अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

ढीली पड़ती मुट्ठियाँ

मेरी मुट्ठी में डाल थी माँ ने
कलेवा के संग करुणा के कुछ दाने
और संभालकर रखने की ताक़ीद की थी।

 

बाबूजी ने रख दिये थे उसमें
थोड़े रुपये और थोड़ी- सी समझ
जो वक़्त-बेवक़्त अपने काम आये।

 

दीदी को ख़ुशहाल घर ब्याहने का सपना,
छोटु को आदमी बनाने का ज़िम्मा
मेरी तंग मुट्ठी में अपनी-अपनी जगह काबिज़ थे।

 

पत्नी के उदास चेहरे से झाँकती उम्मीदें,
बच्चों की तुतलाती वर्तनी में फँसी इच्छाएँ
कहीं- न- कहीं मुट्ठी में पुलक रहे थे।

 

मित्रों के चंद सुझाव,
पड़ोसन की मीठी गालियाँ,
अपने-पराये के दर्द का एक क़तरा भी
मुट्ठी में दुबके पड़े थे किसी कोने
और सुगबुगा रहे थे।

 

पर हर दिन ढीली पड़ रही थी मेरी मुट्ठी।

 

उँगलियों के खुलते कसाव के बीच
फिसल रही थी जतन से रखी एक-एक चीज़।

 

कोई तोड़ रहा था चुपके-चुपके
मुट्ठी के अहाते में बने
मेरे सपनों के घरौंदे।

 

मैं कालचक्र में फँसा, घूमता हुआ
तोल रहा था फिर भी अपनी चीज़ें
और सहेजने का यत्न कर रहा था

 

मैं कोई कविता नहीं कर रहा भाई,
मैं तो लड़ रहा हूँ आज भी
इस सदी के हत्यारे विचार से
जो मेरी मुट्ठी में घुसपैठ कर रहे हैं
और बटोर रहा हूँ
समय की उल्टी बयार में छितराये--
माँ की करुणा
पिता का भरोसा और
रिश्तों-नातों की गर्माहटें।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

पुस्तक समीक्षा

साहित्यिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं