अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मैं तेरी ही परछाईं हूँ 

आसमान के सूरज तुम 
मैं तेरी ही परछाईं हूँ 
प्रकाश पुंज की एक किरण बन 
आशा बिखराने आई हूँ!

उदित होते तुम, लाली फैलाते 
निशा को आभा सिन्दूरी दे जाते 
मैं माँग में भर सिन्दूर, संग तेरे 
जल तुलसी पर भी चढ़ाती हूँ 
साँझ को जब तुम पच्छिम में 
आभा फैलाने जाते हो 
दीप तुलसी पर प्रज्ज्वलित कर 
आँगन को रोशन भी कर जाती हूँ!

मेघ तुम्हें जब ढक लेते हैं
तुम चोरी से मुस्काते हो 
कोहरे संग खेल आँख मिचौली 
जीवन अस्त व्यस्त कर जाते हो 
पाला खाकर पौधों के बच्चे 
मुँह लटकाए रहते हैं
तब दिखा छवि तुम अपनी 
मुस्कान उन्हें दे जाते हो!

केशों को बिखरा कर मैं 
चंडी भी बन जाती हूँ 
करुण पुकार सुन बच्चों की 
माँ दुर्गा का रूप सजाती हूँ 
अस्त व्यस्त हो रहे जीवन को 
नया रंग दे जाती हूँ 
तुम पुंज किरण के, तेरी किरण मैं
ज्योत मैं भी बिखराती हूँ!

विकीर्ण किरणों के हाथों से 
देकर प्राण धरा को तुम 
दूर कहीं छिप जाते हो 
मैं हाथों की रेखा हूँ 
जीवन रेख बनाती हूँ 
तुम ओस दूब की ले आग़ोश में 
धरा को चुप करवाते हो 
मैं आँखों की सीपी से 
मोती आँसू के चुराती हूँ!

एक अंश मैं तेरे ओज का 
तुझसे ही ले जाती हूँ 
जीवन देती हर प्राणी को 
स्वयं का जीवन भी सजाती हूँ!
आसमान के सूरज तुम 
मैं तेरी ही परछाईं हूँ 
नीलाकाश पर सजते तुम 
मैं धरा वधू बन आई हूँ!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं