अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मैं बारिश

देखो कैसे, मैं बारिश, आ गयी फिर से 
कई तप्ती दोपहरों से नज़र बचाये 
सुबह से छिप के बैठी थी चुपचाप 
उन काले बादलों की चादर उढ़ाये 
 
कड़कती गूँज तुम्हें बुलाये मेरे साथियों की 
बाहर आ जाओ काम को छोड़े 
पिट्ठू खेलेंगे गीली ज़मीन पर 
और मैं भी तो मज़े लूँगी अपनी जीत के 
जब तुम फिसलने लगोगी न पैर जमाये 
 
कितनी धूल भर दी थी तुमने 
हवा रूखी और बद मिज़ाज,
कर दी तुमने.. 
और सूरज गुस्से से गुर्रा रहा था 
तुम्हारी आँखों को बेवज़ह ही सता रहा था 
 
क्या करती फिर रहा न गया 
ऐसा लगा तुमने ख़ामोशी से मुझसे ये कहा
'इतनी चकाचौंध भरी दोपहरी
मेरे जीवन से जैसे रस को खींच रही है 
कहना चाहती हूँ कविताएँ कई 
पर मेरे शब्दों को जैसे ये मींच रही है 
बारिश की बूँदों से इसे ढक दो ना ज़रा 
मौसम में लय को आने दो थोड़ा 
मुझे भी एक बहाना मिल जाएगा 
मेरा मन भी सुर में गुनगुनाएगा
 
फिर क्या था... 
फिर क्या था, मुझे तो आना ही था 
तैयार बिजली और गरजन का फ़साना भी था 
अब देखो न दोपहर को–
कैसे मैंने सुहावना कर दिया 
कराहते लम्हों को कैसे 
शरारती यादों में बदल दिया 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं