अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

कठोर यथार्थ 

क्या तुम यथार्थ से कटे हुए 
मात्र कल्पना-लोक में खोए 
दिवा-स्वप्नों का रचना-संसार 
रचते रहोगे अन्तिम आलोक मान इसे,
 
जीवन के कठोर यथार्थ से 
अनभिज्ञ नहीं हो तुम,
कठोर यथार्थ देख कर भी 
उसे अनदेखा करते रहे हो निरंतर। 

क्यों?
क्योंकि वह वीभत्स है!
उसके चिन्तन-मात्र से हिल जाता है 
तुम्हारा समूचा व्यक्तित्व!
काँप उठता है 
तुम्हारा समूचा कल्पना-लोक।

तुम अपने सौन्दर्य-लोक को 
पाते हो मिथ्या,
अरक्षित, अपूर्ण-सा!
तुम्हारी अन्तरात्मा छटपटाती है 
नकारने को मिथ्या स्वप्नलोक,
जिसे कभी रचा था तुमने सप्रयास
और जो खंड-खंड हो चुका है कभी से 
कठोर यथार्थ की चट्टान से टकरा कर। 
   
किन्तु तुम्हारा मिथ्या दम्भ 
इस कठोर सत्य को स्वीकारने 
तुम्हारे आड़े आता रहा और 
तुम निरुपाय से, बने खड़े रहे देखते, 
यह तुम्हारे पौरुष की सीमा थी--
 
तुम उस भोले किसान के सामने 
कितने बौने हो, जिसका समूचा गात 
शिखर दुपहरी में, स्वेदकणों से सिक्त है।  
और जो फिर भी, बहारों के गीत गाता 
अपने कृषि-कर्म में मुग्धता से  
कृषक कहलाता है। 
    
उस मजदूर के सामने 
जिसकी श्रमिक छवि, 
गगनचुम्बी भव्य इमारतों में 
प्रतिकण उद्घाटित है; 
कितने छोटे हो तुम। जो सदैव 
धनपतियों के स्तुति-गान रचकर   
यश बटोरने में लींन हो। 

सामन्ती शोषक व्यवस्था के अंग हो तुम।
कोटि-कोटि श्रमिकों के अथक श्रम में, 
निहित उनकी कर्तव्य-निष्ठा में अद्भुत 
गरिमा से ओतप्रोत क्षण; तुम्हें नज़र नहीं आते। 
    
 क्या तुम जान सके हो कभी 
 वह भी प्रणय-जगत में विचर सकता था!
 वह भी प्रेमलीला-क्रीड़ाएँ कर सकता था! 
 वह भी उन्मत्त मुग्ध गीत गा सकता था!

फिर भी उसने 
गगनचुम्बी अट्टालिकाओं को, उसारने के   
गीत गाए। और स्वयं को इसी पर 
न्यौछावर कर, धन्य मानता रहा। 
तुमने कभी नहीं सोचा, 
कि उसकी फूंस की झोंपड़ी में, 
दिया जला कि नहीं! 
उसका शिशु दवा के अभाव में बिलखता रहा, 
फिर भी उसकी श्रमिक पत्नी ने, उफ़्फ़ तक न की 
और दो शब्द भी न सूझे तुम्हें, उसके लिए! 
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

किशोर साहित्य कहानी

बाल साहित्य कविता

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं