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डॉ. भारतेन्दु मिश्र से उनके अवधी लेखन पर बातचीत


रश्मिशील :

आप अवधी के रचनाकार है। आजकल नेट का ज़माना है, तो क्या अवधी साहित्य भी नेट पर उपलब्ध है? 
भारतेन्दु मिश्र : 

रश्मिशील जी, आपने सच कहा कि आजकल नेट का जमाना है ऐसे तकनीकी समय में अवधी जैसी लोक भाषा को भी नेट पर होना चाहिए। तो इस बात को मैं इस रूप में देखता हूँ कि अंग्रेज़ी से इतर अनेक भाषाएँ नेट पर आ गयी हैं, कुछ भाषाओं के पास अधिक समर्थ कवि लेखक पत्रकार हैं जो साधन संपन्न होने के कारण तकनीकी संपन्न भी हैं और नेट पर अच्छा काम कर रहे हैं। अवधी का लोक जीवन और अवधी का रचनाकार उतना समर्थ नहीं हैं। यह अवध के हुक़्मरानों द्वारा सदियों से शोषित आम जन की भाषा है। यह किसानों मज़दूरों की अभिव्यक्ति का साधन है। यहाँ वैसा साधन संपन्न भद्र लोक नहीं हैं। अवधी के कवि और लेखक भी वैसे संपन्न वर्ग से नहीं आते है। ..तो अवधी बहुत कम ही नेट पर दिखाई देती है। लेकिन 2009 से भाई डॉ. अमरेन्द्र त्रिपाठी का ब्लॉग –अवधी कै अरघान –और, अवधी, और बतकही ब्लॉग को देख रहा हूँ। कुछ और भी मित्र काम कर रहे हैं। ..मैंने भी 2009 से ही -चिरैया अवधी प्रसंग नेट पत्रिका-ब्लॉग शुरू किया था। कुछ और भी मित्र हैं- फ़ेसबुक पर भी कई मित्र हैं जो अवधी में कुछ थोड़ी बहुत सामग्री डालते रहते हैं। लेकिन यह अभी न के बराबर ही है। कविता कोश वालों ने अमीर ख़ुसरो से लेकर - पढीस, बंशीधर शुक्ल और हमारे युवा कवि अशोक अज्ञानी तक की कुछ कविताओं की बानगी नेट पर डाली है। 
रश्मिशील :

इस प्रकार के साहित्य की आपकी दृष्टि में क्या उपयोगिता हो सकती है? क्योंकि नेट की पहुँच में अवध के गाँव वहाँ के किसान आदि तो नहीं आते?
भारतेन्दु मिश्र :

देखिए, मेरी दृष्टि में तो नेट पर उपलब्ध साहित्य की बहुत उपयोगिता है। आज दुनिया भर में अवधी भाषी परिवारों के लोग बिखरे हुए हैं उन्हें इस माध्यम से अवधी से जुड़ने का अवसर मिला है। अवधी के सर्वत्र सुलभ साहित्य के नाम पर रामचरित मानस ऐसी पुस्तक है जो सब जगह मिल जाती है। आरती चालीसा आदि जो धार्मिक साहित्य है वह भी अवधी को जीवित रखने में सहायक सिद्ध हुआ है। दूसरी बात किसानों और मज़दूरों की है तो यह सही है कि नेट के साहित्य की पहुँच उन तक अभी नहीं है। किंतु साक्षरता और तकनीकी के विकास के साथ ही नेट के साहित्य की उपयोगिता बढ़ जाएगी। समय लगेगा लेकिन वास्तविक विकास तो उस दिन शुरू होगा जब हम किसान मज़दूर की भाषा में उसके सुख-दुख को पढ़ सकेंगे और उसकी समस्याओं को उसकी ज़रूरतों के अनुसार निपटा सकेंगे। मेरी दोनों ही अवधी उपन्यासों में मेरे पात्र इसी तरह काम करते हैं। 
रश्मिशील :

आपके दो अवधी उपन्यास – नई रोसनी और चन्दावती प्रकाशित हुए हैं, उनकी चर्चा भी होती है। लेकिन अवधी में गद्य लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
भारतेन्दु मिश्र :

रश्मिशील जी, इन दोनों उपन्यासों से भी पहले मेरी एक अवधी कविता की पुस्तक सन् 2000 में – कस परजवटि बिसारी- शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। संयोगवश इसी पुस्तक में मेरे दस ललित निबन्ध भी संकलित हैं। इस पुस्तक की आधिकांश रचनाएँ ज़ाहिर हैं कि नवें दशक या उससे पहले की हैं। मेरी अवधी कविताएँ प्रकाशित करने का काम डॉ. सुशील सिद्धार्थ ने सबसे पहले किया वे उन दिनों –बिरवा- शीर्षक पत्रिका निकालते थे। उनका अपना प्रेस भी था। पहली बार बिरवा के अंक 7 में मेरे कुछ अवधी गीत प्रकाशित हुए। तो अनेक मित्रों के पत्र मिले यह संभवत: 1989 या 1990 की बात होगी। तब फोन कम होते थे। इसी बीच मैं आदरणीय त्रिलोचन जी के संपर्क में आया। वे यही यमुना विहार में रहते थे। तब यहीं आद्याप्रसाद उन्मत्त जी भी रहते थे। बहरहाल त्रिलोचन जी ने ही मुझे अवधी में गद्य लिखने की प्रेरणा दी। मैंने इसी लिए पहली पुस्तक में ही दस निबन्ध संकलित किए। ये पहली पुस्तक आदरणीय त्रिलोचन जी को ही समर्पित भी थी। तो जब उन्हें यह पुस्तक भेंट की तब वे हरिद्वार में रहते थे। पुस्तक देने मैं स्वयं नहीं जा पाया था बल्कि डाक से भेजी थी। तो उनके कई फोन भी आए और पत्र भी मिले जो कहीं सुरक्षित रखे हैं।
रश्मिशील :

हिन्दी यानी मुख्यधारा की उपन्यास की तुलना में अवधी उपन्यास में क्या अंतर है? आपने हिन्दी में भी लिखा है –कुलांगना- आपका उपन्यास सन-2002 में प्रकाशित हुआ था और बाद में अवधी के दोनों उपन्यास क्रमश: 2009 और 2011 में प्रकाशित हुए तो आपको अवधी का चुनाव क्यों करना पड़ा?
भारतेन्दु मिश्र :

रश्मिशील जी, हिन्दी विश्वभाषा है उसके पास अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से संपन्न लेखक हैं। विश्वस्तरीय मंच हैं- मुद्दे और समस्याएँ भी विश्वस्तरीय हैं, लेकिन अवधी एक सीमित क्षेत्र की भाषा है किंतु उसे भी समझने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं। और ये भी सच है कि अवधी भाषी समाज के मुद्दे और प्राथमिकताएँ अलग हैं, उदाहरणार्थ अवध के किसानों की समस्या, ग्राम्य युवकों और युवतियों की समस्याएँ इस क्षेत्र के विकास आदि की दशा और दिशा। अवध की महिलाएँ और उनकी धर्मभीरु पुरुषवादी चेतना आदि विषय हो सकते हैं- तो मुझे लगता है कि अवध के समाज को प्रगतिशील सोच से जोड़ने का इससे बेहतर और क्या उपाय हो सकता है? बस मैं यह जानता हूँ कि मेरे दोनों उपन्यासों को पाठकों का बहुत स्नेह मिला।.. रचनाकार के नाते मुझे भी अपनी मेहनत को लेकर संतोष है।.. बाकी तो समय बताएगा कुछ और लोग आएँगे, अवधी गद्य में आपकी कहानियाँ.. सुरेशप्रकाश शुक्ल का उपन्यास, ज्ञानवती की कहानियाँ, अखलाक अहमद की कहानियाँ, रामबहादुर मिश्र का निबन्ध संग्रह आदि ऐसी सामग्री अब उपलब्ध है या होती जा रही है जिसे लेकर हम कह सकते हैं कि ये अवधी में गद्य का युग शुरू हो चुका है। यद्यपि लक्ष्मणप्रसाद मित्र के अवधी नाटक और रमईकाका के रेडियो रूपक अवधी गद्य के रूप में पहले से ही उपल्ब्ध हैं लेकिन वह साहित्य हास्य-व्यंग्य की शैली में लिखा गया है। आधुनिक अवधी गद्य की वैचारिक चेतना आधुनिक समाज के अनुरूप होनी चाहिए। ..तो अवधी लिखना मेरे लिए अपनी माटी को अपने सिर पर उलीचने जैसा है जो यहाँ दिल्ली में नहीं मिलती।
रश्मिशील :

स्त्री-विमर्श की कसौटी पर आपके नारी पात्र कितने खरे उतरते हैं? क्या चन्दावती को प्रगतिशील नारी पात्र की कोटि में रखा जा सकता है?
भारतेन्दु मिश्र :

देखिए, स्त्री-विमर्श की कसौटी के बारे में मुझे अधिक ज्ञान नहीं है। वो सब तो आप लोग ही बता सकते हैं। लेकिन जहाँ तक चन्दावती की बात है तो वह एक जुझारू और प्रगतिशील नारी के रूप में उपन्यास में उपस्थित है। वो मर जाने के बाद भी गाँव समाज की एक प्रगतिशील नारी चेतना के रूप में चित्रित की गई है। नई रोसनी में सुरसतिया, फूलमती और चन्दावती में गेन्दा, रधिया, मीरा, फूलमती जैसे पात्र जो देवीदल बनाते दिखाई देते हैं वो सब मेरे जीवित सपनों के संघर्षशील पात्र हैं।.. लेकिन ये काल्पनिक सपनों के पात्र नहीं हैं अब ये अवध के गाँवों में कहीं न कहीं प्रकट भी होने लगे हैं। नारी की प्रगतिशीलता से ही किसी समाज की प्रगतिशीलता का वास्तविक आकलन होता है। स्त्री की प्रगतिशीलता की बात तो प्रगतिशील मंचों से कम ही उठायी जा रही है।
रश्मिशील :

इधर लेखन में खुलेपन की वकालत की जा रही है। यह खुलापन अपनी संस्कृति पर प्रहार नहीं है क्या?.. यदि प्रहार नहीं है तो क्या ये समय की माँग है?
भारतेन्दु मिश्र :

खुलापन आप किसे कहती हैं, अशालीन या अश्लील भाषा यदि प्रसंगवश कहीं आती है तो उसे यथार्थवादी दृष्टि ही समझना चाहिए। ...आपको मालूम है कि तकनीकी के इस विकसित युग में तमाम युवा अपने फोन में कितनी अश्लील सामग्री लिए फिर रहे हैं? तो ये तकनीकी के साथ आने वाले अपसंस्कृति नहीं रुक पा रही है। हमें चौकन्ना होकर अपने बच्चों को पोर्नोग्राफी के बाज़ार से बचाना है। कहानी उपन्यास में यदि कहीं गालियों का प्रयोग कथानक की आवश्यकता के हिसाब से हो गया है तो उससे संस्कृति को कोई ख़तरा मुझे नहीं लगता। बल्कि सांस्कृतिक रूढ़ियों को तोड़कर ही नई रोसनी फैलाई जा सकती है।.. तो निश्चित रूप से जैसा आपने कहा ये समय की माँग है।
रश्मिशील :

अभी पिछले दिनों आपकी दो किताबें आयी हैं –एक कहानी संग्रह –खिड़की वाली सीट और दूसरी छन्दोबद्ध कविता की आलोचना की- समकालीन छन्द प्रसंग, तो क्या आप दोनों हाथ से लिखते हैं?
भारतेन्दु मिश्र :

जी, हाँ मैं पिछले सात वर्षों से दोनों हाथों से ही लिख रहा हूँ, यानी कम्प्यूटर पर टाइप कर रहा हूँ ..तो आप कह सकती हैं कि मैं सच में दोनों हाथों से लिख रहा हूँ। लेकिन ये बात नहीं कि सब कुछ फटाफट लिखता जा रहा हूँ। ये दोनों किताबें पिछले दो दशकों से विलम्बित थीं जो अब 2013 में प्रकाशित हो पायीं।
रश्मिशील :

समकालीन कविता में छन्द या छन्दोबद्ध कविता की क्या प्रासंगिकता है?
भारतेन्दु मिश्र :   

जी, ये अंतिम प्रश्न है न?
रश्मिशील :

जी हाँ।
भारतेन्दु मिश्र :

हाँ तो छ्न्दोबद्ध कविता की प्रासंगिकता की बात आप कर रही हैं। देखिए मैं तो लोक और अंचल से जुड़कर देखता और सोचता हूँ तो लगता है कि छन्दोबद्ध कविता ही दूर-दूर तक दिखाई देती है। जो छ्न्दहीन कविता लिखते हैं और अकादमियों में साल छह महीने में कभी एक बार अपनी कविता सुनाने के लिए बुलाए जाते हैं। उनका जनता से सीधा जुड़ाव बन नहीं पाता। उनके यहाँ किसान और मज़दूर की भी बात अब नहीं होती। तो लोग क्यों पढ़ेंगे छन्दहीन नीरस कविताएँ। भारतीय कविता की चेतना को यदि आगे ले जाना है तो छन्दोबद्ध कविता पर हमें बार-बार बात करनी होगी। कविता पाठ्य और श्रव्य दोनों रूपों में परखी जाती है। मैं कवि-सम्मेलनों के मसखरों और भांडों का हिमायती नहीं हूँ।

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