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पिया मोरा

​मैं बावरी बन घूमती,
पिया नगर शहर और गाँव,
लोक लाज तज आई हूँ,
थमे ना मेरे पाँव।

 

कोई दाग़ चरित्र धरे,
कोई धरे नज़र अश्लील,
कोई समझे ना समझ,
कोई धरे हृदय में कील।

 

सब सह पीड़ा आई हूँ,
बन नदियाँ की धार,
गंगा जैसा पावन है,
प्रेम चरित्र और प्यार।

 

तू भी माँग प्रमाण पिया,
करे प्रेम संदेह,
कैसे कहूँ तोहे सजन,
कैसा मेरा स्नेह।

 

ऐसे में तू छोड़कर,
करे मेरा अपमान,
मौन मुख सह आ गई,
मन चाहे कुछ सम्मान।
 

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