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दुर्वासा आपमें भी हैं!

(दैनिक आज, वाराणसी, 21 अगस्त 1960)
 

एक बार स्वर्ग में विराट् यज्ञ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सभी ऋषि-मुनि और देवी-देवता उपस्थित हुए। निश्चित समय पर वेदपाठ आरम्भ हुआ, सारा वातावरण मन्त्रोच्चार की मधुर ध्वनि से गूँज उठा। महर्षि दुर्वासा भी अन्य लोगों के साथ पूर्णतः ध्यान-निमग्न होकर मन्त्र-पाठ कर रहे थे, परन्तु एक स्थान पर, न जाने कैसे, उनसे मन्त्रोच्चार में थोड़ी भूल हो गई। उनकी इस भूल को अन्य लोगों ने तो लक्ष्य नहीं किया, परन्तु समस्त विद्याओं की स्वामिनी सरस्वती की आँखों से वे न बच सके। सरस्वती किंचित मुस्करा पड़ीं। उनका मुस्कराना था कि दुर्वासा की भूल सभी उपस्थित लोगों पर प्रकट हो गई। भला दुर्वासा यह बात कैसे सहते! वे आगबबूला हो उठे। उन्होंने क्रोधकम्पित स्वर में कहा, "अशिष्टे! अपनी विद्या का तुझे इतना गर्व है? मेरा उपहास करती है? जा, तू अभी स्वर्गलोक से गिर कर मर्त्यलोक चली जा।" और उन्होंने कमण्डल से जल लेकर आचमन किया। स्वभावतः ही, इस स्थिति के कारण यज्ञमण्डप में हाहाकार-सा मच गया। एक-से-एक तेजस्वी और तपोनिष्ठ ऋषि-महर्षि वहाँ उपस्थित थे। वे बात-बात में क्रुद्ध हो उठनेवाले दुर्वासा को उनकी ही भाषा में समझाने को व्यग्र हो उठे, परन्तु शीलस्वामिनी सरस्वती ने उन्हें रोक दिया, "यदि आपको इन्हें विनय सिखानी ही हो, तो किसी दूसरे अवसर की प्रतीक्षा करें। अभी तो मुझे मर्त्यलोक जाना ही पड़ेगा।" और ’कादम्बरी’ में वर्णित कथा के अनुसार सरस्वती ने मर्त्यलोक में आकर वाणभट्ट के कुल को अपने निवास के लिए चुना। 

महाकवि वाणभट्ट ने अपने कुल की विद्या-सम्पन्नता सिद्ध करने के लिए यह जो आख्यान प्रस्तुत किया है, उसके केवल एक ही पक्ष पर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है – वह यह कि क्रोधी व्यक्ति उचित-अनुचित का ध्यान खो देता है और अपनी त्रुटि सुधारने के बजाय दूसरों की अल्पत्रुटि को ही प्रमुखता प्रदान करता है। फलतः उसकी आत्म-शुद्धि की सम्भावना जाती रहती है, वह आजीवन त्रुटियों पर त्रुटियाँ करता जाता है। एक बात और, शील उससे विदा ले लेता है और वह सबकी आँखों का काँटा बन जाता है। 

क्रोधी व्यक्ति की अवस्था अन्ततः कितनी दयनीय हो जाती है, इसे स्पष्ट करनेवाला एक अत्यन्त प्राचीन आख्यान भी क्रोध के देवता दुर्वासा से ही सम्बन्धित है। विद्याधिष्ठात्री और प्रिय-वियोग में विदग्धा शकुन्तला को शाप देकर अपनी विवेकहीनता और हृदयशून्यता सिद्ध करनेवाले दुर्वासा की कातरता चित्रित करनेवाली यह कहानी इस प्रकार है।

एक बार विष्णु के भक्त महाराज अम्बरीष ने एक यज्ञ का आयोजन किया। इस अवसर पर उन्होंने महर्षि दुर्वासा से भी अनुरोध किया कि वे अपनी चरणधूलि से राजप्रासाद को पवित्र करें। उनका अनुरोध दुर्वासा ने स्वीकार तो कर लिया, पर यज्ञ के समाप्त होने तक भी वे वहाँ न पहुँचे। अन्ततः भोजन का समय भी हो गया, पर दुर्वासा अनुपस्थित! कुछ देर अम्बरीष ने दुर्वासा की प्रतीक्षा की और फिर अन्य अभ्यागतों को भोजन करा दिया। उन्होंने स्वयं भोजन नहीं किया, दुर्वासा की प्रतीक्षा करते रहे। परन्तु जब सन्ध्या हो आई, तो यह मान कर कि महर्षि को आने का अवकाश न मिला होगा, उन्होंने भोजन कर लिया। परन्तु वे भोजनोपरान्त हाथ-मुँह धो ही रहे थे कि दुर्वासा आ पहुँचे। आते ही चिल्लाए, "क्यों रे, अभिमानी! क्या इसी अपमान के लिए तूने मुझे आमन्त्रित किया था?" अम्बरीष ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की, "मुनि श्रेष्ठ! आपने प्रातःकाल आने को कहा था, पर सन्ध्या तक नहीं आए तो मैंने समझा कि आपको मुझे कृतार्थ करने का अवकाश न मिल सका। मेरे मन में तो आपके अपमान की छाया भी नहीं आ सकती।" परन्तु अम्बरीष की विनयशीलता का दुर्वासा पर कोई असर नहीं हुआ। वे उसी तरह क्रोधाभिभूत स्वर में बोले, "तूने मेरी उपेक्षा की है, मेरा अपमान किया है। मैं तुझे क्षमा नहीं कर सकता। और, उन्होंने अपनी जटा से एक केश उखाड़ कर पृथ्वी पर पटक दिया। जटा के पृथ्वी छूते ही कृत्या नाम की राक्षसी उत्पन्न हुई और अम्बरीष की ओर लपकी। पर अम्बरीष इससे भयभीत न हुए। उन्होंने अपने इष्टदेव का स्मरण किया। बस, पल-भर में विष्णु का सुदर्शन चक्र आ उपस्थित हुआ और देखते-ही-देखते कृत्या का सिर धड़ से अलग हो गया। कृत्या का संहार करने के बाद चक्र दुर्वासा की ओर बढ़ा। कृत्या के संहार का दृश्य देख दुर्वासा पहले ही घबरा गए थे, अब जो चक्र को अपनी ओर बढ़ते देखा तो लोक-लाज छोड़ बेतहाशा भागने लगे। वे तीनों लोकों में भागते फिरे और चक्र उनका पीछा करता रहा। उन्होंने हर किसी से शरण माँगी, पर किसी ने भी उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया। आख़िर वे विष्णु के चरणों में जा गिरे, "भगवन्! मुझे इस बार क्षमा कर दीजिए। अपने चक्र को वापस बुला लीजिए।" विष्णु मुस्कराए, "वह मेरे वश की बात नहीं है, ऋषिवर। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में केवल एक ही व्यक्ति आपकी रक्षा कर सकता है इस समय। आप अम्बरीष की शरण में जाइए।" अन्त में दुर्वासा ने अम्बरीष के पास जाकर क्षमा माँगी और सुदर्शन चक्र से मुक्ति पाई। 

कहने की आवश्यकता नहीं कि इस आख्यान में सुदर्शन चक्र वयतापों का प्रतीक है। क्रोधी व्यक्ति निरन्तर वयतापों से प्रताड़ित होता रहता है। केवल पश्चाताप ही उसे इन तापों से मुक्ति दिला सकता है। क्रोध को कहीं ’अविवेक का वाहन’, कहीं ’अधर्म का ज्वालामुखी’, और कहीं ’शैतान का बाप’ कहा जाता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में क्रोध की बड़ी भर्त्सना की गई है। क्रोध के जन्म के सम्बन्ध में यह प्राचीन आख्यान देखिए।

ब्रह्मा जब सृष्टि-रचना कर चुके, तब अधर्म उनके सामने सिर झुका कर खड़ा हो गया। ब्रह्मा ने उसकी ओर देखा, तो उसने हाथ जोड़ कर कहा, "प्रभो! मेरे लिए भी तो कुछ व्यवस्था कर दीजिए।" ब्रह्मा ने उसे दुत्कार दिया, "नहीं, मेरी सृष्टि में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है। तुम्हारी सूरत से भी मुझे घृणा है।"

निराश होकर अधर्म विष्णु के पास गया, बोला, "स्वामिन, समस्त सृष्टि का पालन तो आप करेंगे, पर मेरा पालन कौन करेगा?" विष्णु ने पूछा, "तुम्हारे अस्तित्व की उपयोगिता ही क्या है?"

अधर्म ने निवेदन किया, "प्रभो! मेरी उपयोगिता है। आप जानते ही हैं कि ब्रह्मा ने मनुष्य को अपनी बुद्धि का स्वामी बना दिया है। अतः उसकी बुद्धि को सही दिशा-निर्देश देनेवाली कोई वस्तु भी तो होनी चाहिए धरा पर? असत् न हो, तो सत् का क्या मूल्य? निर्धनता न हो, तो वैभव का क्या मूल्य? दुःख न हो तो सुख का क्या मूल्य? इसी तरह, अधर्म के बिना धर्म कैसे पनपेगा-फलेगा सृष्टि में?"

विष्णु अधर्म के वाक्-वैदग्ध्य पर मन-ही-मन मुस्कराए, बोले, "तो तुम जाओगे ही वहाँ! ठीक है, मैं तुम्हें भेज रहा हूँ, परन्तु अधर्म के रूप में नहीं, क्रोध के रूप में।"

और, इस प्रकार, क्रोध के रूप में अधर्म का ब्रह्मा की सृष्टि में निवास होने लगा। 
जैन धर्म में क्रोध को ’काल सर्प’ माना गया है और कहा गया है कि जिसे यह सर्प डँस ले, उसकी मृत्यु तक शान्ति से नहीं होती, तड़प-तड़प कर होती है। क्रोध के कुपरिणामों को दर्शानेवाली अनेक कथाएँ जैन धर्म-ग्रन्थों मे उपलब्ध हैं। उन्हीं में से एक यह भी है।

चण्डकौशिक पूर्वजन्म में तपस्वी थे। एक बार उनके पाँव से दब कर एक मेंढ़क की मृत्यु हो गई। इस पर उनके साथी साधु ने उनसे पश्चाताप करने को कहा, पर अपनी तपस्या के मद में डूबे हुए चण्डकौशिक ने इसे अपना अपमान माना। वे आग-बबूला होकर साधु को मारने दौड़े। साधु आत्मरक्षा के लिए भागने लगा और वे साधु का पीछा करने लगे। वे उस समय इतने क्रोधाभिभूत थे कि उन्हें अपने आसपास की सुध भी नहीं रह गई। फलतः इस भागदौड़ में वे एक स्तम्भ से टकरा गए और उनकी मृत्यु हो गई। तत्पश्चात वे उसी आश्रम में पैदा हुए और पाँच सौ तपस्वियों के प्रमुख बनाए गए। पर उनका स्वभाव तब भी वैसा ही क्रोधी था। एक दिन उनके आश्रम में कुछ लड़के फल तोड़ने चले गए। उनसे यह नहीं सहा गया। वे कुल्हाड़ी लेकर उन्हें मारने दौड़े। इस बार भी लड़कों के साथ उनकी भाग-दौड़ मची और वे एक कुँए में गिर कर मर गए। उसके बाद वे फिर उसी आश्रम में एक विषैले सर्प के रूप में पैदा हुए। क्रोध अब भी उन्हें उतना ही था। उनके निवास-स्थान के आसपास जो कोई भी आता, उसे वे डँसे बिना न छोड़ते।

एक बार भगवान् महावीर वहाँ पधारे और चण्डकौशिक के निवास के पास कामोत्सर्ग-ध्यान में अचल खड़े हो गए। चण्डकौशिक को बड़ा क्रोध आया। वे महावीर को दग्ध करने के लिए फुँफकारें छोड़ने लगे, पर महावीर के तेज के समक्ष उनकी विष-दृष्टि असफल सिद्ध हुई। अतः उनका क्रोध और भी भड़का, वे महावीर को बार-बार डँसने लगे। पर क्षमामूर्ति महावीर शान्त-अचल खड़े रहे। तभी चण्डकौशिक ने लक्ष्य किया कि जहाँ-जहाँ महावीर को डँसा गया था, वहाँ-वहाँ से रक्त के स्थान पर दूध बह रहा था। हतप्रभ चण्डकौशिक की समझ में आ गया कि जिस व्यक्ति को उन्होंने डँसा था, वह असाधारण था। उनका क्रोध क्षण-भर में शान्त हो गया और वे महावीर के चरणों में लोटने लगे। महावीर मुस्कराए, बोले, "चण्डकौशिक! अब भी तुम क्रोध को नहीं समझ पाए? तनिक विचार करो कि तुम पहले क्या थे और अब क्या हो। केवल क्रोध ने तुम्हारी यह दशा की है। गाँठ बाँध लो, क्रोध प्राणिमात्र का घोर शत्रु है। इसके संसर्ग-मात्र से जन्म-जन्मान्तर के सञ्चित पुण्य नष्ट हो जाते हैं।" 

चण्डकौशिक के मर्म में भगवान् की वाणी बिंध गई। उन्होंने उसी क्षण से क्रोध को तिलान्जलि दे दी। फलतः उन्होंने अगले जन्म में आठवें देवलोक (सहस्रसार) में देव रूप में जन्म ग्रहण किया।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि हर व्यक्ति को क्रोध से मुक्ति पाने का प्रयत्न करना चाहिए, पर क्रोध के पूर्णतः मूलोच्छेद की बात सुन मैं चिन्ता में पड़ जाता हूँ कि क्या मनुष्य वस्तुतः क्रोधरहित हो सकता है? क्या कोई भी व्यक्ति ’दुर्वासापन’ से पूरी तरह मुक्त है? शायद नहीं। दुर्वासापन हर व्यक्ति के अन्दर है, मेरे अन्दर भी, आपके अन्दर भी। अन्तर केवल मात्रा का हो सकता है। "क्रोध को अपने अन्दर पूर्णतः निर्मूल कर देना मनुष्य के वश की बात नहीं है, केवल उसकी मात्रा कम और क्षेत्र सीमित किया जा सकता है। मनुष्य इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता।" – क्रोध से छत्तीस का सम्बन्ध रखनेवाले तत्वज्ञ दार्शनिक सुकरात के ये उद्गार निस्सन्देह व्यावहारिकता की कसौटी पर कसे हुए हैं। 

कुछ विश्लेषकों के अनुसार क्रोध का जन्म सात कारणों से हो सकता है – (1) अन्याय-प्रतिकार की भावना, (2) स्वाभिमान की भावना, (3) परोपकार की भावना, (4) अहंकार की भावना, (5) मानसिक अस्थिरता, (6) स्नायविक दुर्बलता, और (7) बाधा-निवारण का आवेश। हम इनमें से प्रथम तीन को ’उत्कृष्ट’ क्रोध कह सकते हैं और परवर्ती तीन को ’निकृष्ट’ क्रोध। अन्तिम का भाव अस्थाई होता है, अतः उसे ’सामयिक’ अथवा ’माध्यमिक’ कहा जा सकता है। 

प्रतिकार-प्रेरित क्रोध जीवनी-शक्ति और सदाशयता का परिचायक है। इस क्रोध में मनुष्य की दुर्बलता नहीं, साहस प्रकट होता है। इसका सर्वोपरि लक्ष्य किसी का अहित करना नहीं, दुर्बलों का हित करना होता है। इसलिए इस क्रोध में घृणा की तुलना में प्रेम-भाव का आधिक्य होता है। स्वाभिमान-प्रेरित क्रोध भी पुरुषार्थ का परिचायक होता है। साधारणतया यह क्रोध दुर्बल व्यक्तियों में नहीं पाया जाता। इस क्रोध में भी घृणा का स्थान अत्यन्त नगण्य होता है और इसका परम लक्ष्य अपराधी की भ्रान्ति का निवारण करना होता है। परोपकार-भाव से प्रेरित क्रोध में स्वार्थ का स्थान नहीं होता; यदि होता भी है तो मात्र इतना कि प्रियपात्र को, अथवा जिससे रागात्मक सम्बन्ध है उसकी भलाई देख कर सन्तोष मिले। छात्र पर शिक्षक का, सन्तान पर माता-पिता का, और मित्र की ग़लती पर मित्र का क्रोध इसी कोटि में आता है।

अब तीनों निकृष्ट क्रोधों का साक्षात्कार कर लें। इनमें पहला स्थान है अहंकार-प्रेरित क्रोध का। इस क्रोध का किंचित्-मात्र औचित्य नहीं है। यह आरम्भ से अन्त तक स्वार्थ से घिरा होता है। मिथ्याभिमान अपना सहारा लेनेवाले को ही नष्ट कर देता है, दूसरों का कुछ विशेष अहित नहीं करता। अहंकारी व्यक्ति को अपना सुधार करने का अवसर कभी नहीं मिलता। अहंकार का आधार शक्ति-सम्पन्नता की भ्रामक भावना है। दूसरा निकृष्ट क्रोध मानसिक अस्थिरता के कारण प्रकट होता है। जब मनुष्य किसी प्रसंगवश इतना परेशान हो उठता है कि अपना सन्तुलन नहीं रख पाता, तब वह अकारण ही दूसरों पर क्रुद्ध हो उठता है। इस क्रोध में कुछ विशेष मन्तव्य नहीं छुपा रहता, फिर भी इसका परिणाम बड़ा घातक होता है। यह क्रोध मनुष्य की चारित्रिक दुर्बलता का द्योतक होता है। कभी-कभी स्नायविक दौर्बल्य के कारण क्रोध व्यक्ति के स्वभाव का अंग बन जाता है। यह क्रोध बहुधा अकारण ही हो जाया करता है। 

क्रोध का सातवाँ कारण है बाधा-निवारण का आवेश। आप वाहन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, पर वाहन नहीं आ रहा। ऐसे में समय पर गंतव्य न पहुँच पाने का विचार आपको क्रोधित कर सकता है।

तो, दुवार्सापन के सातों रंग-रूप देखने के बाद अब अपनी ओर देखिए और पहचानिए कि दुर्वासा का कौन-सा रूप आपमें छुपा है!

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