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ज़िन्दगी (अनुराधा सिंह)

न जाने कब कहाँ किस गली कूचे से शुरू हुई
ये बेग़ैरत ज़िन्दगी, और किधर, किस तरफ़ मिटेगी
कोई बता दे मुझे
बड़ी मशक़्क़त हो रही है क्या कहूँ
लगती तो दरिया में ओस जैसी
तूफ़ानी हड़कंप के तमाशे जैसी
और फिर
कभी बड़ा अजीब लगता है, देख कर कि सूरज
जो हरी-भरी वादियों जो घूर कर देख रहा है
कहीं ये ना कह रहा हो, देख लूँगा तुझे


किसी की आन बान शान है ये ज़िन्दगी
तो किसी का ईमान है ये ज़िन्दगी
बड़ी बेफ़िक्र सी लगती है ये ज़िन्दगी
आवारा अल्हड़ बेबाक
रूह को छू यूँ ही गुज़र जाती है
कभी फूल गुलाब सी मुस्काती है
घट-घट वासी परमेश्वर का एहसास भी दिलाती है
और आध्यात्मिकता का परम स्वाद दे जाती है
 

कभी कभी गिलहरी जैसी है ये ज़िन्दगी
आशा और निराशा की डालियों पर
मंज़िलों की उम्मीदें दे जाती है
तो कहीं कली की तरह मुस्काती है
 

वैसे कहें तो तितली भी है ये ज़िन्दगी
प्यार से छुआ तो रातरानी सी खिलती है
अन्यथा वीरानों में मिलती है
अपने टूटे बिखरे पंख लेकर
और हँसकर कहती है
हम सब रंग मंच की कठपुतलियाँ हैं 

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