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आज का समय, युद्ध और साहित्य

 

आज का समय
एक अजीब सी ख़ामोशी में डूबा है
चेहरों पर मुस्कान है 
पर . . . अंदर कहीं कुछ टूटा है। 
 
एक ओर तरक़्क़ी के गीत गाए जाते हैं, 
दूसरी ओर इंसान ही इंसान से डर जाते हैं, 
हमारा समय अजीब मोड़ पर खड़ा है
हाथों में शब्द हैं और आँखों में धुआँ भरा है। 
 
कहीं युद्ध की तैयारी है तो
कहीं शान्ति की ज़िम्मेदारी है
पर सच तो ये है कि
हर दिल में एक छोटी सी लाचारी है। 
 
जब-जब युद्ध की ज्वाला भड़कती है, 
तब-तब इंसानियत सिसक-सिसक कर रोती है
जब युद्ध के शोर से धरती काँप जाती है, 
एक कविता ही तो है जो शान्ति गुनगुनाती है। 
 
हमारा समय परीक्षा की घड़ी है
मानवता की साँसें थोड़ी थमी-थमी सी पड़ी हैं
पर . . . साहित्य की नदी अभी भी बहती है, 
हर ज़ख़्म पर चुपचाप मरहम रखती है। 
 
युद्ध मिटा सकता है शहर और निशान, 
पर शब्द बचा लेते हैं इंसान का मान, 
इसलिए जब भी युद्ध हमें आज़माएगा, 
साहित्य ही हमें फिर इंसान बनाएगा 
क्योंकि—जब भी दुनिया नफ़रत की आग में जलती है
एक कविता ही तो है जो पानी बनकर ढलती है।
एक कविता ही तो है जो पानी बनकर ढलती है॥

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