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विकास

मंगलू बीमार हो गया
आँखें पीली
हल्दी भर दी मानो आँखों में
काला चेहरा पिचक कर
डरा रहा है घर के ही बच्चों को
चमड़ी और हड्डी ही बाकी है
दिल जो अंदर था छाती के
श्वास के साथ बाहर आ जाता है
और निश्वास के साथ हड्डीयों में खो जाता
सबसे पहले शामत आई -

 

झोपड़ी के सामने वाली फूलो बुढ़िया की
तीन फुटीया डंडा ही -
जिसे घोंघे की गति देता है
नज़रें तो हाथों में आ गई हैं
आँखें बन गई हैं हाथी के लंबे दाँत
पर वो नज़र लग गई मंगलू को
जब वो खा रहा था भात
सूखे पत्तल में
हरी मिर्च और नमक के साथ
एल्युमिनियम के उस लोटे से पी रहा था पानी
जो कुछ कुछ क्या, बहुत कुछ मंगलू जैसा है
रंग का फर्क है एक काला और एक गोरा

 

फूलो नाम अब जँचता नहीं
किताबों के पन्नों के बीच दबा फूल है वो
जिसकी पूरी कहानी छप चुकी है उन पन्नों मे
- शरीर में जान नहीं है
बचपन जवानी और बुढ़ापे में काश लोग
मौसम की तरह नाम बदल लेते

 

सुबह अचानक
जली झोपड़ी के अंगारों में लोग
ढूँढ रहे हैं उस सूखे फूल के डंठल -

 

बैगा झाड़ रहा है -
सच की बहारी से
पर निकलता ही नहीं वो भूत
जो कारागर की सलाखों की तरह
मंगलू की पसलियों के पीछे कैद है
मुर्गे का खून पी गई देवी
और बोटी प्रसाद बन बँट गई लोगों में
मेंढक छटपटा गये देवी के चरणों में
बकरे की दावत उड़ा ली उस देवी ने
खेत का टुकड़ा महाजन डकार गया
चावल की दारू छलक गई बैगा की साँसों में
पर पी न पाई बैगा के अंदर बैठी देवी
साँसें थमने लगी मंगलू की
आखिर हो ही गये -

 

लोगों को दर्शन देवों के
क्योकि क्षणभर मे ही आ गया था यमदूत

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