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आख़िरी पेड़ का इंटरव्यू

 

पृथ्वी पर केवल एक पेड़ बचा था। उसे काँच के विशाल गुंबद में सुरक्षित रखा गया था। दुनिया भर के समाचार चैनल उसका इंटरव्यू लेने पहुँचे। 

एक प्रसिद्ध पत्रकार ने पूछा, “आप पृथ्वी के आख़िरी पेड़ हैं। आपको कैसा महसूस होता है?” 

पेड़ कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला, “अकेला।” 

“क्या आपको मनुष्यों से शिकायत है?” पत्रकार ने अगला सवाल किया। 

“शिकायत नहीं, हैरानी है,” पेड़ ने उत्तर दिया। “मैंने उन्हें साँस दी, छाया दी, फल दिए। बदले में उन्होंने मुझे आँकड़ों में बदल दिया—कितने पेड़ कटे, कितने बचे। जब तक जंगल थे, किसी ने उनकी क़ीमत नहीं समझी। जब जंगल ख़त्म हुए, तब सम्मेलन होने लगे।” 

पत्रकार निरुत्तर हो गया। 

इंटरव्यू का सीधा प्रसारण पूरी दुनिया में हो रहा था। लाखों लोग स्क्रीन के सामने बैठे थे। 

तभी एक छोटे बच्चे ने लाइव कार्यक्रम में सवाल पूछा, “पेड़ अंकल, अगर आपको एक इच्छा माँगने का मौक़ा मिले, तो आप क्या माँगेंगे?” 

सबको लगा, वह और पेड़ चाहता होगा, या फिर सुरक्षित जंगल। 

लेकिन पेड़ मुस्कुराया। 

“मैं मनुष्यों के लिए थोड़ी-सी याददाश्त माँगूँगा।” 

“याददाश्त?” बच्चा चौंका। 

“हाँ,” पेड़ बोला, “क्योंकि वे हर बार संकट आने पर समाधान खोज लेते हैं, पर संकट टलते ही उसका कारण भूल जाते हैं।” 

स्टुडियो में सन्नाटा छा गया। 

उस दिन लोगों ने पहली बार आख़िरी पेड़ की आवाज़ नहीं, अपने भविष्य की प्रतिध्वनि सुनी। और उन्हें एहसास हुआ कि प्रकृति को बचाने की सबसे बड़ी शर्त पेड़ लगाना नहीं, भूलने की आदत छोड़ना है। 

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