अभिमान
काव्य साहित्य | दोहे डॉ. मनोरमा चन्द्रा 'रमा'15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
नित्य बचें अभिमान से, धैर्य धरें अति नेक।
अहंकार में जो पड़े, खोता सदा विवेक॥
अभिमानी को देखकर, मुँह लेना नित मोड़।
संगत में पड़ना नहीं, उनसे नाता तोड़॥
धन-वैभव में पड़ सदा, करना नहीं घमंड।
समय साथ नित जाग लें, मिलती ख़ुशी प्रचंड॥
सब तन इष्ट प्रकाश सम, फिर कैसा अभिमान?
जाति-धर्म सब भेद तज, जन-जन एक सुजान॥
चल प्रबुद्ध बनकर सदा, रहें सदा संज्ञान।
उससे निज का हो भला, रखें दूर अभिमान॥
अपनी उन्नति देख कर, करो नहीं अभिमान।
समय बड़ा बलवान है, सुधर चलें इंसान॥
लोग प्रशंसा अति करें, दुनिया की यह रीत।
मनुज तजे अभिमान तो, बन जाता मनमीत॥
जिस तन में अभिमान है, धारे ग़लत विचार।
स्वयं प्रतिष्ठा के लिए, करे उदीम अपार॥
धनिक वर्ग को देख लो, करते अति अभिमान।
रिश्ते नाते भूलकर, बनते हैं अनजान॥
जीवन है दिन चार का, मानवता पहचान।
कहे ‘रमा’ ये सर्वदा, तजो मनुज अभिमान॥
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