौन है! मैंने कहा था कि तुमसे ज़्यादा बड़ा हो कर एक दिन दिखाऊँगा! 

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