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प्रकृति - रौद्र रूप

विनाश काले विपरीत बुद्धि
मानव संग प्रकृति थी हँसती थी झूमती
स्वार्थ पूर्ति की सोच मानव ने हरियाली छिनी
ध्वनि, वायु,जल प्रदूषण कर जीना दुर्भर किया
हद हो गई जब मानव के खिलवाड़ की
कुपित प्रकृति ने रौद्र रूप धारण किया
कभी सुनामी, कभी भूकंप, कभी बरसात से
मानव जीवन तहस-नहस किया
कभी बाढ़  तो कभी बिजली गिरा धरा पर
समूल जगत को दण्डित किया
और अब तो प्रकृति विश्व सकल से है रूठी
तभी तो महामारी की मार है मारी
दे रही सज़ा मानव को उसके कुकृत्य की
और बता रही है दोषी है मानव ही
वन्य- प्राणियों का पशु-पक्षियों का
और जीव-जंतुओं, संपूर्ण धरा का
अपनी ही करनी है मानव की
मानव जाति पर आई जो आज विपत्ति॥

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