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पकवान

लड्डू पेड़े से दिन होते
रसगुल्लों-सी रातें
चंदा सूरज से हम करते
दिल की सारी बातें

गर जलेबी पेड़ पर होती
हलुआ उगाती घास
हम भी उनकी सेवा करते
जब तलक चलती साँस

गर चमचम की बारिश होती
कभी न खुलता छाता
चाहे जितना काला बादल
रस बरसाने आता

खीर अगर नदिया में बहती
हम रोज़ नहाने जाते
पत्थर सब बर्फी होते तो
कुतर कुतर कर खाते

मम्मी कहती खाना खा लो
हम क्यूँ रोटी खाते
दूध भरा गिलास छोड़ कर
बाहर भागे जाते।

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