अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तेज़ाब प्रेम

तुम्हारे प्रेम के दावे 
इतनी जल्द खोखले हो गए 
कि मेरी अस्वीकृति तुम्हें सहन न हुई 
क्षणभर भी तुम्हारे हाथ न काँपे 
मेरी चटकती देह को जलाते हुए 
तुम्हारे तेज़ाब प्रेम ने जला दिया 
चेहरे के साथ मेरी अन्तरात्मा को भी 
शरीर कि जलन को कम पड़ गयी 
पर आत्मा कि राख आज भी समेट रही हूँ 
क्या यही तुम्हारा प्रेम था 
नहीं! नहीं!
प्रेम इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है 
ये तो तुम्हारा अहंकार था कि 
मेरी चीखों को तुम
अपनी मर्दानगी की जीत समझते रहे 
तुम्हें तो लगाव था ही नहीं 
तुम्हें तो भोगना था शरीर 
जिसे तुम जैसे जानवर 
मात्र उपभोग कि वस्तु समझते हैं 
लेशमात्र भी तुम्हारा अहम ना डगमगाया 
मेरे अस्तित्व को छिन्न भिन्न करते हुए 
वर्षों बाद आज भी मैं 
हर दिन जीती और मरती हूँ 
अपने गुनाहों के दाग़ तो चिपका दिए 
मेरे बदन पर 
और समाज ने तुम्हें स्वीकार लिया 
नादान समझकर 
बेगुनाह होते हुए भी 
मेरे दाग़ हमेशा मेरे ही 
गुनाहगार होने कि चुगली करेंगे 
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं