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दीपमाला

(निर्वाण महाकाव्य से)


दीपमाला जल रही है।
जग उजाला कर रही है॥
1
देखती हूँ आज उन्मन,
शून्य में जगमग हैं उडुगन।
आज वसुधा पर चतुर्दिक्‌
जल रहे हैं दीप अनगिन।
 
हर हृदय में अद्य अभिनव,
प्रीति पावन पल रही है॥
 
2
कार्त्तिक की अमावस्या,
हल न कर पाती समस्या।
कर रही हूँ आज प्रिय बिन,
प्रेम की अहरह तपस्या।
 
उर - भुवन में पर विरह की,
घोर आंधी चल रही है॥
 
3
रात्रि की साड़ी है काली,
मोहनी जिसने है डाली।
ज्योति की आराधना कर,
जग मनाता है दिवाली।
 
पर वियोगाहत दृगों को,
ज्योतिमाला खल रही है॥
 
4
हर्ष का है पर्व पावन,
जगमगाते ज्योति - कानन।
पर वियोगिनि का पिया बिन,
शून्य है जग, म्लान आनन।
 
पीर की स्रोतस्विनी दृग
मध्य आज मचल रही है॥
 
5
जल रहे हैन दीप झिलमिल,
वर्त्तिका जलती है तिल-तिल।
गा रहीं सखियाँ सुहानी
गीत ऋतु के आज हिल-मिल।
 
है दिवाली, पर हृदय में
होलिका सी जल रही है॥
 
6
ज्योति को संग ले गए हैं,
दे तिमिर मुझको गए हैं।
मुक्त कर मुझको अचाहे,
मुक्ति के पीछे गए हैं।
 
कंत बिन गोपा स्वयम्‌ को,
स्वयं ही नित छल रही है॥

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