अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

ये पुरुष बना रावण जब-जब,
तू थी सीता की अवतारी।
ले कर तृण हाथों में तूने,
की थी खुद रक्षा की तैयारी।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

विश्वास तेरा जब भी था अटल,
यमराज से भी बाजी मारी।
बन कर सावित्री का अवतार,
रक्षा की इन पुरुषों की बार-बार।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

कर चीर-हरण के प्रयत्न कभी,
क्या यही तेरा सम्मान किया?
तब तेरी ही भक्ति ने की थी,
तेरी रक्षा की तैयारी।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

कभी वस्तु समझ, अधिकार समझ
तुझे खेल में दाँव लगा बैठे
मूक बने इन पुरुषों की,
मर्यादा क्या तब न हारी?

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

ले हाथों में शस्र-भाल, कृपाण कभी
लक्ष्मीबाई का अवतार बनी,
किया असमंजस में नर सेना को
शौर्य की नयी मिसाल बनी।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

बनकर अरुंधति, पत्नी महर्षि वशिष्ठ की,
त्रिदेव को भी नतमस्तक किया,
बन कर गार्गी ब्रह्मवादिनी,
याज्ञवलक्य से शास्त्रार्थ किया।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

न समय गँवा, तू व्यर्थ अभी,
पहचान स्वयं को, तू समर्थ सही।
ले कर कष्टों के विशाल पाषाण,
किया फतह हिमालय बार-बार।

 

सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

 

फिर क्या संशय, क्या असमंजस है,
चंडी तू ही, तू ही काली
असुर मर्दिनी, अवतारी
सुन नारी! तू कब इन पुरुषों से हारी?

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं