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ओ बेआवाज़ लड़कियो!

बेआवाज़ लड़कियो!
उठो! देखो तुम्हारे रुदन में
कितनी किलकारियाँ ख़ामोश हैं।
कितनी परियाँ गुमनाम हैं
तुम्हारे वज़ूद में।
तुम्हारी साँसें
लाशों को भी
ज़िंदगी बख़्श देती हैं...

ओ बेआवाज़ लड़कियो!
एक बार कहो
जो तुमने अब तक नहीं कहा.......
कहो जो बंद पड़ा है
तुम्हारे तहखाने में.......
कहो कि दुनिया
बेनूर हो रही है
तुम्हारे शब्दों के बग़ैर ......
इस मरघट सन्नाटे में
अपनी आवाज़ का संगीत छेड़ो,
अपने शब्दों का चुम्बन जड़ दो
हर अवसादग्रस्त मस्तक पर.
उल्लास का वरक लगा दो
हर ख़त्म होती उम्मीद पर।

ओ  बेआवाज़ लड़कियों!
बोलो! कहो अनकही कहानियाँ;
इससे पहले कि
ये समाज तुम्हारे ताबूत पर
अंतिम कील ठोक दे।

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