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गुड़िया हूँ मैं

कहते हैं 
गुड़िया रोती नहीं 
सुबुकती नहीं 
गुड़िया सिर्फ़ मुस्काती है
पलकें झपकाती है

 

पर सिर्फ़ गुड़िया जानती है 
कैसे अम्मा के तानों को ख़ामोशी से सहती है
बापू के भरोसे को अपना गहना समझती है
कैसे छत के कोने में चुपचाप सुबुकती है
और आँसू पोंछकर फिर मुस्काने लगती है

 

कैसे रात रात भर जगती है
यही सोचती रहती है
किसको कैसे समझाए 
कैसे अपनी मूक व्यथा बतलाये

 

क्यों भइया की सारी बातें 
अपने आप सही हो जाती हैं 
क्यों उसकी छोटी सी गलती भी 
सबको असहनीय हो जाती है

 

जब वो हँसती है
सब कहते हैं 
लड़की होकर इतना क्यों हँसती है

 

जब-जब गुमसुम चुपचाप सी रहती है
सब कहते हैं 
इतना नखरा क्यों करती है

 

जब अपनी इच्छा से कुछ करती है
सब कहते हैं
गुड़िया किसी की नहीं सुनती
बस मनमानी करती है
गुड़िया बदल गई है
गुड़िया बिगड़ गई है

 

बापू तुम ही तो कहते थे 
हम अपनी प्यारी गुड़िया को
दुनिया की सारी खुशियाँ दे देंगे 
एक चाँद छोड़कर जो माँगेगी
सब लाकर तुझको देंगे

 

बापू कभी तो अपनी गुड़िया से आकर पूछो
किस हाल में अब वो रहती है
कैसे बाहर दुनिया उसे काटती है
कैसे घर में सबको चुभती है
किससे बोले कहाँ जाए
क्या कहे किसको सुनाए
कभी क्या ऐसा हो पायेगा 
कोई पढ़कर उसकी आँखों को 
उसकी बात उसी को बतलायेगा

 

आख़िर
उसकी जगती रातों को कब
कोई सपना मिल पायेगा
उसके अपने सपनों को 
कौन अपना बतायेगा

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